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Updated: 17 मार्च, 2017 05:15 PM
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एसएम कृष्णा का बीजेपी ज्वाइन करने का कार्यक्रम हफ्ते भर के लिए टल गया है. कृष्णा को उनकी बहन की मौत के कारण बेंगलुरू जाना पड़ा. कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा से कृष्णा की मुलाकात के बाद से ही उनके बीजेपी में शामिल होने की चर्चा होने लगी थी.

यूपी सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के चलते कृष्णा के बीजेपी में आने की औपचारिकताएं रुकी हुई थीं.

माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कृष्णा की अहम भूमिका होगी - हालांकि, वो 9 अप्रैल को दो सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव में भी बीजेपी का प्रचार कर सकते हैं.

उम्र की सीमा ही तो बंधन है

इसी साल 29 जनवरी को जब एसएम कृष्णा ने कांग्रेस छोड़ने की घोषणा की तो कहा था, "कोई भी पार्टी, जहां उम्र और अनुभव का कोई मूल्य न हो, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं होगा. उम्र को अहमियत देनी ही होगी. बड़े ही दुख के साथ मैंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया और इस पर कायम रहूंगा." कृष्णा 46 साल तक कांग्रेस में रहे और बड़े ही दुखी मन से उन्होंने पार्टी छोड़ने की घोषणा की. वो 2012 तक यूपीए सरकार में विदेश मंत्री रहे. जब भी उनके कार्यकाल की बात होती है तो यूएन में उनका भाषण बरबस याद आ जाता है जब वो किसी और के स्पीच की कॉपी अचानक पढ़ने लगे थे.

yeddi-krishna_650a_031617065254.jpgवोक्कालिगा समुदाय में पैठ की कोशिश में बीजेपी

जिस उम्र में कृष्णा बीजेपी का दामन थामने जा रहे हैं उस उम्र के ज्यादातर नेता हाशिये पर पहुंचा दिये गये हैं. सात बार के विधायक 77 साल के श्यामदेव रॉय चौधरी को बीजेपी ने बनारस में टिकट तक न दिया, 76 साल की नजमा हेपतुल्ला को मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा. अगर यूपी चुनाव न होता तो 75 साल के कलराज मिश्रा भी शायद ही मोदी कैबिनेट का हिस्सा होते.

मार्गदर्शक मंडल का तो गठन ही बीजेपी में इसीलिए हुआ था - जहां 89 साल के लालकृष्ण आडवाणी और 83 साल के मुरली मनोहर जोशी भेज दिये गये हैं. 85 साल के यशवंत सिन्हा जब तब कश्मीर में अलगाववादियों से बातचीत के बहाने अपनी भूमिका तलाशते रहते हैं. बिहार चुनाव के नतीजों के बाद जरूर इन्हें कुछ कहने का मौका मिला था, लेकिन यूपी चुनाव के नतीजे तो हर किसी की बोलती बंद करने के लिए काफी हैं.

कृष्णा के मामले में सहज तौर पर किसी का भी यही सवाल होगा कि जिस बीजेपी में नेताओं के 70 पहुंचते ही मार्गदर्शक मंडल की तलवार लटकने लगती हो, वहां कृष्णा जैसे बुजुर्ग नेता आखिर कौन सा ख्वाब संजोए हुए हो सकते हैं.

किसे क्या फायदा मिलेगा

कर्नाटक में दो समुदायों का दबदबा है - वोक्कालिगा और लिंगायत. बीजेपी की लिंगायत समुदाय पर तो अच्छी पकड़ है लेकिन उससे आगे बढ़ने में उसे अब तक कामयाबी नहीं मिल पायी है.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी रह चुके कृष्णा का वैसे तो कोई बहुत बड़ा जनाधार नहीं है लेकिन वोक्कालिगा समुदाय के वो बड़े नेता माने जाते हैं. ऐसे में जबकि बीजेपी की छवि और पैठ लिंगायत समुदाय तक ही सिमटी हुई है, कृष्णा के आने से दक्षिण कर्नाटक के कई जिलों में बीजेपी को फायदा मिल सकता है जहां उसे कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर से पिछड़ना पड़ता है.

फिलहाल मैसूर इलाके की दो विधानसभा सीटों के लिए इसी 9 अप्रैल को उपचुनाव होने वाले हैं. समझा जा रहा है कि कृष्णा इसमें बीजेपी के लिए चुनाव प्रचार कर सकते हैं.

बीजेपी ये चुनाव हर हाल में जीतना चाहती है ताकि वो मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के लिए जनमत संग्रह के तौर पर पेश कर सके. अगर बीजेपी ये चुनाव जीत जाती है तो अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में वो पूरे जोश के साथ उतरेगी.

ये तो हुई बीजेपी के फायदे की बात, अब कृष्णा को वास्तव में नई पार्टी में क्या फायदा मिलने वाला है?

कांग्रेस के कुछ नेताओं के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट छपी है जिसमें कहा गया है कि कृष्णा के परिवार के कुछ लोग जांच एजेंसियों के रडार पर हैं - और केंद्र में सत्ताधारी से उनके हाथ मिलाने की ये एक बड़ी वजह हो सकती है.

तो क्या बस इतनी सी बात के लिए कृष्णा को कांग्रेस का चार दशक पुराना साथ छोड़ना पड़ा?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में इस सवाल का जवाब भी है - ऐसे कयास लगाये जा रहे हैं कि कृष्णा को बीजेपी में उपाध्यक्ष बनाया जा सकता है या फिर उन्हें राज्य सभा में भेजा जा सकता है.

बाकी बातें तो ठीक हैं, लेकिन उम्र को लेकर कृष्णा ने जो राय जाहिर की है उससे एक बात नहीं समझ आयी कि उनके निशाने पर सिर्फ कांग्रेस रही या वो बीजेपी को भी कोई मैसेज देना चाह रहे थे?

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