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सियासत

 |  5-मिनट में पढ़ें  |   16-04-2018
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए धमाके पर एनआईए की स्पेशल कोर्ट का फैसला आ गया है. 18 मई 2007 को जुमे की नमाज के दौरान हुए इस धमाके में 11 लोगों की मौत हो गई थी और 58 लोग घायल हो गए थे. अब करीब 11 साल बाद इस मामले का जो फैसला आया है उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. इस मामले में कोर्ट ट्रायल से गुजर रहे असीमानंद समेत सभी 5 आरोपियों को बरी कर दिया गया है, जबकि इस मामले में कुल 10 लोगों को आरोपी बनाया गया था. 11 साल तक ये मामला चलता रहा, लेकिन बावजूद इसके किसी को भी सजा नहीं हुई. आखिर इसका मतलब क्या है? क्या ये सभी 5 आरोपी निर्दोष हैं? कोर्ट का फैसला तो यही कहता है. और अगर ये निर्दोष हैं तो जो यातना इन्होंने इतने सालों में झेली है, उसकी भरपाई कौन करेगा?

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एक के बाद एक पलटते गए गवाह

एनआईए ने कोर्ट के सामने जो सबूत और गवाह पेश किए उसे कोर्ट ने नाकाफी माना. इस मामले में एक के बाद एक गवाह पलटते गए, जिसकी वजह से अब ये फैसला सामने आया है. आपको बता दें कि इस मामले में सीबीआई अधिकारियों ने 68 चश्मदीद गवाह पेश किए थे, लेकिन 54 अपनी गवाही से मुकर चुके हैं. यही वजह है कि 11 सालों से चले आ रहे इस केस का फैसला महज दो मिनट में सुना दिया गया. इन पांचों आरोपियों के नाम स्वामी असीमानंद सहित, देवेन्द्र गुप्ता, लोकेश शर्मा उर्फ अजय तिवारी, लक्ष्मण दास महाराज, मोहनलाल रतेश्वर और राजेंद्र चौधरी है.

कितनी 'सजा' काट चुके हैं आरोपी?

- इस मामले में असीमानंद को सीबीआई ने 19 नवंबर 2010 को गिरफ्तार किया था. उसके बाद 23 मार्च 2017 को असीमानंद को जमानत पर रिहा कर दिया गया. उन्हें 50-50 हजार रुपए की दो जमानत देनी पड़ी और साथ ही कोर्ट ने असीमानंद के सामने हैदराबाद न छोड़ने की शर्त भी रखी. इतना सब होने के बाद असीमानंद जेल से बाहर आ पाए.

- असीमानंद के अलावा फरवरी 2011 में गिरफ्तार किए गए मोहनलाल रतेश्वर को भी कोर्ट ने 23 मार्च 2017 को जमानत पर रिहा कर दिया था.

- मामले में दो अन्य आरोपी लोकेश शर्मा और देवेंद्र गुप्ता को राजस्थान एटीएस ने 2010 में गिरफ्तार किया गया था, जिन्हें नवंबर 2012 में जमानत मिली, लेकिन दिसंबर 2012 में ही उनकी जमानत रद्द भी कर दी गई. उसके बाद से वह जेल में ही थे.

- इनके अलावा बचे लक्ष्मण दास महाराज उर्फ राजेंद्र चौधरी को एनआईए ने दिसंबर 2012 में गिरफ्तार किया था, जो अभी तक जेल की सलाखों के पीछे थे. उन्हें भी अब मक्का मस्जिद धमाके के मामले में रिहा कर दिया गया है.

इससे पहले 7 साल सजा काट चुके हैं ये 4 लोग

मामले की जांच के लिए बनी हैदराबाद पुलिस की स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम ने 26 जून 2007 को इस मामले में 4 आरोपियों शोएब जागिरदार, सईद इमरान, अब्दुल नईम और रफिउद्दीन अहमद को गिरफ्तार किया था. इन सभी पर आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया गया था, लेकिन पुलिस इनके खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकी और अंत में कोर्ट ने सभी को रिहा कर दिया. सवाल वही है, अगर ये चारों लोग निर्दोष थे तो दोषी कौन है? और इन लोगों ने जो 7 साल की जेल की सजा काटी है उसकी भरपाई कैसे होगी?

कुल 10 थे आरोपी, तो बाकी का क्या हुआ?

इस मामले में कुल 10 आरोपी थे. अन्य 5 आरोपियों में से दो डांगे और कलसांगरा फरार हैं. एक अन्य आरोपी जोशी को तीन अज्ञात लोगों ने 29 दिसंबर 2007 को मध्य प्रदेश के देवास में उन्हीं के घर के सामने गोली मार दी थी. इसके अलावा अन्य दो आरोपियों परमार और चौहान के खिलाफ अभी भी जांच चल रही है.

केंद्र की यूपीए सरकार ने इन्‍हें 'हिंदू टेरर' का चेहरा बताया था

मक्‍का मस्जिद ब्‍लास्‍ट के मामले में जिस तरह से केंद्रीय जांच एजे‍ंसियों ने एक के बाद एक गिरफ्तारियां कीं, उससे प्रभावित होकर तत्‍कालीन यूपीए सरकार में गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे और पी चिदंबरम ने इसे हिंदू टेरर की संज्ञा दे डाली. शिंदे ने कांग्रेस के एक सम्‍मेलन में बोलते हुए हिंदू संगठनों के आतंकी घटनाओं में शामिल होने की ओर इशारा किया. काफी विवाद के बाद भी हालांकि उन्‍होंने अपने बयान के लिए माफी मांगी. लेकिन दिग्व‍िजय सिंह तो मुंबई हमले के पीछे भी हिंदू संगठनों का हाथ होने का आरोप लगाते रहे हैं.

फैसले के बाद बीजेपी ने कांग्रेस से जवाब मांगना शुरू किया

जैसे ही मक्का मस्जिद केस में कोर्ट का फैसला आया, वैसे ही भाजपा के प्रवक्ता संबित पात्रा ने बयान दिया कि पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भगवा आतंकवाद की बात कही थी. हिंदू धर्म का इतना बड़ा अपमान करने के लिए राहुल गांधी और सोनिया गांधी को माफी मांगनी चाहिए. भाजपा ने शुरुआत कर दी है, अब बाकी राजनीतिक पार्टियां भी इस मामले को भुनाने मैदान में उतरेंगी, लेकिन सवाल वहीं का वहीं रहेगा कि अगर ये सभी निर्दोष हैं तो अब तक इन्‍हें किस जुर्म की सजा मिली है?

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