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सियासत

 |  5-मिनट में पढ़ें  |   13-03-2018
राहुल लाल
राहुल लाल
  @rahul.lal.3110
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रविवार 11 मार्च 2018 को चीनी संसद ने अचानक से शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बनने के लिए संविधान संशोधन नहीं किया है, बल्कि लंबे समय से इसकी तैयारियां चल रही थीं. चीन का पहला संविधान 1954 में लागू हुआ था, लेकिन वर्तमान संविधान डेंग शियापिंग ने 1982 में लागू किया, जिसमें अब तक 1988, 1993, 1999 और 2014 में चार बार संशोधन हो चुके हैं. रविवार के इस संविधान संशोधन ने पूरे चीनी एक दलीय शासन प्रणाली के प्रकृति को ही परिवर्तित कर शी जिनपिंग को सर्वशक्तिमान बना दिया.

Xi Jinpingशी जिनपिंग बन गए हैं सर्वशक्तिमान

चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं बैठक में न केवल शी जिनपिंग को अगले राष्ट्रपति का कार्यकाल दिया गया, बल्कि शी जिनपिंग के विचारों को चीनी संविधान में जगह दी गई. माओ और डेंग शियापिंग के बाद शी जिनपिंग ऐसे तीसरे चीनी नेता हैं, जिनके विचारों को चीन के मूल संविधान में जगह दी गई है. चीनी संविधान में शी जिनपिंग के विचारों को "जिनपिंग थॉट" के रुप में जगह दी गई है. पांच साल पर होने वाले कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन के अंत में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर पार्टी संविधान में चिनफिंग की अवधारणा "नए युग के लिए चीन की विशेषताओं के साथ समाजवाद" को शामिल किया गया. इससे पहले पद पर रहते हुए केवल माओ का नाम ही संविधान में शामिल किया गया, जबकि डेंग का नाम उनकी मृत्यु के बाद 1997 में शामिल किया गया था. इस परिघटना के बाद शी जिनपिंग का कद चीन में कितना ऊंचा हुआ, उसे इसी से स्पष्टत: समझा जा सकता है कि शी जिनपिंग थॉट अब चीन के करोड़ों छात्र अनिवार्य पाठ्यक्रम के अंतर्गत पढ़ेंगे. पूर्व चीनी नेताओं हू जिंताओ और जियांग जेमिन के सिद्धांत इसमें शामिल किए गए लेकिन उनका नाम शामिल नहीं किया गया.

2012 में 18वीं कांग्रेस से पार्टी की कमान संभालने वाले वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग माओ के तरह शक्तिशाली हो गए हैं. ली घरेलू और बाहरी मामलों के कई सुपर कमीशनों के चैयरमैन हैं. वे राष्ट्रपति के अतिरिक सीपीसी और सेना प्रमुख भी हैं. जिनपिंग ने पिछले 5 वर्षों में चीनी सेना को पुनर्गठित किया और उसे खुद के प्रति ज्यादा निष्ठावान बनाया.

भारत के लिए चुनौती-

शी जिनपिंग का सर्वशक्तिमान रुप भारत और विश्व के लिए गंभीर चुनौती है. 2014 से 2017 तक भारत-चीन संबंध काफी उथल पुथल से भरा है. इसमें डोकलाम विवाद, अरुणाचल विवाद और चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा प्रमुख है. इसके अतिरिक्त भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान के आतंकवादी मसूद अजहर को बार-बार वीटो से बचाकर भी चीन ने आतंकवाद के विरुद्ध भारत के लड़ाई के धार को कुंद करने में कोई कमी नहीं की. एशिया में चीनी प्रभुत्व को चुनौती देने का दमखम सिर्फ भारत में है. यही वजह है कि चीन का रवैया भारत के प्रति आक्रामक है. इस संदर्भ में चीन के पाकिस्तान के प्रति मित्रता, नेपाल में अचानक सक्रियता, स्ट्रिंग्स ऑफ पर्ल की नीतियों को देखा जा सकता है. भविष्य में हिंद महासागर और लाइन ऑफ कंट्रोल पर चीन अपनी ताकत दिखा सकता है. पाकिस्तान आर्थिक तौर पर चीन पर निर्भर होता जा रहा है, जो ठीक नहीं. जिनपिंग को ताकत मिलने के बाद चीन भारत के पड़ोसी देशों में दखल बढ़ाने की कोशिश करेगा, जिससे भारत को नुकसान हो सके.

Xi Jinpingशी जिनपिंग का सर्वशक्तिमान रुप पूरे विश्व के लिए गंभीर चुनौती है

आर्थिक मदद और विकास का लालच देकर चीन ने भारत के उन पड़ोसियों पर भी डोरे डालने शुरू कर दिए, जिनकी सीमा भारत से लगती है. इस रुप में चीन के नेपाल से लेकर बांग्लादेश में अपनी पैठ मजबूत कर ली है, जिसमें अब और भी वृद्धि संभावित है. म्यांयामार के क्याकप्यू में भी चीन बंदरगाह बना रहा है. चीन ने डोकलाम के 73 दिनों के पिछले वर्ष के गतिरोध के बाद अब पुनः विवादित क्षेत्र से कुछ दूरी पर हैलीपेड तथा अन्य निर्माण कार्य शुरू कर दिए है. इससे चीनी आक्रामकता को समझा जा सकता है.

चीन को भी समझ लेना चाहिए कि वह लंबे समय तक विकास के नाम पर निवेश के बहाने छोटे देशों के संप्रभुता से नहीं खेल सकता. अगर उसकी साम्राज्यवादी विस्तार की छवि बनी रहेगी, तो चीन को काफी नुकसान उठाना होगा. यही कारण है कि शी जिनपिंग को पार्टी संबोधन में कहना पड़ा कि चीन से किसी को डरने की जरूरत नहीं है.

दक्षिण चीन सागर में शी जिनपिंग ने जिस तरह आक्रमक तरीके से दो तिहाई हिस्से पर अवैध कब्जा कर लिया, बिल्कुल उसी रणनीति को अपनाकर चीन हिंद महासागर में भी वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास कर रहा है. दक्षिण चीन सागर में चीन कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर अथवा वेधशाला का निर्माण कर अपने कब्जे को विस्तार देता रहा है. उसी तरह अब हिंद महासागर में वह छोटे-छोटे देशों से द्वीप खरीद रहा है. चीन मालदीव में वेधशाला निर्माण की तैयारी भी कर रहा है, जिससे वह हिंद महासागर में भी दक्षिण चीन सागर के तरह वर्चस्व स्थापित कर सके. ज्ञात हो दक्षिण चीन सागर में चीन ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के फैसले और विश्व समुदाय के भारी आलोचना के बावजूद अपना अवैध कब्जा हटाया नहीं है, बल्कि इसे आगे ही बढ़ाया है. भारत के लिए आवश्यक है कि वह भी हिंद महासागर में आक्रामक नीति को क्रियान्वित करे तथा मालदीव में जल्द से जल्द सुप्रीम कोर्ट को फिर से पुनर्स्थापित कर लोकतंत्र की रक्षा करते हुए, वहां चीनी प्रभाव को कम करे. ऐसे में भारतीय नेतृत्व को चीनी आक्रामक विदेश नीति से निपटने के लिए खुद को जल्द से जल्द तैयार करना होगा.

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लेखक

राहुल लाल राहुल लाल @rahul.lal.3110

लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं

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