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Updated: 05 दिसम्बर, 2020 08:11 PM
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पश्चिम बंगाल के TMC नेता शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के अगले कदम का अंदाजा काफी हद तक ज्यादातर लोग लगा चुके हैं. जब तक कोई आधिकारिक घोषणा न हो तब तक तो शुभेंदु अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के ही माने जाएंगे जिसकी नेता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) हैं. शुभेंदु अधिकारी मंत्री पद से इस्तीफा देकर एक तरीके से ममता बनर्जी का साथ छोड़ चुके हैं, लेकिन टीएमसी की तरफ से अभी यही दावा किया जा रहा है कि वो पार्टी नहीं छोड़ेंगे. अब अगर ये महज गलतफहमी है तो इसके दूर होने में बहुत वक्त भी नहीं बचा है - क्योंकि बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा कोलकाता में रैली करने वाले हैं.

एक कयास ये है कि जेपी नड्डा की रैली में ही शुभेंदु अधिकारी बीजेपी (BJP) ज्वाइन कर मुकुल रॉय की तरह भगवा धारण कर सकते हैं. एक कयास उनकी होने वाली सार्वजनिक सभा को लेकर भी है, लेकिन उसके आस पास लगे शिवसेना के झंडे थोड़ा-बहुत गुमराह करने की कोशिश भी कर रहे हैं - क्योंकि शुभेंदु की सभा से उनके नयी पार्टी बनाने की संभावना जतायी जा रही है. आखिरी कयास ये है कि वो मान जायें और आगे भी पहले की तरह ममता बनर्जी को ही अपना नेता मानते रहें - लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात उनके समर्थक कह रहे हैं, 'चाहे वो बीजेपी में शामिल हों, टीएमसी में लौटें या फिर अपनी ही कोई अलग पार्टी खड़ी करें लेकिन हम हमेशा उनके साथ ही रहेंगे.'

भला किसी नेता के लिए इससे बड़ी और भी कोई बात हो सकती है क्या? तभी तो बीजेपी और टीएमसी की छीनाझपटी के बीच शुभेंदु अधिकारी को अपना नेता मानने वाले मजबूती के साथ उनके पीछे डटे हुए हैं - और वो चाहें तो बीजेपी और ममता बनर्जी दोनों से अच्छी तरह बारगेन कर सकते हैं. डील जहां बेहतर समझ में आये फैसला उसी से होना है.

बाकी सब तो ठीक है, लेकिन शुभेंदु अधिकारी के सामने भी तीन साल पहले पार्टी छोड़ चुके मुकुल रॉय जैसी ही मुश्किलें हैं. मुकुल रॉय तो अब आराम से हैं, लेकिन जांच एजेंसियां ममता बनर्जी के जिन करीबियों को खोज रही है, शुभेंदु अधिकारी भी उनमें से एक हैं - ऐसे में शुभेंदु अधिकारी चाहें तो मुकुल रॉय को अपने भविष्य के फैसले की घड़ी भर के लिए रोल मॉडल भी मान सकते हैं.

शुभेंदु के टीएमसी में बने रहने की संभावना कम ही है

संभावना तो टीएमसी सांसद सौगत रॉय के भी पार्टी छोड़ने की लगायी जा रही थी, लेकिन वो खुद ही खंडन करने के लिए आगे आ गये, बोले - कहीं नहीं जा रहा. ये सौगत रॉय ही रहे जिन्होंने शुभेंदु अधिकारी को लेकर दावा किया - सब ठीक ठाक है. ये दावा इतना कमजोर रहा कि 24 घंटे भी नहीं टिका और उनके पास व्हाट्सऐप मैसेज पहुंचा - ये सिलसिला जारी रखना संभव नहीं है. वो मैसेज शुभेंदु अधिकारी की तरफ से ही बताया जा रहा है.

2017 में ममता बनर्जी का साथ छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन करने वाले मुकुल रॉय के भी नये संगठन में अच्छे दिन आने में काफी देर लगी. अभी कुछ ही दिन पहले जेपी नड्डा ने जब अपनी टीम बनायी थी तो मुकुल रॉय को बीजेपी में उपाध्यक्ष बनाया. मुकुल रॉय बताते हैं कि बीजेपी में उनको नयी जिम्मेदारी मिलने पर शुभेंदु अधिकारी ने बधाई भी दी थी.

मुकुल रॉय का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी अगर टीएमसी छोड़ते हैं तो उनके पास कई मौके हैं. कहते हैं, भाजपा में अगर वो आते हैं, तो उनका स्वागत रहेगा... भाजपा को फायदा भी मिलेगा - नेताओं के आने के साथ वोटबैंक भी आता है.'

सौगत रॉय के सब कुछ ठीक होने के दावे के अगले दिन ही मैसेज आने को लेकर मुकुल रॉय कहते हैं, सौगत दा की उम्र हो गयी है - उम्र हो जाने पर कई बातें लोग भूल जाते हैं. मुकुल राय की इस टिप्पणी में भी शुभेंदु अधिकारी के अगले कदम की धमक महसूस की जा सकती है.

कोलकाता से करीब 120 किलोमीटर दूर हल्दिया में अलग ही नजारा देखने को मिला है. बड़े बड़े बैनर लगाये गये हैं जिन पर बांग्ला में लिखा है - अमरा दादार अनुगामी यानी हम दादा के अनुयायी हैं. कई जगह तो शुभेंदु अधिकारी को 'बांग्लार महागुरु' के रूप में पेश और प्रचारित किया जा रहा है. 'शुभेंदु अधिकारी फॉर सीएम' जैसे नारे भी उनके समर्थकों के मुंह से सुने जा रहे हैं - जगह जगह शुभेंदु अधिकारी की तस्वीर वाली टी-शर्ट पहन कर भी समर्थक सड़क पर घूमते फिर रहे हैं.

suvendu adhikariशुभेंदु अधिकारी का तृणमूल कांग्रेस छोड़ना ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा झटका होगा

शुभेंदु अधिकारी पूर्वी मिदनापुर के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं. शुभेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी और छोटे भाई दिव्येंदु अधिकारी दोनों ही टीएमसी सांसद हैं. शिशिर अधिकारी तो मनमोहन सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री भी रह चुके हैं.

ममता को सत्ता दिलाने में सबसे बड़े मददगार नंदीग्राम आंदोलन के आर्किटेक्ट माने जाने वाले शुभेंदु अधिकारी ने अपने असर वाले इलाकों की 49 में से 36 सीटें ममता बनर्जी की झोली में भर दी थी. उससे इतर भी टीएमसी ने शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी का असर महसूस किया था.

यही सारी वजहें हैं कि शुभेंदु अधिकारी को मनाने में टीएमसी की चुनावी मुहिम की निगरानी कर रहे प्रशांत किशोर जी तोड़ प्रयास कर चुके हैं. एक दिन तो वो शुभेंदु अधिकारी के घर भी पहुंच गये थे. शुभेंदु अधिकारी की गैरमौजूदगी में वो उनके पिता को मैसेज देकर लौट आये. हालांकि, बात में संपर्क हो गया था और ममता बनर्जी के साथ साथ उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी ने भी अपनी तरफ से मनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखा है.

लेकिन ऐसी भी क्या नाराजगी? असल बात तो ये है कि शुभेंदु अधिकारी की नाराजगी ममता बनर्जी से आज भी नहीं है. वो नाराज हैं तो अभिषेक बनर्जी के टीएमसी में बढ़ते प्रभाव से और तात्कालिक तौर पर प्रशांत किशोर की दखल से. देखा जाये तो ये महज वर्चस्व ही नहीं, विरासत की भी लड़ाई है.

शुभेंदु और मुकुल में बड़ा फर्क भी है

टीएमसी छोड़ कर 2019 के आम चुनाव के वक्त बीजेपी ज्वाइन तो कई नेताओं ने किया था, लेकिन अगर शुभेंदु का भी वही फैसला होता है तो ममता बनर्जी के लिए मुकुल रॉय से भी बड़ा झटका होगा. मुकुल रॉय के जाने से होने वाले डैमेज को तो ममता बनर्जी ने जैसे तैसे कंट्रोल कर लिया, लेकिन शुभेंदु अधिकारी की भरपायी बहुत मुश्किल होगी.

मुकुल रॉय के बीजेपी में ट्रैक रिकॉर्ड से तुलना करें तो शुभेंदु अधिकारी भले ही अपेक्षा के मुताबिक फायदेमंद साबित न हों, लेकिन ऐसा करके बीजेपी ममता बनर्जी को बहुत गहरी चोट दे सकती है.

जहां तक मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी में फर्क का सवाल है - मुकुल रॉय संगठन के आदमी रहे हैं, जबकि शुभेंदु अधिकारी फील्ड के नेता हैं. जिनकी पहुंच सिर्फ कार्यकर्ताओं तक ही नहीं बल्कि वोट बैंक में भी सीधी पैठ है.

बीजेपी को उम्मीद रही कि मुकुल रॉज टीएमसी छोड़ने के बाद ममता की पार्टी को तहस नहस कर देंगे, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. टीएमसी में बेशक मुकुल रॉय कर्ताधर्ता हुआ करते थे और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के संपर्क में हुआ करते थे, लेकिन वो सारे काम ममता बनर्जी के नाम और चेहरे पर किया करते थे - ममता का साथ छूटने के बाद मुकुल रॉय काडर से ऑटो डिस्कनेक्ट हो गये.

शुभेंदु अधिकारी का अपना जनाधार है. चुनावी राजनीति में भी उनको बाहुबल और धनबल जुटाने में पूरी तरह सक्षम माना जाता रहा है - निश्चित तौर बीजेपी में शुभेंदु अधिकारी की पोजीशन मुकुल रॉय से बेहतर हो सकती है.

अभी तो ऐसा ही लगता है जैसे बीजेपी को शुभेंदु अधिकारी के सार्वजनिक तौर पर फैसले सुनाने का इसलिए भी इंतजार है क्योंकि पार्टी को मुकुल रॉय की कमियों की भरपाई की शुभेंदु अधिकारी से ही उम्मीद है.

मजबूर तो मुकुल की ही तरह शुभेंदु भी हैं

शुभेंदु अधिकारी के बीजेपी ज्वाइन करने में रोल मॉडल भी मुकुल रॉय ही हैं और सबसे बड़ी बाधा भी वही साबित हो रहे हैं, लेकिन ये भी सच है कि शुभेंदु अधिकारी के सामने भी मुकुल रॉय जैसी परिस्थितियां ही हैं - जांच एजेंसियों के रडार पर मुकुल रॉय की तरह शुभेंदु अधिकारी भी बने हुए हैं.

मुकुल रॉय की बीजेपी में हैसियत देख कर शुभेंदु अधिकारी की रूह कांप जाती होगी. कहां टीएमसी में मुकुल रॉय एक जमाने में ममता बनर्जी के इतने भरोसेमंद रहे कि दिनेश त्रिवेदी को रेल बजट के बीच हटा कर मुकुल रॉय को मंत्री बनवा दिया था - और कहां बीजेपी में मुकुल रॉय को तीन साल बाद अब जाकर उपाध्यक्ष बनाया गया है. बंगाल चुनाव में भी कैलाश विजयवर्गीय और दिलीप घोष के बाद मुकुल रॉय की तीसरी पोजीशन है.

वैसे भी कोई पार्टी छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन करने के बाद भी वो सब तो हासिल करना किसी भी नेता के लिए भी नामुमकिन है जो उसके मातृ-संगठन में मुमकिन है - मुकुल रॉय ही क्यों ज्योतिरादित्य सिंधिया भी तो ऐसे ही उदाहरण हैं. ये ठीक है कि सिंधिया को बीजेपी ने राज्य सभा भेज दिया है, लेकिन मुकुल रॉय का तो अभी प्रोबेशन ही चल रहा है - लोक सभा चुनाव में बीजेपी को बंगाल में 18 सीटें मिलीं लेकिन मुकुल रॉय को विधानसभा चुनावों से ऐन पहले कोई पद मिला है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो कमलनाथ सरकार गिराकर बीजेपी की सरकार ही बनवा दी है लेकिन अब भी उनके समर्थकों को अपने नेता के मंत्री बनने का इंतजार ही है. मंत्री बनेंगे भी तो जरूरी नहीं कि शिवराज कैबिनेट की तरह वो दबाव बना पायें क्योंकि वो सब उपचुनावों के पहले की बातें थीं - अब तो जो विभाग मिलेगा संतोष कर लेने के अलावा कोई चारा भी नहीं है. कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया और तृणमूल कांग्रेस में किसी जमाने में मुकुल रॉय की भी एक जैसी ही हैसियत हुआ करती रही.

ऐसी भी कोई संभावना नहीं है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को बीजेपी कभी मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाएगी - जैसे हिमंत बिस्वा सरमा असम में बीजेपी की सरकार बनवाने के बाद नॉर्थ ईस्ट में पार्टी का तेजी से विस्तार करते जा रहे हैं, लेकिन वो मुख्यमंत्री नहीं बन सकते क्योंकि वो संघ की पृष्ठभूमि से नहीं आते. निश्चित तौर पर शुभेंदु अधिकारी के मन में ऐसे सवाल लगातार गूंज रहे होंगे. मुश्किल तो ये है कि मुकुल रॉय की तरह वो भी केंद्र में सत्ता की राजनीति की दूसरी छोर पर हैं जहां केंद्रीय एजेंसियां गिद्ध दृष्टि जमाये रखती हैं. अभी अभी ममता बनर्जी के करीबी जिन पांच नेताओं को नोटिस थमाया गया है उनमें शुभेंदु अधिकारी भी शामिल हैं - और जिस शारदा घोटाले को लेकर ये नोटिस मिला है उसकी जांच सीबीआई भी कर रही है.

ऐसे में शुभेंदु अधिकारी के पास ऑप्शन भी तो कम ही बचे हैं. कम से कम पाला बदलने के बाद शुभेंदु भी मुकुल की तरह चैन से अपने घर में सो तो सकेंगे - और ये भी कम है क्या?

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