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सियासत

बड़ा आर्टिकल  |   19-05-2017
आर.के.सिन्हा
आर.के.सिन्हा
  @RKSinha.Official
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बुनियादी सवालों से भटका कर जुमलेबाजी करने में लालू यादव वास्तव में बेजोड़ हैं. उसकी एक ताजा बानगी बिहार के राजगीर में हाल ही में राष्ट्रीय जनता दल(राजद) में आयोजित सम्मेलन में देखने को मिली. वहां पर राजद नेता लालू प्रसाद यादव ने यह बेहद गैर-राजनितिक और बेतुकी मांग कर दी कि देश के चारों पीठ में शंकराचार्य की नियुक्ति में भी आरक्षण लागू किया जाये.

लालू यही ड्रामा बिहार में करते रहे हैं. उन्होंने बिहार में बेरोजगारी दूर करने, निवेश आकर्षित करने, शिक्षा, स्वास्थ्य व्यवस्था, इंफ्रास्ट्कचर वगैरह को दुरुस्त करने जैसे मुद्दों को कभी भी गंभीरता से लिया ही नहीं. वे तो मात्र वोट बैंक की राजनीति करना जानते हैं. उनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि शंकराचार्य की नियुक्ति में आरक्षण करने से बिहार के सारे दुख दूर हो जाएंगे या उनके दुःख दूर हो जायेंगें? वे चाहते क्या हैं?

lalu yadav

पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के कैंपेन में विकास के सवाल पर लालू कतई फोकस नहीं कर रहे थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकास को सारी कैंपेन के केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है. पर लालू बिहार की जनता के सामने विकास का कोई रोडमैप नहीं रख पाए थे. था ही नहीं कोई रोडमैप! वे तो जाति के नाम पर वोट मांग रहे थे जो वे पिछले चालीस सालों से करते आए थे. इसी मानसिकता के चलते तो बिहार विकास की दौड़ में बाकी राज्यों से कहीं बहुत पीछे छूट गया.

मसखरे का दूसरा नाम

जुमलेबाजी और मसखरी के लिए मशहूर हो गए लालू बिहार में लंबे समय तक राज करते रहे. आजकल उनके दोनों पुत्र उपमुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री के पद को सुशोभित कर रहे हैं. उनसे पूछा जाना वाजिब रहेगा कि उन्होंने बिहार के औद्योगिक विकास के लिए चालीस साल में क्या किया? जब बाकी देश में विकास की बयार बहने लगी है तो उससे बिहार क्यों लाभान्वित नहीं हुआ? उनके पास अपने दामाद की बीयर फैक्ट्री गिनाने के अलावा शायद कुछ भी नहीं है.  

क्या यह भी किसी को बताने की जरूरत है कि गुजरे 25 सालों के बिहार में औद्योगिक क्षेत्र का रत्तीभर भी विकास नहीं हुआ. जो कुछ उद्योग थे भी अब पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं. बिहार के औद्योगिक क्षेत्र में पिछड़ेपन के कई कारण हैं. जैसे-

-    राज्य में नए उद्यमियों और पहले से चलने वाले उद्योगों के मसलों को हल करने के लिए कोई सिंगल विंडो सिस्टम नहीं बनाया गया.

-    बिहार में अपना कारोबार स्थापित करने वाले उद्योगों के लिए भूमि आवंटन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई.

-    राज्य में इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की कोई चीज लालू-राबड़ी-नीतीश के दौर मंा विकसित नहीं की गई.

यानी बिजली-पानी की आपूर्ति की कोई व्यवस्था पक्की नहीं है. सड़कें खस्ताहल हैं. ट्रासंपोर्ट व्यवस्था का भगवान ही मालिक है. इसके बावजूद लालू शंकराचार्य के नियुक्ति में आरक्षण की मांग कर रहे हैं. आखिर वे किस दुनिया में रहते हैं? क्या वे यह समझ रहे हैं कि बिहार की 12 करोड़ जनता अब भी उनके झांसे पट्टी में आनेवाली है.

सोचो बिहारी बच्चों की

राजद के सम्मेलन के पहले दिन उन्होंने अपनी तारीफ के पुल बंधवाये और दूसरे तथा अंतिम दिन शंकराचार्य के पदों में आरक्षण का मुद्दा उछाला. क्या उन्होंने कभी जाना कि बिहार से आजकल कम उम्र के लड़के-लड़कियों की तस्करी क्यों हो रही है? इन्हें घरों में, ढाबों, सस्ते होटलों में, कल कारखानों में मजदूरी करवाने के लिए देश के तमाम राज्यों में लेकर क्यों जाया जा रहा है?

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अब भारत सरकार के मूल्यांकन की संस्था नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के साल 2016 के आंकड़े एक चौंकानेवाली नई जानकारी का खुलासा कर रहे हैं. इसके मुताबिक, बीते साल बिहार में 3037 अल्पवयस्क लड़कियां गायब हुईं. यानी कि प्रतिदिन आठ या नौ. ये लड़कियां कहां और किस हाल में हैं, किसी को नहीं पता. राजगीर सम्मेलन में बिहार के नौनिहालों की हो रही तस्करी को लेकर किसी तरह की चिंता जाहिर नहीं की गई. सरकार से मांग भी नहीं की गई कि वे बिहारी बच्चों को राज्य से बाहर लेकर जाने वालों पर कार्रवाई करें.

क्या लालू को रत्तीभर भी परवाह नहीं है कि आखिर बिहार के बेटे-बेटियां कहां जा रहे हैं? क्या इनका कभी पता चल पायेगा? ज्यादातर लड़के-लड़कियां  स्कूल-कॉलेज या कोचिंग आने-जाने के दौरान ही गुम हो रहे हैं. बेशक, इस सारे खेल के पीछे मानव तस्कर सक्रिय हैं. लालू की राजद बिहार सरकार में शामिल है, उनके दल के कई मंत्री बिहार सरकार में शामिल हैं, पर मजाल है कि कभी किसी मंत्री ने इस सवाल पर आंसू बहाए हों. आखिर इन मानव तस्करों को राजनीतिक संरक्षण कौन प्रदान कर रहा है?  

किससे करते बातें ?

और बीते दिनों राजद के विवादास्पद नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन द्वारा सीवान जिला जेल से पुलिस की कार्यशैली के बारे में पार्टी प्रमुख लालू प्रसाद से फोन पर शिकायत करने का कथित ऑडियो बाहर आया. क्या उसके बाद भी आप लालू से कोई उम्मीद कर सकते हैं? रिपब्लिक टीवी समाचार चैनल ने लालू प्रसाद की मोहम्मद शहाबुद्दीन के साथ फोन पर हुई कथित बातचीत का ऑडियो टेप जारी करके लालू को कहीं का नहीं छोड़ा.

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ऑडियो टेप में शहाबुद्दीन रामनवमी के अवसर पर सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं किए जाने को लेकर सीवान के पुलिस अधीक्षक के खिलाफ लालू से शिकायत कर रहे हैं. लालू-शहाबुद्दीन की बातचीत के ऑडियो टेप ने बिहार में अपराधियों और सरकार की सांठगांठ को उजागर कर दिया है. अब उसी सरकार के खास घटक राजद के नेता जनता को भटकाने की कोशिश रहे हैं शंकराचार्यों की पीठ के आरक्षण की मांग करके.

बदहाल खेल संसार

बिहार को आप देश के पुरातन ज्ञान का केन्द्र या राजधानी मान सकते हैं. महावीर, बुद्ध और चार प्रथम शंकराचार्यों में एक (मंडन मिश्र) और भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तक को बिहार ने ही दिया. ज्ञान प्राप्त करने की प्यास हर एक बिहारी में सदैव बनी रहती है. यहां तक तो सब ठीक है. लेकिन, बिहार अब खेलेगा कब? लालू यादव के दोनों पुत्र बिहार सरकार में कई अहम विभागों को देखते हैं. दोनों युवा हैं. क्यों लालू उनसे नहीं कहते कि वे बिहार में खेलों का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करें. क्या लालू को पता है कि 10 करोड़ की आबादी वाला बिहार रियो ओलंपिक खेलों में भाग लेने गई भारतीय टोली में एक भी खिलाड़ी को नहीं भेज सका.

tejaswi yadav

रियो खेलों से पहले बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा था कि मुझे इस बात की खुशी है कि बड़ी तादाद में भारतीय खिलाड़ी इस बार ओलंपिक खेलों में भाग ले रहे हैं. पर एक बिहारी होने के नाते मुझे अत्यंत दुःख होता है कि बिहार का कोई भी खिलाड़ी रियो खेलों में बिहार का नाम रोशन करने के लिए नहीं गया. तेजस्वी इस स्थिति के चलते खासे आहत थे. वे राज्य के युवा मंत्री हैं. वे खुद बढ़िया क्रिकेटर भी रहे हैं. इसलिए बिहार की खेलों में दुर्दशा पर उनका आंसू बहाना समझ आता है. लेकिन, अब उन्हें आंसू बहाने की बजाए एक्टिव होने की जरूरत है ताकि बिहार में खेलों का चौतरफा विकास हो सके. उन्हें अपने माता-पिता से भी पूछना चाहिए कि इतने बरसों तक राज्य की कमान संभालने के बाद भी उन्होंने बिहार में खेलों का ठोस इंफ्रास्ट्रक्चर क्यों विकसित नहीं किया.

क्यों? यह एक एक बड़ा सवाल है. क्या सिर्फ ज्ञान अर्जित करना ही पर्याप्त है? बात राष्ट्रीय खेल हॉकी से शुरू करना चाहेंगे. समूचे बिहार में एक भी एस्ट्रो टर्फ से सुसज्जित हॉकी का मैदान नहीं है. हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 30 अगस्त, 2011 को खेल दिवस के अवसर पर पटना के फिजिकल ग्राउंड में घोषणा की थी कि इधर एस्ट्रो टर्फ बिछाया जाएगा. पर उधर एस्ट्रो टर्फ अभी तक नहीं बिछा.

राष्ट्रीय नायक दादा ध्यान चंद के जन्मदिन पर किए वादे को लेकर सरकारी उदासीनता देखने लायक है. यानी एक तो बिहार में खेलों का वैसे ही कल्चर नहीं है और ऊपर से सरकार की बेरुखी के चलते हालात बद से बदत्तर होते जा रहे हैं. क्यों लालू यादव बिहार के नौजवानों के लिए बिहार में ही खेलों की बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए नीतीश कुमार सरकार पर दबाव नहीं डालते? आजकल इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) सीजन चल रहा है. सारा देश क्रिकेटमय है. आपको जानकार हैरानी होगी कि इसमें बिहार से संबंध रखने वाला सिर्फ एक खिलाड़ी खेल रहा है. इसका नाम है इशान किशन. इशान पटना के राजेन्द्र नगर का नौजवान है.

अफसोस होता है कि बिहार जैसा ज्ञान से सरोबार सूबा विकास के रास्ते पर नहीं चल सका. और स्वीकार करना पड़ेगा कि बिहार को प्रगति के मार्ग से भटकाने में लालू यादव सरीखे नेताओं ने अपना पूरा योगदान दिया.

लालू जी, साधु-संतों की न तो कोई जात पूछता है, न वे बताते हैं. लेकिन, यदि आपको विश्वास न हो तो अपने ही समाज के बाबा रामदेव (यादव) जी से पूछ लीजिए या किसी कुंभ मेले में चले जाइए. हर जात के साधु-संत आपको बड़ी संख्या में मिल जाएंगे. लेकिन, साधु बनने के पहले सभी का संस्कार होता है और साधु जीवन पुनर्जन्म माना जाता है जिसमें कोई जात नहीं होती.

क्या कभी किसी ने संत रैदास या कबीर, रहीम या रसखान की जात पूछी है? क्या बड़े से बड़ा संत उन्हें नहीं पूछते?

“सिंहन के नहीं लेहड़े, पंछिन की नहीं पात!

दास मलूका कह गए साधून की नहीं जात!!

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लेखक

आर.के.सिन्हा आर.के.सिन्हा @rksinha.official

लेखक राज्यसभा सांसद हैं

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