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Updated: 08 मई, 2020 09:58 AM
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पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) सरकार को केंद्र में अमित शाह (Amit Shah) के गृह मंत्रालय (Union Home Ministry) की तरफ से अब तक कई पत्र मिल चुके हैं. जब भी ये पत्र मिलते हैं प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार की तरफ से जो भी चार्ज लगाये जाते हैं उन्हें खारिज करते हुए जबाव दे दिये जाते हैं - लेकिन कोरोना वायरस से होने वाली मौतों के मामले में पेंच फंस गया है.

ममता सरकार की तरफ से केंद्र के पत्रों को लेकर सवाल उठाये जाते रहे हैं कि जब देश के दूसरे राज्यों में भी मिलते जुलते हालात हैं तो सिर्फ पश्चिम बंगाल को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? सवाल तो बनता है और बिलकुल वाजिब भी है, लेकिन कम से कम दो मामले ऐसे हैं जहां ममता बनर्जी की सरकार घिरती नजर आ रही है - बांग्लादेश सीमा से ट्रकों को एंट्री न देना और राज्य में हुई 72 मौतों के मामले को कोविड-19 (Covid-19 Mortality Rate) से अलग रखना.

क्या ममता बनर्जी केंद्र के निशाने पर हैं?

लॉकडाउन के उल्लंघन साथ साथ केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल सरकार पर केंद्र के निर्देशों का पालन न कर संवैधानिक नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है, लेकिन जवाबी पत्र में पश्चिम बंगाल सरकार का कहना है कि पहले सारे पहलू पर विचार होगा उसके बाद ही कोई कदम बढ़ाया जाएगा.

1. सिर्फ पश्चिम बंगाल में ऐसा क्यों: पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा को लिखे नये पत्र में केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने 24 अप्रैल के केंद्र के निर्देशों का पालन न करने को लेकर सवाल पूछा है. 24 अप्रैल को राज्यों को लिखे गये पत्र में केंद्र सरकार ने नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमा पर आवश्यक सामान के साथ ट्रकों की आवाजाही सुनिश्चित करने का निर्देश जारी किया था.

केंद्रीय गृह सचिव का कहना है कि सिर्फ पश्चिम बंगाल सरकार ही ऐसी है जिसने इस पर अमल नहीं किया है और इसके चलते बांग्लादेश सीमा पर काफी ट्रक फंसे हुए हैं. फंसे लोगों में ऐसे ड्राइवर भी हैं जो सामान पहुंचा कर लौटे हैं लेकिन भारतीय सीमा में उनको भी नहीं घुसने दिया जा रहा है.

2. केंद्र के निर्देशों का उल्लंघन: गृह सचिव ने इसे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मामले में केंद्र सरकार के आदेश का संविधान के अनुच्छेद 253, 256 और 257 का सीधे सीधे उल्लंघन बताया है. गृह सचिव ने याद दिलाया है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत जारी निर्देशों का अनुपालन नहीं करना उल्लंघन के दायरे में ही आता है.

3. सोशल डिस्टैंसिंग को मजाक बनाया: अजय भल्ला ने पत्र के जरिये उन गतिविधियों की तरफ भी ध्यान दिलाया है जिनमें सोशल डिस्टैंसिंग जैसी चीजें मजाक नजर आ रही हैं - लोग खुलेआम बाजार में घूम रहे हैं, क्रिकेट खेल रहे हैं और नदियों में नहा रहे हैं, लेकिन पुलिस कहीं किसी को रोकने की कोशिश करती नजर आ रही है.

पश्चिम बंगाल के गृह सचिव अलपन बंदोपाध्याय ने अजय भल्ला को लिखे जवाबी पत्र में साफ तौर पर कह दिया है कि सभी पहलुओं पर समुचित विचार के बाद ही उनके निर्देशों का पालन किया जाएगा - और ट्रकों की आवाजाही की अनुमति देने के पहले भी ये जरूरी है.

mamata banerjeeममता बनर्जी केंद्र से राजनीतिक लड़ाई तभी लड़ पाएंगी जब पश्चिम बंगाल में सब दुरूस्त हो

क्या पश्चिम बंगाल में सोशल डिस्टैंसिंग का देश भर की शराब की दुकानों पर जो भीड़ जुटी है उससे भी खराब लगती है?

तस्वीरों में एक दूसरे पर चढ़े हुए लोगों देखने को मिलें - और देश के हर हिस्से से एक जैसी ही तस्वीरें देखने को मिली हैं. लॉकडाउन के शुरुआती दौर में जरूर जगह जगह गोले बनाये गये थे और लोग उसमें अपनी बारी का इंतजार करते देखे गये थे, लेकिन अब तो हर जगह की तस्वीरों में वैसी भीड़ देखने को मिल रही है जैसी आम दिनों में देखी जाती रही है. चाहे लोग राशन लेने निकलें हों या फिर मंडी में सब्जी लेने.

मौतों के आंकड़े पारदर्शी क्यों नहीं लगते

पश्चिम बंगाल सरकार लिखे केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला के पत्र के मुताबिक देश भर में सबसे ज्यादा 13.2 फीसदी मृत्यु दर पश्चिम बंगाल में है, जिससे साबित होता है कि राज्य में न तो तरीके से कांट्रैक्ट ट्रेसिंग हो रही है और न ही लोगों की सही तरीके से टेस्टिंग ही हो रही है.

पहले एक आंकड़ा 12.8 फीसदी सामने आया था. हफ्ते भर में ही इसमें 0.4 फीसदी की बढ़ोतरी हो गयी है. दो हफ्ते के दौरे पर पश्चिम बंगाल पहुंची केंद्रीय टीम IMCT ने भी Covid-19 से होने वाली मौतों के मामले में पश्चिम बंगाल में मृत्यु दर देश में सबसे ज्यादा बताया था, लेकिन मृत्यु दर 12.8 फीसदी ही पायी गयी थी.

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ के बाद अब बीजेपी महासचिव और पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने भी ममता बनर्जी की सरकार पर कोरोना से होने वाली मौतों के आंकड़े छिपाने का आरोप लगाया है. खुद ममता बनर्जी और दूसरे तृणमूल कांग्रेस नेता ऐसे आरोपों को पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ सियासी चाल बताते रहे हैं.

चूंकि पश्चिम बंगाल में इसी साल नगर निगम के चुनाव होने वाले हैं और अगले साल विधानसभा के इसलिए ये आरोप-प्रत्यारोप अपनेआप राजनीतिक शक्ल ले लेते हैं.

केंद्र सरकार के आरोप और पश्चिम बंगाल सरकार की सफाई के बीच ही कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा झूल रहा है. ऐसे में ये कहना मुश्किल है कि दोनों पक्षों में से सही दावा कौन कर रहा है - लेकिन मौतों के आंकड़ों को लेकर कुछ विसंगतियां ऐसी जरूर हैं कि सवालों को जन्म देती हैं.

कोविड-19 से होने वाली मौतों पर विवाद की वजह पश्चिम बंगाल सरकार की एक विशेषज्ञ समिति है. हालांकि, अब इस कमेटी के अधिकार सीमित कर दिये गये हैं और मौतों की पुष्टि के लिए उसकी मंजूरी की अनिवार्यता खत्म कर दी गयी है. केंद्र सरकार की IMCT की तरफ से भी इस कमेटी पर सवाल उठाये गये थे - और राज्य के डॉक्टरों का एक ग्रुप भी कमेटी के कामकाज पर सवाल उठा रहा था.

फिर भी पेंच उन 72 लोगों की मौत के चलते फंसा हुआ है जिसे ममता सरकार कोरोना वायरस से होने वाली मौतों में शामिल करने को राजी नहीं है. सरकार ने ये तो माना है कि एक्सपर्ट कमेटी के कामकाज में खामियां रहीं, साथ ही, निजी अस्पतालों से तमाम तथ्य न मिलने के चलते भी आंकड़ों में अंतर आ रहा था, लेकिन अब ये सारी चीजें सुधार ली गयी हैं.

मामला वहीं 72 मौतों पर आकर फंस जा रहा है, जिसे कोरोना से हुई मौतों के साथ जोड़ देने पर आंकड़ा डबल से भी ज्यादा हो जाएगा. इन मौतों की वजह कोरोना वायरस मानने और न मानने के पीछे राज्य और केंद्र सरकार की अपनी अपनी दलील है. राज्य सरकार का कहना है कि ये 72 मौतें दूसरी बीमारियों की वजह से हुई हैं, लेकिन केंद्रीय कमेटी ये मानने को तैयार नहीं है. ये 72 लोग भी कोरोना पॉजिटिव रहे हैं लेकिन इन्हें दूसरी बीमारियां भी रहीं और उसी वजह से इनकी मौत हुई, इसी आधार पर राज्य सरकार कोरोना वायरस से होने वाली मौतों में ये संख्या नहीं जोड़ने को तैयार है.

बढ़ते विवाद और केंद्र की तरफ से दबाव के कारण पश्चिम बंगाल सरकार ने इस बीच कुछ बदलाव भी किये हैं. एक्सपर्ट कमेटी के अधिकारों को सीमित करने के साथ ही लॉकडाउन के उपायों को सख्त और कोरोना वायरस की टेस्टिंग भी बढ़ायी है. टेस्टिंग बढ़ाये जाने पर जाहिर हे संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ सकती है, लेकिन ये भी है कि अलर्ट और तत्परता से मृत्यु दर को कम भी किया जा सकता है. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के कुछ सीनियर नेताओं की नजर में ये रणनीतिक बदलाव जोखिम भरा हो सकता है और अगले साल विधानसभा चुनाव में पार्टी को महंगा भी पड़ सकता है.

फिर भी कुछ सवाल ऐसे हैं जरूर जिनके जवाब नहीं मिल रहे हैं. क्या ममता बनर्जी सरकार जानबूझ कर कोविड-19 से होने वाली मौतों की सही जानकारी रोक रही है? क्या केंद्र की बीजेपी सरकार भी जान बूझ कर राजनीतिक वजहों से ममता बनर्जी सरकार को टारगेट कर रही है, जबकि मौतों के मामले में महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और मध्य प्रदेश के हालात में बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. क्या दोनों सरकारों के स्तर पर प्रक्रिया में कोई खामी है जिसकी वजह से हकीकत कुछ और है और हल्ला किसी और बात पर हो रहा है?

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