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Updated: 10 मार्च, 2022 03:49 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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यूपी चुनाव नतीजे अब साफ हो गए हैं. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा दो-तिहाई बहुमत से जीत दर्ज करती दिख रही है. महंगाई, बेरोजगारी, किसान आंदोलन, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान अव्यवस्था, आवारा पशुओं का मुद्दा, हाथरस रेप मामले के बाद हुआ घटनाक्रम जैसे दर्जनों मुद्दों पर समाजवादी पार्टी समेत बसपा और कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ जमीन तैयार की थी. लेकिन, यूपी चुनाव नतीजे के रुझानों को देखकर कहा जा सकता है कि लोगों के पास योगी सरकार को बदलने की कोई खास वजह थी ही नहीं. इन मुद्दों के चलते भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच हुई इस सीधी सियासी रेस में मोदी-योगी की जोड़ी फिनिश लाइन से कहीं आगे खड़ी नजर आई. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि भाजपा के खिलाफ जमीन पर मुद्दे थे, तो, हवा कैसे हो गए?

UP Election Results Yogiकानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भाजपा को महिलाओं के बंपर वोट मिलने से पलटा विपक्ष का गेम.

किसान के लिए आवारा पशु: उत्तर प्रदेश में किसी भी चरण के चुनाव में सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कोई लहर दिखाई नहीं पड़ी. यूपी चुनाव 2022 के सभी चरणों में किसान आंदोलन और आवारा पशु एक बड़े मुद्दे के तौर पर उठाए गए. किसान आंदोलन के मुद्दे को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अच्छी-खासी पकड़ रखने वाले किसान नेता राकेश टिकैत ने खुलकर सूबे में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया था. भारतीय किसान यूनियन के टिकैत बंधुओं ने आरएलडी और समाजवादी पार्टी के गठबंधन को जीत दिलाने के लिए जान लगा दी थी. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कृषि कानूनों की वापसी के ऐलान के साथ ही किसान आंदोलन का ये गुब्बारा फूट चुका था. क्योंकि, इन कानूनों का विरोध बिचौलिए और बड़ी जोत वाले किसान ही कर रहे थे. तो, किसान आंदोलन के नाम पर उत्तर प्रदेश के किसान दो हिस्सों में बंट गए थे. एक हिस्सा किसान आंदोलन के समर्थक वाला था. तो, दूसरा हिस्सा पीएम नरेंद्र मोदी की किसान सम्मान निधि और सीएम योगी आदित्यनाथ की गन्ना कीमतों के रिकॉर्ड भुगतान वाला था.

आवारा पशु उत्तर प्रदेश के हर चुनाव में मुद्दा रहा है. लेकिन, इस मुद्दे के साथ सबसे बड़ी खासियत ये ही रही है कि ये केवल चुनावी मुद्दा ही था. क्योंकि, भले ही आवारा पशु किसानों के लिए एक बड़ा मुद्दा हों. लेकिन, इसके लिए विपक्ष किसी भी सूरत में योगी सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहरा सका. क्योंकि, गाय-बैल-सांड हिंदू धर्म से जुड़ा मामला है. और, योगी आदित्यनाथ ने अवैध बूचड़खानों पर रोक लगाकर इनकी हत्या पर रोक लगाई थी. हो सकता है कि किसानों को आवारा पशुओं से दिक्कत रही है. लेकिन, शायद ही बहुसंख्यक हिंदू वर्ग का कोई किसान इन आवारा पशुओं को बूचड़खानों में कटने के लिए भेजने की बात करता नजर आएगा. पीएम नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे की गंभीरता को समझा. और, किसानों को आवारा पशुओं की समस्या से निजात दिलाने के लिए एक व्यापक योजना तैयार करने की बात कही. योगी आदित्यनाथ ने भी नारा दे दिया कि 'ना गायों को कटने देंगे...ना फसलों को नुकसान पहुंचने देंगे.'

महिलाओं के लिए महंगाई-हाथरस रेप: महंगाई और हाथरस रेप मामले जैसे अन्य मुद्दों को महिला मतदाताओं से जोड़कर पेश किया गया. लेकिन, सूबे में कानून-व्यवस्था पर सीएम योगी आदित्यनाथ की मजबूत नीति ने महिलाओं के बीच सुरक्षा की जो भावना बनाई, उसे समाजवादी पार्टी के लिए बदलना नामुमकिन ही नजर आया. कोरोना महामारी आने के बाद पूरी दुनिया में महंगाई अपने चरम पर है. लेकिन, समाजवादी पार्टी इस महंगाई को भाजपा से जोड़ने में नाकामयाब रही. क्योंकि, थोड़ी सी भी पढ़ी-लिखी गृहणियों इस बात को लेकर जागरुक थीं कि महंगाई में भाजपा की भूमिका नहीं है. वहीं, गरीब महिलाओं की रसोई तक मुफ्त राशन और मुफ्त सिलेंडर की योजनाओं ने इस वर्ग को भाजपा से दूर नहीं जाने दिया. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि महिला सुरक्षा के मामले में भाजपा को महिलाओं के बंपर वोट मिले हैं. भले ही एंटी रोमियो स्कवॉड को लेकर योगी आदित्यनाथ पर सवाल खड़े किए गए हों. लेकिन, लव जिहाद जैसे कड़े कानूनों से महिलाओं में सुरक्षा की भावना बनी.

युवाओं के लिए बेरोजगारी: इंडिया टुडे-एक्सिस माई इंडिया के एग्जिट पोल में अनुमान जताया गया था कि भाजपा सरकार में बेरोजगारी युवाओं के बीच एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा. लेकिन, बेरोजगारी में सबसे बड़ा कारण कोरोना महामारी के बीच बीते दो साल नजर आए. बीते दो सालों में सेना की भर्ती से लेकर अन्य किसी भी बड़ी परीक्षा का आयोजन आसानी से नहीं हो सका. हालांकि, एग्जिट पोल में ही साफ कर दिया गया था कि युवा लड़कों का रुझान समाजवादी पार्टी की ओर हो सकता है. लेकिन, इस ग्रुप में भी लड़कियों और महिलाओं की पहली पसंद भाजपा ही बनकर उभरी है.

दलितों के लिए सवर्णों की दबंगई: एग्जिट पोल के अनुमान में सवर्ण जातियों का एकतरफा झुकाव भाजपा की ओर नजर आया था. यूपी चुनाव नतीजे के रुझान में भी सवर्ण मतदाता भाजपा पर ही भरोसा जताते दिखे. स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, धर्म सिंह सैनी समेत अन्य दलबदलू ओबीसी विधायकों और नेताओं ने भाजपा छोड़ते समय पार्टी पर पिछड़ों, दलितों और शोषितों के उत्पीड़न का आरोप लगाया था. योगी आदित्यनाथ पर ठाकुरवादी होने के आरोप लगाए थे. लेकिन, भाजपा ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर इन सभी आरोपों को नेस्तनाबूद कर दिया. इतना ही नहीं बसपा सुप्रीमो मायावती का काडर वोट रहे जाटव मतदाताओं में भी भाजपा ने सेंध लगाते हुए उसे अपने पक्ष में लाने में जीत हासिल की. जबकि, दलित मतदाता इतनी आसानी से डिगने वाला नही कहा जा सकता है. प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी कल्याणकारी योजनाओं का फायदा दलित वर्ग को मिला. और, वोट भाजपा को.

पूरे यूपी के लिए कोरोना का कुप्रबंधन: कोरोना की दूसरी लहर के दौरान गंगा में तैरती और किनारों पर जमीन में दबी लाशें, ऑक्सीजन और दवाओं की कमी, अस्पतालों में बेड की अनुपलब्धता जैसे मुद्दे समाजवादी पार्टी समेत पूरे विपक्ष ने जमकर उठाए. लेकिन, देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में शुरुआती कुछ झटकों के बाद योगी आदित्यनाथ ने स्थिति को संभालने में कोई कसर नहीं छोड़ी. कोरोना से उपजी स्थिति को संभालने के लिए योगी आदित्यनाथ ने टीम-11 का ऐलान किया था. जिसने महामारी को काबू में बनाए रखने के लिए काफी मेहनत की. और, इसका नतीजा भी दिखा कि सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में कोरोना से हुई मौतों का आंकड़ा महाराष्ट्र से कम ही रहा. कोरोना से हुई मौतों के झूठे आंकड़ों का दावा भी हवा में उड़ गया. क्योंकि, अगर इसमें सच्चाई होती, तो वह यूपी चुनाव नतीजे में नजर आती. वहीं, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान सीएम योगी के पिता का निधन होने के बावजूद उनके अंतिम संस्कार में न जाकर सूबे में अपने दौरों को जारी रखने का निर्णय भाजपा के पक्ष में गया.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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