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बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 10 अगस्त, 2020 01:54 PM
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राजस्थान में अभी तक तो कांग्रेस अपने विधायकों को छुपाती फिर रही थी - अब बीजेपी (Rajasthan BJP Politics) भी उसी रास्ते पर चल पड़ी है. अब तक कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी सरकार गिराने के लिए उसके विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन अब बीजेपी भी वही इल्जाम कांग्रेस पर लगाने लगी है.

बड़ा सवाल तो ये है कि बीजेपी को अपने विधायकों को राजस्थान से गुजरात भेजने की जरूरत क्यों आ पड़ी? बीजेपी नेता अशोक गहलोत सरकार पर विधायकों को परेशान करने का आरोप लगा रहे हैं. कहते हैं राजस्थान पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियां बीजेपी विधायकों को मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने का प्रयास कर रही हैं.

बीजेपी जो भी दावा करे, लेकिन राजस्थान पुलिस का SOG तो सरकार की साजिश वाले केस ही बंद कर चुका है - अब मानसिक रूप से परेशान करने का क्या उपाय बचा है. अगर ऐसा है तो कोई बात सामने तो आयी नहीं है. ऐसा भी क्या कि अशोक गहलोत की पुलिस और दूसरे सरकारी मुलाजिम बीजेपी विधायकों को परेशान करें और कोई शिकायत न दर्ज करायी जाये. अगर पुलिस ऐसा नहीं करती तो अदालत है - और विधायकों से जुड़ी कोई खास बात है तो राजभवन किस मर्ज का इलाज है?

सवाल ये भी है कि राजस्थान में बीजेपी की कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसी दिलचस्पी क्यों नहीं नजर आ रही है? वो भी तब जबकि पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं - और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) से मुलाकात का इंतजार कर रही हैं!

बीजेपी को कैसे लगी कांग्रेस वाली बीमारी

बीजेपी को भी राजस्थान में लगता है कांग्रेस वाली बीमारी लग गयी है. तभी तो बीजेपी भी कांग्रेस की तरह विधायकों को होटल क्वारंटीन करने लगी है. बीजेपी अपने विधायकों को होटल में रखे जाने के मामले में भी कांग्रेस से कहीं ज्यादा सतर्कता बरत रही है. कांग्रेस के विधायक तो जैसलमेर के एक ही होटल में हैं. उससे पहले जयपुर में भी एक ही जगह रहे, लेकिन बीजेपी ने जिन 20 विधायकों को गुजरात भेज रही है उनके अलग अलग बैच बनाये गये हैं - मसलन, 6 गांधीनगर, 6 पोरबंदर और ऐसे ही.

आखिर बीजेपी को कांग्रेस वाला डर क्यों सताने लगा? सरकार गिरने की आशंका में बिधायकों के टूटने का डर तो कांग्रेस को है और होना भी चाहिये, लेकिन बीजेपी को ये डर क्यों सता रहा है? वैसे बीजेपी का कहना तो यही है कि वो कांग्रेस की वजह से अपने विधायकों को राजस्थान से बाहर भेजने का फैसला कर रही है - क्योंकि सरकार की तरफ से उनको मानसिक तौर पर परेशान किया जा रहा है.

गुजरात के पोरबंदर पहुंचे राजस्थान के बीजेपी विधायक निर्मल कुमावत बताते हैं, 'राजस्थान में बहुत सारी राजनीतिक गतिविधियां हो रही हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पास बहुमत नहीं है और सरकार भाजपा विधायकों को मानसिक रूप से परेशान कर रही है - ऐसे में हमारे छह विधायक सोमनाथ मंदिर में दर्शन करने आये हैं.'

राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया दिल्ली में डेरा डाल चुकी हैं - और एक एक करके बीजेपी के सीनियर नेताओं से मुलाकात कर रही हैं - और अब तैयारी और कोशिश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक जब बीजेपी विधायकों को गुजरात भेजा जा रहा था तो तीन विधायकों ने साफ तौर पर मना कर दिया कि जब तक राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री की मंजूरी नहीं मिलती वे झालावाड़ छोड़ कर कहीं नहीं जाने वाले. झालावाड़ में वसुंधरा राजे का खासा दबदबा माना जाता है.

vasundhara raje, narendra modiवसुंधरा राजे क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद कोई बड़ा फैसला लेने वाली हैं?

सूत्रों के हवाले आयी ज्यादातर मीडिया रिपोर्ट में वसुंधरा राजे की नाराजगी की खबर है. बीजेपी नेतृत्व से वसुंधरा की तो पुरानी नाराजगी रही है - अब तो वो प्रदेश बीजेपी के कई नेताओं से बेहद खफा बतायी जा रही हैं. बताते हैं वसुंधरा राजे ने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात में शिकायत दर्ज करायी है कि प्रदेश बीजेपी के नेता उनके खिलाफ गुटबाजी कर रहे हैं. वसुंधरा का कहना है कि कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े में पड़ने की जरूरत ही क्या है, लेकिन उनकी चुप्पी को उनके विरोधी सोशल मीडिया पर भी हवा दे रहे हैं.

राजनाथ सिंह से मुलाकात में भी वसुंधरा राजे ने राजस्थान की राजनीति स्थिति की जानकारी दी और संगठन मंत्री बीएल संतोष से मिल कर भी वही सब बातें बतायीं. सुनने में ये भी आया है कि वसुंधरा की शिकायत पर जेपी नड्डा ने राजस्थान बीजेपी के नेताओं को ऐसी हरकतों से बाज आने की हिदायत दी है. वसुंधरा का कहना है कि वो पार्टी के साथ हैं, लेकिन राज्य स्तर पर जो कुछ उनके खिलाफ चल रहा है वो उन्हें कतई मंजूर नहीं है.

वसुंधरा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलना इसलिए भी जरूरी हो गया है क्योंकि वहां वो बड़ी शिकायत दर्ज कराने वाली हैं - हनुमान बेनीवाल के खिलाफ. वैसे भी वसुंधरा राजे के खिलाफ राजस्थान अगर किसी ने खुल कर बयानबाजी की है तो वो राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के नेता हनुमान बेनीवाल ही हैं.

हनुमान बेनीवाल राजस्थान से एनडीए के सांसद हैं और वसुंधरा राजे पर उनका आरोप रहा है कि वो सरकार बचाने में अशोक गहलोत की मदद कर रही हैं. वसुंधरा राजे की लंबी चुप्पी पर सवाल उठाते हुए हनुमान बेनीवाल ने कहा यहां तक कहा था कि पूर्व मुख्यमंत्री बीजेपी विधायकों को फोन कर अशोक गहलोत की मदद के लिए कहती हैं.

ऐसे में जबकि वसुंधरा राजे दिल्ली में हैं, राजस्थान की सत्ता के गलियारों में उनके नयी पार्टी तक बना लेने की चर्चा होने लगी है!

क्या वसुंधरा भी सचिन पायलट की राह पर हैं

बीजेपी में एक धड़ा कांग्रेस के बागी विधायकों की मदद से अशोक गहलोत सरकार को गिराना चाहता तो है, लेकिन वसुंधरा राजे इसके पक्ष में नहीं बतायी जा रही हैं. वसुंधरा राजे को अपनी बारी का इंतजार है. माना जाता है कि राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस को बारी बारी हर पांच साल बाद सरकार बनाने का मौका मिलने की परंपरा बन चुकी है. वसुंधरा राजे उसी वक्त का इंतजार कर रही हैं जब वो चुनाव जीत कर सरकार बनाने में कामयाब हों.

वैसे भी बागी विधायकों की मदद से विरोधी दल की सरकार गिराने के बाद की स्थिति और भी मुश्किल और जटिल हो जा रही है. निश्चित तौर पर कर्नाटक और मध्य प्रदेश की मिसाल वसुंधरा को इस दिशा में आगे बढ़ने से रोक रहा होगा. बागी विधायकों को चुनाव जिताने से लेकर उनको मंत्री पद दिये जाने या न देने की सूरत में उनको शांत कराना बहुत बड़ी चुनौती है. साथ ही, शिवराज सिंह की हैसियत तो नाम के मुख्यमंत्री भर रह गयी है. मंत्रियों के नाम ही नहीं, उनके विभाग भी बीजेपी आलाकमान तय करता है - और वो खुद मुख्यमंत्री होते हुए भी अपने हिसाब से किसी को मंत्री नहीं बना सकते. उनके लिए चार मंत्रियों का कोटा पहले ही निर्धारित कर दिया जाता है.

वसुंधरा राजे की सबसे ज्यादा नाराजगी सारे फैसले उनको दरकिनार करके लिए जाने से है. ताजा नाराजगी तो प्रदेश कार्यकारिणी में उनके विरोधी नेताओं को पद पर बिठाये जाने से है. वैसे ये सब 2018 के विधानसभा चुनाव में सरकार गंवा देने के बाद से बढ़ चला है, वरना, पहले तो वो मोदी-शाह के पसंदीदा गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश बीजेपी का अध्यक्ष तक नहीं बनने दी थीं. सतीश पूनिया भी बने तो वसुंधरा की मंजूरी के बाद ही.

लोक सभा का टिकट बांटे जाने में तो वसुंधरा राजे को दरकिनार किया ही गया, लेकिन सबसे ज्यादा तकलीफ हुई राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक हनुमान बेनीवाल के साथ बीजेपी के चुनाव समझौते को लेकर. वसुंधरा राजे के कड़े ऐतराज के बावजूद मोदी-शाह ने कोई तवज्जो नहीं दी - और अब वही हनुमान बेनीवाल विरोध का बिगुल बजाने लगे हैं.

दरअसल, हनुमान बेनीवाल पहले बीजेपी के ही विधायक रहे हैं और वसुंधरा के साथ 36 के रिश्ते के चलते ही उनको बीजेपी से बाहर भी कर दिया गया था, लेकिन 2019 में चुनावी समझौते के बाद वो एनडीए में शामिल हो गये. वसुंधरा खेमे के लोग मानते हैं कि वो पहला मौका था जब बीजेपी नेतृत्व ने वसुंधरा को पूरी तरह नजरअंदाज किया था.

राजस्थान के हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान भी बीजेपी नेतृत्व वसुंधरा को पूरी प्रक्रिया से दूर रखे हुए था - और वसुंधरा राजे की चुप्पी की एक बड़ी वजह भी यही रहा, लेकिन लगता है अब बीजेपी नेतृत्व को वसुंधरा की अहमियत ज्यादा समझ आने लगी है और यही वजह है कि वो उनको नाराज करके कोई भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं लगता.

राजस्थान विधानसभा का सत्र 14 अगस्त को शुरू होने जा रहा है और उसके ठीक पहले वसुंधरा राजे के जयपुर पहुंचने की संभावना जतायी गयी है. तब तक वसुंधरा दिल्ली में जमी हुई हैं और उधर राजस्थान में चर्चा चल रही है कि बीजेपी के 72 में से 46 विधायकों के साथ वसुंधरा नयी पार्टी की घोषणा भी कर सकती हैं.

क्या बीजेपी विधायकों के गुजरात भेजे जाने के पीछे भी असली वजह यही हो सकती है? क्या राजस्थान में सरकार बनाने को लेकर कदम आगे बढ़ाने को लेकर बीजेपी के संकोच की भी वजह यही हो सकती है?

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