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Updated: 20 अप्रिल, 2018 04:26 PM
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वर्ष 2004 में 'शाइनिंग इंडिया' का नारा फेल होने के बाद सत्ता एक बार फिर कांग्रेस पार्टी के हाथ में पहुंची. तमाम विरोध, नाटक और ड्रामा के बाद मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने. देश एक बार फिर अपनी विकासगाथा को नापने वाली मशीन जीडीपी को बढ़ाने कि जुगत में जुट गई. अपने आर्थिक ज्ञान को हार्वर्ड जैसी जगह से साधने वाले मनमोहन सिंह खुद तो कुछ नहीं बोल रहे थे लेकिन देश की अर्थव्यवस्था उनके मौन की गूंज को सार्थक बना रही थी.

9% की विकास दर हमें उसी दौर में एक आर्थिक ताकत बनने का सुखद एहसास करा रही थी. कृषि विकास दर अच्छा होने से किसान भी बहुत हद तक संतुष्ट थे. तभी देश में अचानक भ्रष्टाचार का एटम बम फूटा. बदहवासी छा गई. लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था, शायद एक ग़रीब देश में इतने बड़े भ्रष्टाचार की कल्पना नहीं कर पा रहे थे. अखबारों के पहले पन्ने पर इतने जीरो थे कि गिनते-गिनते गिनती भूल जाते थे.

manmohan singh 1 लाख 76 हज़ार करोड़ के 2G घोटाले ने मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री का अंकगणित बिगाड़ दिया

किसी छोटे देश की अर्थव्यवस्था के बराबर होने वाले इस तथाकथित घोटाले का नाम 2G स्कैम था. और इस तथाकथित घोटाले के तथाकथित घोटालेबाज़ थे ए राजा. मनमोहन सरकार के दूरसंचार मंत्री ने पूरी दुनिया का आकर्षण अपनी ओर खींच लिया था. इसके बाद शुरू हुआ सियासी ड्रामा. ऐसे इस घोटाले ने उन भ्रष्ट नेताओं को भी नैतिक बल दिया जो छोटे-मोटे घोटाले कर के कुंठित महसूस कर रहे थे. 1 लाख 76 हज़ार करोड़ की राशि ने मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री का अंकगणित बिगाड़ दिया. तमाम आलोचनाओं को झेलने के बाद सरकार ने सीबीआई जांच का आदेश दिया. ए राजा और कनिमोझी को सलाखों के पीछे डाल दिया गया.

इस तथाकथित घोटाले ने निष्क्रिय पड़ी भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर से सक्रिय कर दिया. प्रेस कॉन्फ्रेंस का दौर चला, संसद से लेकर सड़क तक सरकार को शर्मसार होने की नसीहत दी जाने लगी. इस घोटाले ने पूरे देश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का काम किया. देश के वर्तमान प्रधान सेवक अपनी हर रैली में लोगों को घोटाले की राशि याद दिला रहे थे. कुल मिलाकर भाजपा ने ठीक-ठाक पॉलिटिकल माइलेज बटोरा.

a raja, kanimozhiसबूतों के आभाव में ए राजा और कनिमोझी मामले से बरी 

21 दिसंबर 2017 को देश के तथाकथित सबसे बड़े घोटालेबाज़ ए राजा और उसके साथ 18 आरोपियों को सबूत के अभाव में दिल्ली की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने बरी कर दिया. खैर, कोई बात नहीं, मोदी प्रधानमंत्री बन चुके थे. ऐसे भी मकसद पूरा होने के बाद नेताओं के लिए कोई भी चीज अप्रासंगिक हो जाती है.

भगवा आतंकवाद का कुचक्र

अब बात करते हैं हाल ही में आए एक फैसले की. मक्का-मस्जिद ब्लास्ट के तथाकथित दोषी स्वामी असीमानंद को एनआईए की विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी सबूत पेश करने में नाकाम रही. ये वास्तव में नाकाम होती हैं या तत्कालीन दौर के राजनीतिक स्वार्थ की हवस का हिसाब चुका रही होती हैं. जिस दौर में फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी की खुफिया पुलिस आईएस के हमलों को नाकाम करने में असफल है, उसी समय एनआईए आईएस से जुड़े तमाम लोगों की गिरफ्तारियों के साथ भारत में उनकी योजना को लगातार विफल कर रही हैं. इनकी कार्यशैली और बुद्धिमता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.  

aseemanandमक्का-मस्जिद ब्लास्ट के तथाकथित दोषी स्वामी असीमानंद भी सबूतों के आभाव में बरी

भगवा आतंकवाद का जुमला गढ़ने वाले देश के तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदंबरम को इसका जवाब देना चाहिए कि आखिर 2007 में मक्का-मस्जिद में धमाका किसने किए थे? स्वामी असीमानंद हों या साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, आज किसी के खिलाफ सबूत नहीं मिल सके. राजनीतिक विद्वेष ने मर्यादा नाम के शब्द का क़त्ल किया है. कांग्रेस के बहुतेरे नेताओं ने उनके शासन में हुए अनगिनत घोटालों की चर्चा का काट हिन्दू आंतकवाद के रूप में निकाला. जगजाहिर है कि इस फ़िज़ूल के थ्योरी को सिद्ध करने में नुकसान तो अंततः देश का ही हुआ.

भाजपा ने तथाकथित 2G घोटाले से राजनीतिक मलाई का स्वाद चखा और कांग्रेस ने फर्जी में देश का माहौल खराब किया. आज दोनों कांड के तथाकथित आरोपी जेल से बाहर हैं. दोनों पार्टियां भी बहुत संयम बरत रही हैं. एक दूसरे के प्रति राजनीतिक दायित्व का पूरी लगन के साथ निर्वहन कर रही हैं. मैंने पहले ही कहा था कि मकसद पूरा होने के बाद कोई भी मुद्दा नेताओं के लिए अप्रासंगिक हो जाता है.

कंटेंट- विकास कुमार (इंटर्न, इंडिया टुडे)

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