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Updated: 25 सितम्बर, 2019 05:29 PM
प्रभाष कुमार दत्ता
प्रभाष कुमार दत्ता
  @PrabhashKDutta
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कहते हैं राजनीति की तरह ही कूटनीति को भी अपने एक्शन के जरिए दिखाया जाता है. इसे अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पीएम मोदी और इमरान खान से मुलाकात से जोड़कर देखा जाए तो एक खास तस्वीर सामने आती है. जहां एक ओर पीएम मोदी ने टेक्सास के ह्यूस्टन में आयोजित हुए हाउडी मोदी इवेंट के जरिए ट्रंप को मिनी इंडिया दिखाया, वहीं दूसरी ओर जब ट्रंप और इमरान खान की मुलाकात हुई तो सब कुछ काफी साधारण सा दिखा. न्यूयॉर्क में दोनों ने मुलाकात के बाद एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की.

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो बातें हुईं उनमें डोनाल्ड ट्रंप का ही डोमिनेशन दिखा, लेकिन लोगों की नजरें ने वहां कुछ और भी नोटिस किया. जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप अपनी बात कह रहे थे, उस समय इमरान खान इबादत करते हुए मिस्बाह यानी तस्बी गिन रहे थे. ये खासतौर पर उस वक्त नोटिस में आया जब कश्मीर घाटी की स्थिति के संदर्भ में डोनाल्ड ट्रंप से भारत-पाकिस्तान रिश्तों के बारे में सवाल किया गया.

जब इमरान खान देख रहे थे, उस दौरान ट्रंप ने कहा कि पीएम मोदी ने ह्यूस्टन में कई आक्रामक बातें कहीं, जिन्हें 50 हजार से भी अधिक सुनने वालों ने सराहा. इसी बीच एक पत्रकार ने जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर सवाल किया तो डोनाल्ड ट्रंप ने इमरान खान की ओर देखते हुए कमेंट किया- 'आपको कहां से मिलते हैं ऐसे पत्रकार?'

इमरान खान, डोनाल्ड ट्रंप, पाकिस्तान, मुस्लिमट्रंप के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इमरान खान मिस्बाह के जरिए इबादत करते दिखे.

इस सवाल के जवाब में जब वह विस्तृत जवाब दे रहे थे, उस दौरान इमरान खान मिस्बाह गिनते हुए इबादत में लगे हुए थे. जुलाई में जब इमरान खान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से मिले थे तो उस दौरान उनके हाथों में मिस्बाह नहीं था. इस बार उनके हाथों में मिस्बाह देखे जाने को उनकी उन कोशिशों में से एक माना जा रहा है, जिनके जरिए वह मोदी सरकार द्वारा कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद खुद को मुस्लिमों के हिमायती की तरह पेश करना चाहते हैं.

आगे बढ़ने से पहले ये जान लीजिए कि मिस्बाह क्या होता है. इसे तस्बी भी कहते हैं. लगभग हर धर्म में ऐसी माला होती ही है, लेकिन सब अलग-अलग होती हैं. इस्लाम में मिस्बाह में 99 दाने होते हैं, जो अल्लाह के 99 नामों के प्रतीक होते हैं. एक छोटी मिस्बाह भी होती है, जिसमें 33 दाने होते हैं. इमरान खान जिस मिस्बाह से इबादत कर रहे थे, वह छोटी वाली थी, जिसके जरिए इबादत पूरी करने के लिए माला के 3 फेरे लगाने होते हैं, ताकि संख्या 99 हो सके.

अब बात कश्मीर कनेक्शन की. पाकिस्तान 1947 में आजाद होने के बाद से ही कश्मीर पर अपना दावा इस तर्क के साथ करता रहा है कि वहां की अधिकतर आबादी मुस्लिम है. धर्म के नाम पर पाकिस्तान की सरकारें जम्मू-कश्मीर अक्सर ही माहौल बिगाड़ने की कोशिश करती रही हैं, खास कर कश्मीर घाटी में. हालांकि, जम्मू-कश्मीर में मतदान का बढ़ना ये साफ करता है कि लोग भारत की ओर अपना झुकाव दिखा रहे हैं. इस वजह से पाकिस्तान की पूरी कोशिश रही है कि वह आतंकवाद के जरिए घाटी का माहौल बिगाड़े रखे.

जब नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाया तो इमरान खान ने दुनिया भर के मुस्लिमों से एक होकर इसका विरोध करने की गुहार लगाई. आपको बता दें कि मोदी सरकार ने साफ कहा है कि धारा 370 की वजह से ही पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों की फंडिंग करने और आतंकवाद को फैलाने में मदद मिलती थी.

इमरान खान लगातार खुद को दुनियाभर के मुस्लिमों के लीडर की तरह दिखाने की कोशिश करते रहे हैं और उन्हें भारत के खिलाफ खड़ा होने को कहते रहे हैं. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भी कश्मीर मुद्दे को उठाते हुए कहा- 'लोग भारत के खिलाफ खड़े होंगे, और यहां बात सिर्फ हिंदुस्तान के मुस्लिमों की नहीं हो रही है, दुनिया भर में 1.25 अरब मुस्लिम हैं, वो ये सब देख रहे हैं.' ये तरीका पाकिस्तान में इमरान खान की राजनीति को सूट करता है, जो कि उन लोगों के इशारों पर चलती है, जिन्हें देश में चल रहे आतंकी संगठनों का संरक्षण मिला हुआ है. इमरान खान हमेशा से ही पाकिस्तान की राजनीति में खुद की जगह बनाने के लिए धर्म का इस्तेमाल करते रहे हैं. हालांकि, धर्म के लिए उनका लगाव उनकी जिंदगी में काफी समय बाद देखने को मिला.

अपने क्रिकेट के दिनों में जब वह पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान थे और 1992 का विश्व कप जीता था, तब वह धर्म में इतनी दिलचस्पी नहीं लेते थे. बल्कि उन्होंने तो ये तक माना था कि वह धर्म में बहुत कम भरोसा करते हैं, क्योंकि उनकी मां की मौत कैंसर की वजह से हो गई थी. उनकी मां की मौत के बाद उन्होंने कैंसर के एक अस्पताल के पैसे तक जुटाने का काम किया था. उन्होंने 1996 में राजनीति में कदम रखा और तभी पहली बार उन्होंने इस्लाम में अपनी रुचि दिखाई. कई सालों के बाद 2012 में उन्होंने एक आर्टिकल लिखा, जिसका शीर्षक था- 'धर्म में मेरी यात्रा' (My Journey into Religion). ये आर्टिकल सऊदी अरब के अरब न्यूज में छपा था, जहां उन्होंने दावा किया था वह इस्लाम की ओर एक किताब पढ़ने के बाद मुड़े, जिसका नाम था Satanic Verses, जिसे भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी ने लिखी थी.

जैसे-जैसे वह राजनीति में आगे बढ़ते रहे, उन्होंने अपने संदेशों के जरिए धार्मिक फंडामेंटलिस्ट समूहों का समर्थन करना शुरू कर दिया. ये समर्थन इतना अधिक बढ़ गया कि उन्हें 'तालिबान खान' तक कहा जाने लगा. लेकिन उन्हीं लोगों ने 2018 में इमरान खान को सत्ता भी सौंप दी. जीतने के बाद उन्होंने 'नया पाकिस्तान' बनाने की बात कही, जिसकी एक नई इस्लामिक पहचान होगी. उनका ये मुस्लिम कार्ड कश्मीर में फेल हो गया और उन्हें दुनिया भर के मुस्लिमों का साथ नहीं मिला. दुनिया भर के मुस्लिमों का लीडर बनने की उनकी ख्वाहिश धरी की धरी रह गई. अब इमरान खान फिर से पाकिस्तान के अपने ही समर्थकों का भरोसा जीतने की कोशिश में लगे हैं. ट्रंप के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मिस्बाह गिनते हुए इबादत कर के इमरान खान अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं.

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लेखक

प्रभाष कुमार दत्ता प्रभाष कुमार दत्ता @prabhashkdutta

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में असिस्टेंट एडीटर हैं.

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