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Updated: 31 दिसम्बर, 2021 06:46 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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पश्चिम बंगाल चुनाव 2021 में बीजेपी को मिली शिकस्त मोदी-शाह के लिए ज्यादा तकलीफदेह नहीं लगती. क्योंकि 2015 के बिहार चुनाव में भी तो हार का वैसा ही स्वाद चखना पड़ा था. और दिल्ली में तो नाक के ठीक नीचे दो-दो बार अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने बीजेपी को दहाई का आंकड़ा नहीं पार करने दिया.

ज्यादा तकलीफ इसलिए हुई होगी क्योंकि 2019 में अधिक सीटों के साथ सत्ता में वापसी के बाद ऐसे दिन देखने पड़े. जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म करने, तीन तलाक और CAA जैसे कानून संसद से सफलतापूर्वक करा लेने के बाद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) दोनों के लिए ये सब काफी कष्टदायक ही समझा जाएगा.

और रही सही कसर किसान आंदोलन ने पूरी कर दी, 'तपस्या में ही कोई कमी रह गयी होगी,' कहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी - राजनीति में हार जीत तो लगी रहती है, लेकिन साल 2021 (Year Ender 2021) में मोदी-शाह को जो सबक मिली है वो बरसों बरस नहीं भूलने वाली है.

1. आंदोलन के हाथ 'कानून' से लंबे होते हैं

कानून के हाथ लंबे होते हैं - ये कानून अपने हाथ में लेने वालों के लिए कहा गया है. ये देश की जनता ही है जो अपने वोट के जरिये कानून बनाने का अधिकार देती है. लेकिन जनता इतनी भी छूट नहीं देती कि कानून बनाने वाले मनमानी ही करने लगें.

देश की जनता हर पांच साल बाद हिसाब किताब करती है, लेकिन किसान आंदोलन की बदौलत करीब एक साल में ही ऐसा हो गया - मजबूर होकर देश के सबसे ताकतवर नेता को टीवी पर आकर सरेआम माफी मांगनी पड़ी, 'तपस्या में कमी' की बात तो फायर एग्जिट की तरफ इशारा कर रहा था.

किसान आंदोलन 2020 के आखिर में ही शुरू हो चुका था. देखते ही देखते पंजाब की सड़कों से दिल्ली बॉर्डर पर पहुंच गया. जल्दी ही देश भर के किसानों ने डेरा डाल दिया. अफसोस की बात ये रही कि किसान आंदोलन के दौरान कई दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भी हुईं.

26 जनवरी की दिल्ली हिंसा, 3 अक्टूबर को हुई लखीमपुर खीरी हिंसा और उसके कुछ दिन बाद ही जिस बर्बर तरीके से एक युवक की हत्या करके शव लटका दिया गया था - ये शायद ही कभी भुलाया जा सकेगा.

narendra modi, amit shahबीती ताहि बिसारि दे...

कृषि कानूनों पर 'मोदी है तो मुमकिन है' नये रूप में देखने को मिला - अगर सिर पर विधानसभा के चुनाव नहीं होते और उसमें भी उत्तर प्रदेश शामिल नहीं होता तो ऐसा होना भी नामुमकिन ही होता.

पंजाब के चुनावी माहौल में बीजेपी नेताओं की बुरी हालत को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी काफी सोच समझ कर राष्ट्र के नाम संदेश के लिए 19 नवंबर की तारीख चुनी - उस दिन गुरु परब जो था.

2. टेनी का बचाव 'पार्टी विद डिफरेंस' को नाटा कर गया

लखीमपुर खीरी हिंसा तो वैसे भी साल की दर्दनाक घटनाओं में से एक रही. हिंसा में एक पत्रकार, चार किसान और तीन बीजेपी कार्यकर्ता मारे गये थे. केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा मोनू का नाम आते ही मामला राजनीतिक रंग ले लिया - और मोदी-शाह के लिए ये भी ऐसा पल रहा जब बोलते नहीं बन रहा था.

बीजेपी के खिलाफ यूपी में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को तो जैसे ऐसे ही मौके की तलाश रही. एक बार जो शुरू किया तो जितना भी राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता था, शिद्दत से उठाया. हिंसा में मारे गये किसानों को न्याय दिलाने की लड़ाई शुरू हो गयी.

हत्या के आरोपी आशीष मिश्रा सहित सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर पुलिस ने जेल भेज दिया - और बाद में एसआईटी ने तो यहां तक कह दिया कि IPC जो कमजोर धाराएं लगायी गयी हैं उसे बदला जाये.

लखीमपुर खीरी में फॉर्च्यूनर की करतूत के बारे में बीजेपी खेमे से सबसे पहले पार्टी के यूपी अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह का बयाना आया और लगा जैसे टेनी महाराज का खेल तो खत्म हो गया. यूपी बीजेपी अध्यक्ष ने तो बीजेपी के पुराने अंदाज पार्टी विद डिफरेंस की झलक दिखाने की कोशिश की थी, ये कहते हुए कि हम ऐसी राजनीति में यकीन नहीं रखते.

बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच ही स्वतंत्रदेव सिंह ने कहा था, 'वोट आपके व्यवहार से मिलेगा... आप जिस मोहल्ले में रहते हैं... वहां दस लोग आपकी तारीफ करते हैं तो मेरा सीना चौड़ा हो जाएगा... ये नहीं कि लोग आपकी शक्ल देखकर छिप जायें... आपको देखकर जनता मुंह न फेरे ऐसा आचरण कीजिये.'

थोड़ी सलाहियत के साथ ही खुल कर बोले, 'हम राजनीति में लूटने के लिए नहीं हैं - और न ही किसी को फॉर्च्यूनर से कुचलने के लिए आए हैं.'

अभी लोग अजय मिश्रा टेनी को मोदी कैबिनेट से हटाये जाने की मांग कर रही रहे थे कि उनके बड़े साहब अमित शाह लखनऊ में रैली के मंच पर खड़ा कर दिये, वो भी स्वतंत्रदेव सिंह की बगल में, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में - क्योंकि बचाने वाला हमेशा बड़ा ही होता है.

अमित शाह के बाद बाद अजय मिश्रा टेनी को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के मंच पर भी सीतापुर में देखा गया था. सारे सरकारी कामकाज तो वो कर ही रहे हैं, लेकिन किस बात का डर होता है जो थोड़ी ही देर बाद हर मंच से उनको छिपा दिया जाता है.

क्या यूपी की चुनावी रैलियों में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिलेगा? अजय मिश्रा टेनी के अपने इलाके लखीमपुर खीरी में भी?

3. आपदा में अवसर था, लेकिन त्रासदी मिली

ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं जो कहा करते थे कि योगी आदित्यनाथ ने कोरोना की आपदा को अवसर में बदला, लेकिन साल भर बाद ही मई, 2021 में अपने ससंदीय क्षेत्र बनारस के लोगों से मुखातिब मोदी के लिए अपने आंसुओं को रोकना मुश्किल होने लगा था.

ये राजनीति ही है जो कोविड कंट्रोल के वाराणसी मॉडल का कोई नामलेवा भी न रहा. अब तो हर चुनावी रैली में यूपी के मुख्यमंत्री को कर्मयोगी बताया जाता है - और मौके पर ही कोरोना संकट काल में बेहतरीन कामकाज का सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया जाता है.

लेकिन वे लोग कैसे भूल पाएंगे जो अपनों की जान बचाने के लिए अस्पताल दर अस्पताल भटकते रहे और गेट से ही लौटा दिये जाते रहे. कहीं अस्पताल में एक बेड का इंतजाम कर लेते तो ऑक्सीजन का संघर्ष शुरू हो जाता. अस्पताल वाले भी ऑक्सीजन की कमी की बात पर चुप रह जाते क्योंकि NSA से डर तो सबको लगता है.

अगर आपदा में अवसर ऐसा ही होता है तो ये किस काम का?

कोरोना की तीसरी लहर कहर बरपाने वाले अंदाज में पांव पसारने लगी है, लेकिन चुनाव तो नहीं टाला जा सकता है - आपदा कैसी भी हो, चुनाव तो सत्ता की राजनीति में सबसे बड़ा अवसर ही होता है.

4. चुनावी हार कितना तकलीफ देती है

आम चुनाव की भारी जीत के बाद से अब तक मोदी-शाह के नेतृत्व में बीजेपी दस राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है. महज चार राज्यों में उसे कामयाबी मिली है, जिनमें एक केंद्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी भी है.

2019 में हरियाणा में बीजेपी ने जैसे तैसे सरकार बना ली, लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड में सत्ता से हाथ धोना पड़ा. बिहार में चुनाव जीतने से ज्यादा महत्वपूर्ण बीजेपी के लिए नीतीश कुमार को कमजोर करना रहा - और 2021 में हुए पांच राज्यों के चुनावों में असम में सरकार बचा ली है.

सबसे बड़ा दर्द तो पश्चिम बंगाल ने दिया. आम चुनाव की जीत के बाद से धारा 370 और CAA, तीन तलाक जैसे कानून बनाने को छोड़ दें तो बीजेपी नेतृत्व ने पूरी ताकत तो बंगाल में ही झोंक दी थी. कोरोना संकट के दौरान जो हाल दिल्ली का रहा, वही यूपी और बंगाल में भी, लेकिन ममता बनर्जी हमेशा ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के निशाने पर रहीं.

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों में मोदी-शाह के हिसाब से थोड़ी सी राहत देने वाली खबर नंदीग्राम में ममता बनर्जी की हार और बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी की जीत रही होगी. वरना, भविष्यवाणी तो प्रशांत किशोर की ही सही हुई - बीजेपी 100 सीटों तक भी नहीं ही पहुंच पायी.

हालत ये हो गयी है कि अब वही ममता दिल्ली तक दहाड़ने लगी हैं - और 2024 को लेकर ताल ठोक रही हैं, भले ही परदे के पीछे काउंटर करने के खेल चल रहे हों. अब तो यूपी जीतने के लिए मोदी-शाह को साम, दाम, दंड और भेद के अलावा भी कुछ है तो इस्तेमाल करने की नौबत आ गयी है.

5. जासूसी कहां तक की जा सकती है

2014 के आम चुनाव से करीब साल भर पहले गुजरात में एक महिला की जासूसी को लेकर खासा बवाल मचा था - और 2021 में पेगासस का मामला भी वैसे ही छाया रहा. खबर आयी कि इजरायली कंपनी NSO के स्पाइवेयर पेगासस के जरिये दुनिया भर की सरकारें पत्रकारों, कानूनविदों और नेताओं की जासूसी करा रही हैं - लेकिन हड़कंप तो तब मचा जब मालूम हुआ कि निगरानी वाली उस सूची में 40 भारतीयों के भी नाम पाये गये.

सड़क पर सवाल उठाये जाने से लेकर संसद में विपक्ष के शोर मचाने पर सरकार ने पूरी तरह से पल्ला झाड़ लिया. बड़े केंद्रीय मंत्रियों और बीजेपी प्रवक्ताओं ने मोर्चा संभाला और दावा किया गया कि कोई जासूसी नहीं हुई.

मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और खारिज नहीं हुआ - सरकार के खिलाफ किसी भी मामले की गंभीरता का ये सबसे बड़ा पैमाना होता है. नोटिस देकर सबसे पहले पूछा तो सरकार से ही जाता है और जब जवाब नहीं मिलता तो मामला आगे बढ़ता है.

27 अक्टूबर, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस मामले में जांच के लिए एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया - और सरकार से सख्त लहजे में बोल दिया कि ऐसी जासूसी हरगिज मंजूर नहीं होगी.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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