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Updated: 28 सितम्बर, 2021 10:22 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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धर्म और जाति के सबसे बड़े सियासी अखाड़े उत्तर प्रदेश में यूपी विधानसभा चुनाव 2022 (UP Assembly Elections 2022) के मद्देनजर हर रोज नए दंगलों का आयोजन हो रहा है. सत्तारूढ़ दल भाजपा (BJP) की योगी आदित्यनाथ सरकार (Yogi Adityanath) में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में सात मंत्रियों को शामिल करने के साथ चार नेताओं को एमएलसी बनाने के बाद माना जा सकता है कि पार्टी ने सत्ता में दोबारा वापसी की राह की कुछ बाधाएं पार कर ली हैं. राजनीतिक, धार्मिक, जातिगत और क्षेत्रीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए किये गए इस मंत्रिमंडल विस्तार से भाजपा (BJP) के आगे आने वाले कुछ संकट कटने की संभावना है. वहीं, इस मंत्रिमंडल विस्तार से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भाजपा किसान मोर्चा के सम्मेलन में किसानों का इंतजार खत्म करते हुए गन्ने का समर्थन मूल्य भी बढ़ा दिया. हालांकि, ये बढ़ोत्तरी भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता और किसान आंदोलन (Farmer Protest) का अघोषित चेहरा बन चुके राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) के 400 रुपये के सुझाव से 50 रुपये कम है. लेकिन, सीएम योगी ने ऐन मौके पर दाम बढ़ाकर किसान आंदोलन की आंच पर थोड़ा-बहुत पानी डाल दिया है. कहना गलत नहीं होगा कि योगी ने इन फैसलों के सहारे यूपी चुनाव का 'आधा' रास्ता तय कर लिया है. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि विपक्षी दल कहां हैं?

यूपी चुनाव के लिहाज से भाजपा लगातार अपने जातिगत समीकरणों को दुरूस्त करने में लगी है.यूपी चुनाव के लिहाज से भाजपा लगातार अपने जातिगत समीकरणों को दुरूस्त करने में लगी है.

योगी ने खेल दिए हैं दो मास्टरस्ट्रोक

यूपी चुनाव के लिहाज से भाजपा लगातार अपने जातिगत समीकरणों को दुरूस्त करने में लगी है. लंबे समय से भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले निषाद पार्टी के डॉ. संजय निषाद को यूपी प्रभारी बनने के कुछ ही दिनों के अंदर धर्मेंद्र प्रधान बातचीत की टेबल पर ले आए और एमएलसी का पद देकर गुस्सा शांत भी कर दिया है. संजय निषाद का गोरखपुर समेत पूर्वांचल के कई जिलों में निषाद समाज में अच्छा-खासा प्रभाव है. सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा मामले में नाराज चल रहे गुर्जर वर्ग को साधने के लिए वीरेंद्र सिंह को एमएलसी बना दिया गया है. वीरेंद्र सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश चार बार विधायक रहे हैं और गुर्जर समाज की राजनीति करते रहे हैं. 2000 में बनी सपा सरकार में पशुधन मंत्री बने और 2014 में एमएलसी बने. गोपाल अंजान भाजपा के साथ लंबे समय से जुड़े रहे हैं और अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं. वहीं, योगी आदित्यनाथ सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में पीएम नरेंद्र मोदी की तर्ज पर ही एक सवर्ण, तीन ओबीसी और तीन एससी/एसटी मंत्री पद देकर गैर-यादव और गैर-जाटव समीकरण पर ही दांव लगाया है.

वैसे, विपक्षी पार्टियां सत्तारूढ़ दल भाजपा से योगी आदित्यनाथ सरकार में हुए ताजा मंत्रिमंडल विस्तार से लेकर गन्ने का बढ़े दाम तक हर मामले पर कड़वे सवाल कर रहे है. तो, योगी आदित्यनाथ 'सबका साथ, सबका विकास' से राम मंदिर निर्माण तक की बात कहकर विपक्ष के मुंह पर ताला डालने की कोशिश कर रहे हैं. कुल मिलाकर यूपी चुनाव से पहले रस्साकशी का दौर बराबर जारी है. धर्म और जाति में बंटे उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े को अगर राजनीतिक चश्मा हटाकर देखा जाए, तो सभी दल अपने समीकरणों को साध रहे हैं. इस पर ये कहना कि भाजपा गलत कर रही है, केवल राजनीतिक आरोप लगते हैं. क्योंकि, ऐसा पहले भी होता रहा है.

वहीं, इन सबसे इतर किसान आंदोलन को लेकर बात की जाए, तो भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत के शब्दबाणों की वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल बन रहा है. लेकिन, पश्चिमी यूपी के जाट मतदाता दर्जनों खापों में बंटे हुए हैं. भाजपा विधायक उमेश मलिक के काफिले पर हुए हमले के बाद गठवाला खाप के चौधरी बाबा राजेंद्र मलिक ने किसान महापंचायत के बहिष्कार का ऐलान कर दिया गया था. दरअसल, किसान नेता नरेश टिकैत की बालयान खाप के बाद दूसरी सबसे बड़ी खाप गठवाला खाप मानी जाती है. किसान महापंचायत को सफल बनाने के लिए नरेश और राकेश टिकैत बैकफुट पर आ गए थे. किसी तरह चौधरी बाबा राजेंद्र मलिक को मनाकर किसान महापंचायत को सफल कर लिया गया था. लेकिन, बीती 26 सितंबर को गठवाला खाप के नेतृत्व में मजदूर-किसान समिति ने चौधरी बाबा राजेंद्र मलिक ने 'असली' किसान महापंचायत कर दी. इस किसान महापंचायत में भाजपा को लेकर वो गुस्सा नहीं दिखा, जिसकी बात राकेश टिकैत आमतौर पर करते दिखते हैं. आध्यात्मिक किसान नेता चंद्रमोहन के अनुसार, मोदी सरकार एमएसपी पर कानून बनाकर किसानों के विरोध को आसानी से खत्म कर सकती है.

ये तय माना जा रहा है कि यूपी विधानसभा चुनाव 2022 बहुष्कोणीय होगा.ये तय माना जा रहा है कि यूपी विधानसभा चुनाव 2022 बहुष्कोणीय होगा.

विपक्षी दलों में अव्वल साबित होने की लगी होड़

यूपी चुनाव से पहले हुए अभी तक के राजनीतिक घटनाक्रमों को देखा जाए, तो भाजपा के सामने सपा (SP), कांग्रेस (Congress), बसपा (BSP) के अलग-अलग ही चुनावी मैदान में उतरने की संभावना है. इस दशा में ये तय माना जा रहा है कि यूपी विधानसभा चुनाव 2022 बहुष्कोणीय होगा. क्योंकि, सपा, बसपा, कांग्रेस से इतर असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम (AIMIM) भी इस चुनावी दंगल में ताल ठोंक कर मुस्लिम वोटों (Muslim Vote) पर अपना हक जता रही है. वहीं, हर सियासी दल खुद को अव्वल साबित करने की होड़ में लगा हुआ है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन और जाट राजनीति के सहारे फिर से उठ खड़े होने का दावा कर रही जयंत चौधरी की आरएलडी का सपा के साथ गठबंधन तय माना जा रहा है. लेकिन, गठबंधन में आकर पश्चिमी यूपी की 76 विधानसभा सीटों में से कितनी आरएलडी के हाथ लगेंगी, इस पर सवाल जस का तस बना हुआ है. वहीं, आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर रावण बसपा सुप्रीमो मायावती का गढ़ कहे जाने वाले पश्चिमी यूपी में जाटव वोटों में हिस्सा मांगने को तैयार बैठे हैं.

कांग्रेस और बसपा से मिले झटके से उबरने की कोशिश में लगे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) 'भीष्म प्रतिज्ञा' कर चुके हैं कि वह किसी बड़े राजनीतिक दल के साथ हाथ नहीं मिलाएंगे और छोटे दलों से ही गठबंधन करेंगे. अखिलेश यादव ने बीते कुछ महीनों में बसपा और कांग्रेस में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नक्शेकदम पर चलते हुए सेंधमारी करना शुरू कर दिया है. बसपा से निष्कासित किए गए लाल जी वर्मा और राम अतल राजभर से शिष्टाचार भेंट के सहारे अखिलेश यादव ने सपा को मजबूत करने की कोशिश शुरू कर दी है.

वहीं, हाल ही में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र ललितेशपति त्रिपाठी के कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद सपा में शामिल होने की खबरें सामने आ रही हैं. वैस, किसी समय में यादव कुनबे में दोफाड़ की वजह बनी माफिया विधायक मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल का समर्थन भी सिबगतुल्लाह अंसारी को सपा में शामिल कर अखिलेश यादव ने पा लिया है.

बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati) 2007 के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के साथ आगे बढ़ रही हैं. उत्साह से लबरेज मायावती ने ब्राह्मणों को यूपी का नया दलित बना डाला है. वहीं, बसपा सुप्रीमो एक कार्यक्रम में गणेश की मूर्ति और त्रिशूल के साथ भी नजर आ चुकी हैं. दलित राजनीति करने वालीं मायावती दलित-ब्राह्मण गठजोड़ में मुस्लिम वोटबैंक को भी अपने पक्ष में मानकर चल रही हैं. साथ ही ओबीसी मतदाताओं को भी साधने की कोशिश में जुटी हैं.

वहीं, कांग्रेस की बात करें, तो पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) का पूरा फोकस दलित और मुस्लिम मतदाताओं पर है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेता मुस्लिम धर्मगुरुओं से मिलकर कांग्रेस के पक्ष में जमीन तैयार करने की कोशिशों में लगे हैं. वहीं, दलित समुदाय के खिलाफ हुए हर अपराध के बाद प्रियंका गांधी की उपस्थिति अपरिहार्य रही है. हालांकि, प्रियंका गांधी की इस पूरी कवायद को सपा के साथ गठबंधन करने के लिए दबाव की रणनीति के तौर पर ही देखा जा रहा है.

वैसे, यूपी चुनाव को रोमांचक मोड़ देने का ज्यादातर श्रेय भागीदारी संकल्प मोर्चा के ओमप्रकाश राजभर को जाता है. पूर्वांचल में कई सीटों पर अपना प्रभाव रखने वाले छोटे-छोटे दलों को एक साथ लाकर ओमप्रकाश राजभर से भागीदारी संकल्प मोर्चा तैयार किया है. एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी फिलहाल इसी मोर्चा के रहबर बने हुए हैं. उत्तर प्रदेश की सियासत में पहली बार पांच साल में पांच मुख्यमंत्री और 20 उपमुख्यमंत्री के फॉर्मूला के साथ आगे बढ़ रहे ओमप्रकाश राजभर अभी तक अलग चुनाव लड़ने की ही घोषणा कर रहे हैं.

छोटे दलों का ये समूह कांग्रेस या सपा के साथ गठबंधन में आ जाता है, तो सूबे की सियासत में सर्वाधिक विधानसभा सीटों वाले पूर्वांचल में बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है. लेकिन, यहां भी किसी भी तरह के गठबंधन में सीटों की संख्या को लेकर पेंच फंसेगा. कुल मिलाकर हर राजनीतिक दल खुद को भाजपा के विकल्प के रूप में अव्वल साबित करने की होड़ में लगा हुआ है. लेकिन, कामयाब कितना होगा, ये यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के नतीजे ही बताएंगे. जबकि, योगी आदित्यनाथ ने यूपी चुनाव का 'आधा' रास्ता तय कर लिया है.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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