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Updated: 12 अप्रिल, 2018 09:31 PM
प्रवीण शेखर
प्रवीण शेखर
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वॉक आउट, गतिरोध, व्यंग्य के तीर, कुछ मजाकिया नोंकझोंक, ये कुछ ऐसी प्रथाएं हैं जो संसदीय कार्यवाही को जीवंत बनाते हैं. साथ ही बहस के बुनियादी ढांचें को बनाए रखने में भी मदद करते हैं. यह तभी संभव हो पाता है जब संसद निर्धारित तिथियों पर चलती है, पर्याप्त बैठकें होती हैं और, सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सभा सुचारू रूप से चलती है.

हमारे संविधान में प्रावधान है कि संसद के दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए. इसलिए, राष्ट्रपति साल में तीन बार संसद सत्र आयोजित करते हैं. लेकिन दुनिया के कुछ प्रमुख संसदों की तुलना में, भारतीय संसद की औसत वार्षिक बैठकों और कार्यवाही में बिताए गए समय बहुत कम हैं.

इंग्लैंड का हाउस ऑफ कॉमन्स- एक साल में औसतन 140 दिन, 1,670 घंटे काम करता है. वहीं अमेरिकी संसद- 136 दिन, 2000 घंटे, ऑस्ट्रेलिया की संसद- 64 दिन, 626 घंटों में काम करता है. जबकि भारतीय संसद का कार्यकाल बहुत ही कम समय के लिए- 64 दिन, 337 घंटे तक का ही होता है.

15वीं लोकसभा में कुल 357 बैठकें हुईं थीं. सदन केवल 1,344 घंटों के लिए बैठी थी, जिसमें से अवरोधों और स्थगन के कारण 891 घंटे बर्बाद हो गए थे. यह हाल तब था जब 2जी स्पेक्ट्रम, आदर्श सोसायटी, राष्ट्रमंडल खेलों, कोयला खानों का आवंटन जैसे घोटाले संसद के सामने आए थे. अलग तेलंगाना राज्य के मुद्दे पर संसद की कार्यवाही कई बार स्थगित कर दी गई थी. 16वीं लोकसभा के पहले कुछ सत्र शांतिपूर्ण ढंग से और निर्बाध रूप से चले, लेकिन अंतिम बैठक में बार-बार रुकावटें और स्थगन हुए.

सदस्यों ने रुकावट के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाया, कुछ सदस्य प्लेकार्ड लिए हुए वेल में आ जा रहे थे. सदन के नियमों के अनुसार, जब संसद सदस्य वेल में आ जाते हैं तो नियमत: प्रेसिडिंग ऑफिसर को सदन की कार्यवाही स्थगित कर देनी चाहिए. सदन के आखिरी सत्र में, एक तरफ जहां कैबिनेट के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को स्पीकर ने ये कहते हुए खारिज कर दिया था कि सदन ढंग से काम नहीं कर रहा है. वहीं दूसरी तरफ, केंद्रीय बजट सहित कई महत्वपूर्ण बिलों को बिना किसी चर्चा और बहस के पारित कर दिया गया था.

parliament, opposition, BJPहंगामों की बलि चढ़ते संसद सत्र के लिए जिम्मेदार कौन?

इस चीज का मूल्यांकन करना चाहिए और अनुमान लगाना चाहिए कि संसद के व्यवधानों पर कितनी लागत खर्च होती है. बार-बार रुकावटें और स्थगन, न केवल संसद की क्षमता को कम करते हैं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र की अवधारणा को भी नष्ट करते हैं. संसद को देश के ज्वलंत मुद्दों और सामने आने वाली समस्याओं पर चर्चा करनी चाहिए, इसे लोगों की उम्मीदों और आशाओं पर चर्चा करना चाहिए ताकि देश के लोगों को जितनी जल्दी संभव हो एक जवाबदेह प्रशासन प्रदान किया जा सके. लोगों अपने प्रतिनिधियों को इस उम्मीद के साथ चुनते हैं कि वो संसद में सार्थक वाद-विवाद करेंगे, सांसद अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे ताकि अच्छे कानून बनाए जाएं.

लेकिन आज की स्थिति यह है कि निर्वाचित प्रतिनिधि (कुछ अपवादों को छोड़ दें तो) सार्वजनिक प्रतिनिधियों की तरह कम और अपने दलों के नुमाइंदों की तरह ज्यादा व्यवहार कर रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे माननीय सदस्यों ने अपना ज्ञान खो दिया है. वे केवल अपनी पार्टी के आदेशों को सुनते हैं. उनकी पूरी ऊर्जा और ध्यान अगला चुनाव जीतने पर है. कई बार, वरिष्ठ सांसदों ने अपने साथी सांसदों के व्यवहार पर अपना रोष व्यक्त किया है.

एक समय तो वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, संसद के मामलों से इतने परेशान हो गए थे कि उन्होंने लोकसभा में ये तक कह डाला कि उनका अंतर्मन सदन से  इस्तीफा दे दें. लोकतंत्र में एक कहावत है कि- अल्पसंख्यक वो बोलते हैं जो उनके मन होता है, लेकिन बहुसंख्यक लोग वो करते हैं जो उनके दिमाग में होता है. शायद इसलिए ही संसदीय लोकतंत्र को बहुमत की तानाशाही कहा जाता है. लेकिन अब स्थिति बदल गई है. अब अल्पसंख्यक दल बाधाएं खड़ी करते हैं और बहुमत  वाली पार्टी संसद में चर्चा या बहस नहीं करती. हर सांसद और राजनीतिक दल को संसद में अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का संवैधानिक अधिकार है.

अगर वे असंतुष्ट हैं या असहमत हैं, तो वे उसे व्यक्त कर सकते हैं या वे उसका विरोध कर सकते हैं और सदन से बाहर निकल सकते हैं. लेकिन इसके बजाय वो  सदन में लगातार व्यावधान खड़ी करते हैं, जिसकी वजह से पीठासीन अधिकारियों को सदन की कार्यवाही रोकने के लिए मजबूर होना पड़ता है और इस प्रक्रिया में सदन का कामकाज प्रभावित होता है.

क्या सदन को बार बार स्थगित करना विरोध का एक नया तरीका बन जाएगा? क्या भविष्य में संसद में बहस का विकल्प विरोध और प्रदर्शन बन जाएगा? क्या अब समय आ गया है कि सदन की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप करने वाले सांसदों की सदस्यता को रद्द कर दिया जाए?

यह समझना भी जरुरी है कि सांसदों का महत्व केवल सरकार बनाने या सरकार को बचाने के लिए ही नहीं है. सत्ताधारी पार्टी के कंधों पर एक विशेष जिम्मेदारी होती है कि वो संसद के बाहर भी विपक्ष के साथ संवाद का मार्ग खुला रखते हैं, संवाद शुरू करती है, विश्वास और समन्वय का निर्माण करती है, और क्षेत्रीय दलों और विपक्ष के साथ "सहकारी संघवाद" के सिद्धांतों का पालन करते हैं.

संसद में बहस और रचनात्मक चर्चा होनी चाहिए. सदन की कार्यवाही स्थापित नियमों के अनुसार होनी चाहिए. और  इंग्लैंड के हाउस ऑफ कॉमन्स के स्पीकर की तरह ही लोकसभा के अध्यक्ष को भी सभी वर्गों का विश्वास मिला होना चाहिए.

वास्तव में तभी भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जा सकता है.

(DailyO से साभार)

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प्रवीण शेखर प्रवीण शेखर @praveen.shekhar.37

लेखक इंडिया ग्रुप में सीनियर प्रोड्यूसर हैं

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