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Updated: 23 अगस्त, 2017 01:08 PM
मोहित चतुर्वेदी
मोहित चतुर्वेदी
  @mohitchaturvedi123
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भारत में कई ऐसे फैसले हुए जहां जज कोई एक मत नहीं ले पाए. किसी का नजरिया अलग था तो किसी का अलग. अब ट्रिपल तलाक के फैसले को ही ले लीजिए. ट्रिपल तलाक को भारत में सबसे विवादित प्रथा रही है. कई लोगों ने इसका विरोध किया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो इस फैसले के लिए अलग 5 जजों की बेंच बनाई गई. लग रहा था कि फैसला आसानी से ले लिया जाएगा. लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं हुआ.

इस विवाद को निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच जजों की जो बेंच बनाई. उसमें सभी जज अलग-अलग धर्मों से थे. जस्टिस कुरियन जोसेफ ईसाई, आरएफ़ नरीमन पारसी, यूयू ललित हिन्दू, अब्दुल नज़ीर मुस्लिम और इस बेंच की अध्यक्षता कर रहे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जेएस खेहर सिख हैं.

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ट्रिपल तलाक का 3 जज ने किया विरोध तो 2 ने किया समर्थन

पांच में से तीन जज जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस नरीमन और जस्टिस यूयू ललित ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया. तीनों ने जस्टिस नजीर और सीजेआई खेहर की राय का विरोध किया. तीनों जजों ने तीन तलाक को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करार दिया. जजों ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का हनन करता है. यह प्रथा बिना कोई मौका दिए शादी को खत्म कर देती है. कोर्ट ने मुस्लिम देशों में ट्रिपल तलाक पर लगे बैन का जिक्र किया और पूछा कि भारत इससे आजाद क्यों नहीं हो सकता? बता दें कि तीन जजों के बहुमत वाले इस फैसले का मतलब यह है कि कोर्ट की तरफ से इस व्यवस्था को खारिज कि गया है.

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राम मंदिर मुद्दे पर फैसला

30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राम मंदिर मुद्दे पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जमीन का एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में जमीन बांटने का फैसला दिया.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या के विवादित स्थल को रामजन्मभूमि करार दिया था. हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ जमीन को तीन हिस्सों में बंटवारा किया था. इसमें से एक हिस्सा हिंदू महासभा को दिया गया जिसमें राम मंदिर बनना था. विवादित स्थल का तीसरा निरमोही अखाड़े को दिया गया था. इस फैसले को देश के सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.

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शाह बानो केस

आइये अब आपको बताते है शाह बानो केस के बारे में. इंदौर की रहने वाली मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके पति मोहम्मद खान ने 1978 में तलाक दे दिया था. पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी और पति के खिलाफ गुजारे भत्ते का केस जीत भी लिया. सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी शाहबानो को पति से हर्जाना नहीं मिल सका.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया. इस विरोध के बाद 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित किया. इस अधिनियम के तहत शाहबानो को तलाक देने वाला पति मोहम्मद गुजारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गया था. कुल मिलाकर विवादित मुद्दे पर सपबी जजों की अलग-अलग राय रही. जिसके कारण फैसला लेने में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

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लेखक

मोहित चतुर्वेदी मोहित चतुर्वेदी @mohitchaturvedi123

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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