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Updated: 12 जनवरी, 2022 07:30 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में भाजपा के सामने समाजवादी पार्टी को सबसे बड़े प्रतिद्वंदी के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं, बसपा और कांग्रेस जैसे सियासी दल सूबे में राजनीतिक तौर पर हाशिये पर माने जा रहे हैं. हालांकि, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि यूपी चुनाव में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने 'करो या मरो' वाली स्थिति बन चुकी है. जिसके चलते समाजवादी पार्टी ने भाजपा को घेरने के लिए यूपी चुनाव 2022 से पहले जाति से लेकर धर्म के समीकरणों को साधने की हरसंभव रणनीति अपनाई है. वैसे, 10 मार्च को आने वाले यूपी चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे कि ये रणनीतियां समाजवादी पार्टी के लिए कितनी मुफीद साबित होंगी? लेकिन, यूपी चुनाव को लेकर हो रही 'चिंता' का असर अखिलेश यादव के बयानों में भी साफ देखा जा सकता है. आजतक के 'पंचायत आजतक' कार्यक्रम में शिरकत करने आए अखिलेश यादव ने एक सवाल के जवाब में कहा कि 'अगर योगी आदित्यनाथ दोबारा यूपी के सीएम बन जाते हैं, तो वह प्रधानमंत्री बन जाएंगे.' आइए 3 प्वाइंट्स में जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ को पीएम क्यों बनाना चाहते हैं अखिलेश यादव?

Akhilesh Yadav Yogi Adityanathहिंदुत्व का फायरब्रांड चेहरा कहे जाने वाले योगी आदित्यनाथ को भाजपा ने एक जातिविहीन चेहरे के तौर पर पेश किया है.8

सीएम योगी भावनात्मक मुद्दों के मामले में अखिलेश पर भारी

माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव जाति और धर्म के आधार पर ही लड़ा जाता है. लेकिन, भाजपा ने हिंदुत्व का फायरब्रांड चेहरा कहे जाने वाले योगी आदित्यनाथ को को भाजपा ने एक जातिविहीन चेहरे के तौर पर पेश किया है. इतना ही नहीं, योगी आदित्यनाथ की वजह से भाजपा को जाति और धर्म की इस चुनावी पिच पर भावनात्मक मुद्दों को अहमियत देने का आसान रास्ता मिल गया है. सूबे में भाजपा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मुद्दों के सहारे खुद को एक मजबूत स्थिति में ले आई है. अयोध्या में राम मंदिर और वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के बाद अब 'मथुरा की तैयारी' के जरिये भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया है. और, बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं से जुड़े हिंदुत्व के इन मुद्दों पर समाजवादी पार्टी के पास कोई ठोस रणनीति नजर नहीं आती है. उलटा इन मुद्दों पर समाजवादी पार्टी भाजपा के निशाने पर आ जाती है. भाजपा की ओर से अयोध्या गोलीकांड में मारे गए कारसेवकों की मौतों के लिए समाजवादी पार्टी पर आरोप लगाया जाता रहा है. और, इन आरोपों से पीछा छुड़ाना समाजवादी पार्टी के लिए आसान नहीं है.

ये एक ऐसा भावनात्मक मुद्दा है, जिसका जवाब अखिलेश यादव के पास नही है. वहीं, सीएम योगी आदित्यनाथ इस मामले पर खुलकर अपनी राय रखते हैं. हाल ही में सीएम योगी ने दोबारा सत्ता में आने पर राम जन्मभूमि आंदोलन में शहीद हुए कारसेवकों के लिए भव्य स्मारक बनाने का एलान किया था. वैसे, 'पंचायत आजतक' कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने इन आरोपों के जवाब में कहा कि 'अगर कारसेवकों पर गोली चलाई गई थी, तो नेताजी (मुलायम सिंह यादव) पर एफआईआर होनी चाहिए थी. एफआईआर मस्जिद गिराने वालों पर हुई थी.' लेकिन, अखिलेश यादव ये कहते वक्त भूल जाते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले उनके ही पिता मुलायम सिंह यादव ने आजतक के साथ ही की गई एक बातचीत में कारसेवकों पर गोली चलवाने के लिए 'अफसोस' जताया था. लेकिन, इस मामले पर अखिलेश यादव अपनी वोट बैंक पॉलिटिक्स की वजह से खुलकर बोलने से कतराते हैं. वैसे, अखिलेश यादव ने सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिये इस मुद्दे को संभालने की कोशिश की है. लेकिन, कामयाबी चुनाव नतीजे तय करेंगे.

योगी आदित्यनाथ एक जातिविहीन चेहरा

समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद और जातिवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. और, समाजवादी पार्टी के ट्रैक रिकॉर्ड की बात की जाए, तो इन आरोपों में सच्चाई भी नजर आती है. क्योंकि, समाजवादी पार्टी ने अब तक यूपी की सत्ता में आने के लिए हर बार एमवाई समीकरण यानी मुस्लिम-यादव गठजोड़ को अपनाया है. हालांकि, इस बार अखिलेश यादव ने एमवाई समीकरण को महिला और युवा समीकरण के तौर पर पेश किया है. लेकिन, इस नए समीकरण का असर मतदाताओं पर कितना होगा, ये देखना दिलचस्प होगा. सपा सरकार के दौरान पूरे सूबे में 'यादव कुनबे' का असर किसी से छिपा नहीं रहा है. परिवारवाद के आरोपों से घिरी रहने वाली समाजवादी पार्टी में उत्तर प्रदेश की कई लोकसभा और विधानसभा सीटें 'यादव कुनबे' के रिजर्व मानी जाती हैं. वहीं, योगी आदित्यनाथ के तौर पर भाजपा के पास एक जातिविहीन चेहरा है. भले ही योगी आदित्यनाथ पर ठाकुरों को बढ़ावा देने के राजनीतिक आरोप लगाए जाएं. लेकिन, इन आरोपों को साबित करने के लिए किसी भी विपक्षी दल के पास कोई आंकड़ा नही है.

वहीं, योगी आदित्यनाथ परिवार या जातिवाद जैसी मुद्दों को उठाने वाले राजनीतिक दलों को सियासी तौर पर जवाब में भी आगे माने जाते हैं. बीते साल कोरोना की दूसरी लहर के दौरान सीएम योगी के पिता का निधन हो गया था. लेकिन, योगी आदित्यनाथ ने परिवार से ऊपर खुद को सूबे के मुखिया के तौर पर रखा और पिता के अंतिम संस्कार में न जाने का फैसला लिया था. हो सकता है कि सीएम योगी का ये फैसला राजनीतिक हो. लेकिन, उनके इस फैसले का सीधा असर भाजपा के ऊपर लगने वाले परिवारवाद के आरोपों को कमजोर करने के तौर पर हुआ. वहीं, भाजपा के संगठन से लेकर तमाम बड़े पदों पर सूबे में अपना प्रभाव रखने वाली सभी जातियों के नेताओं को शामिल किया गया है. केंद्र की मोदी सरकार से लेकर यूपी सरकार में कमजोर से लेकर सशक्त जातियों के नेताओं को भी बराबरी का दर्जा दिया गया है. जबकि, इसके उलट समाजवादी पार्टी की सरकार में एक ही जाति और परिवार का प्रभाव देखने को मिलता था. 

योगी की 'जीरो टॉलरेंस' नीति और सपा सरकार में हुए दंगे

2007 में बसपा सुप्रीमो मायावती की सरकार के दौरान कहा जाता था कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का बहुत बेहतर माहौल था. वैसे, देश का सबसे बड़ा सूबा होने की वजह से उत्तर प्रदेश को पूरी तरह से अपराध मुक्त नहीं कहा जा सकता है. लेकिन, सीएम योगी आदित्यनाथ ने यूपी में सरकार बनाने के साथ ही अपराधियों और माफियाओं पर नकेल कसने के लिए 'जीरो टॉलरेंस' नीति अपनाने का एलान किया था. इसका असर उत्तर प्रदेश में काफी हद तक नजर भी आता है. सीएम योगी कई बार कह चुके हैं कि भाजपा सरकार के शासन के दौरान प्रदेश में कानून व्यवस्था सुधरी है. उन्होंने उत्तर प्रदेश के 'दंगामुक्त प्रदेश' होने का भी दावा किया है. 'पंचायत आजतक' कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने इन दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़े देख लीजिए.

वैसे, NCRB के आंकड़ों के अनुसार, अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में यूपी में 815 सांप्रदायिक दंगों की घटनाएं दर्ज हैं. वहीं, योगी आदित्यनाथ की सरकार के दौरान ये आंकड़ा 195 है. NCRB के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के साल यानी 2017 में ही ये सभी दंगे हुए थे. लेकिन, 2018, 2019, 2020 में सांप्रदायिक दंगों की एक भी घटनाएं दर्ज नही हुई हैं. आसान शब्दों में कहा जाए, तो NCRB के आंकड़े बताते हैं कि सांप्रदायिक दंगों के मामले में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार और योगी आदित्यनाथ सरकार के बीच जमीन-आसमान का अंतर है. योगी आदित्यनाथ को सूबे में एक कुशल प्रशासक के तौर पर पहचान मिली है.

खैर, योगी आदित्यनाथ को पीएम बनाने की बात कहने के पीछे अखिलेश यादव का केवल इतना ही तर्क समझ आता है कि ऐसा हुए बिना समाजवादी पार्टी के लिए इन तमाम मुद्दों को छूना मुश्किल है. आसान शब्दों में कहा जाए, तो अखिलेश यादव की नजर सीएम योगी आदित्यनाथ के पीएम बनने से यूपी में बनने वाले राजनीतिक स्पेस की ओर है. क्योंकि, ऐसी स्थिति में सूबे में बने इस राजनीतिक स्पेस को भरना भाजपा के लिए भी आसान नहीं होगा. और, अखिलेश यादव सूबे में उपजने वाले इस राजनीतिक स्पेस में खुद को फिट करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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