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Updated: 04 फरवरी, 2021 08:45 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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पश्चिम बंगाल और केरल में जैसे कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ अलग अलग रिश्ता कायम कर रखा है, तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) भी राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के साथ बिहार और बंगाल में वैसा ही कुछ करना चाहते हैं - या कहें करने की कोशिश कर रहे हैं. बल्कि, कोशिश भी मंजिल के काफी करीब लग रही है.

लेकिन तेजस्वी यादव ये तर्क कतई नहीं दे रहे हैं कि ये सब वो इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि राहुल गांधी ने भी गठबंधन साथियों के साथ ऐसा ही किया है - बल्कि, तेजस्वी यादव ने इसके लिए अपने ही गठबंधन साथी सीपीआई एमएल नेता दीपांकर भट्टाचार्य की दलील सामने रख दी है - 'ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) को पश्चिम बंगाल में मजबूत करना क्यों जरूरी है?'

तेजस्वी यादव ने अपने दो साथियों को कोलकाता भेज कर पश्चिम बंगाल में राष्ट्रीय जनता दल और तृणमूल कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन की संभावनाओं को औपचारिक रूप देने के लिए अपनी तरफ से पहल भी कर दी है. तेजस्वी यादव के लिए ये सब इतना आसान भी न था क्योंकि लालू प्रसाद यादव के सोनिया गांधी और ममता बनर्जी दोनों ही से अच्छे संबंध रहे हैं. बिहार चुनाव में भी गठबंधन पर फाइनल मुहर लालू यादव और सोनिया गांधी के नाम पर ही लग पायी थी.

अब सवाल ये है कि तेजस्वी यादव की राहुल गांधी से कहीं अखिलेश यादव जैसी ही नाराजगी तो नहीं है - ये समझने की वजह ये है कि बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद आरजेडी के कई नेता राहुल गांधी के खिलाफ काफी आक्रामक तेवर में देखे गये थे.

ये भी तो हो सकता है, तेजस्वी यादव ये सब तात्कालिक तौर पर कर रहे हों. पश्चिम बंगाल चुनाव में जितना संभव हो सके उतनी हिस्सेदारी के लिए. चुनाव बाद फिर से चीजें पुराने अंदाज में लौट ही सकती हैं. ये तो विकल्प बचा ही रहेगा.

लेकिन ये भी तो हो सकता है कि तेजस्वी यादव को राहुल गांधी के मुकाबले ममता बनर्जी के नेतृत्व में भविष्य ज्यादा सुरक्षित दिखायी दे रहा हो - राहुल गांधी की लगातार नाकामी से निराश हो चुके हों और ममता बनर्जी के मोदी विरोध की आवाज धारदार होने के साथ साथ कारगर भी समझ आ रही हो.

लालू परिवार ने गांधी परिवार को ममता के लिए छोड़ा

लालू परिवार के राष्ट्रीय जनता दल और तृणमूल कांग्रेस के बीच भविष्य के तालमेल को लेकर अपडेट यही है कि पटना से कोलकाता पहुंचे दोनों नेताओं की टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी से मुलाकात हो चुकी है.

तय कार्यक्रम के अनुसार बिहार से बंगाल मिशन पर आरजेडी के दो सीनियर नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी और श्याम रजक भेजे गये - ये नेता लालू यादव के जमाने से परिवार के करीबी रहे हैं और तेजस्वी यादव को भी दोनों पर पक्का यकीन रहता है.

पश्चिम बंगाल में आरजेडी की मौजूदगी की बात करें तो अब तक सिर्फ 2006 के चुनाव में बड़ा बाजार विधानसभा की एक सीट पर ही कामयाबी मिल पायी है - उसके बाद कभी कोई ऐसी सूरत नहीं बन पायी. माना ये भी जाता है कि बड़ा बाजार में भी जिसने चुनाव जीता उसमें पार्टी का रोल सिर्फ टिकट देने भर था, जीत तो उसने खुद के बूते ही सुनिश्चित की थी.

mamata banerjee, tejashwi yadav, rahul gandhiपश्चिम बंगाल चुनाव में राहुल गांधी का साथ छोड़ कर ममता बनर्जी के साथ जाने का तेजस्वी यादव का फैसला भविष्य की राजनीति से जुड़ा लगता है.

अब सवाल उठता है कि जब बरसों से लालू यादव के सोनिया गांधी से संबंध रहे हैं और वैसे ही संबंध ममता बनर्जी के साथ भी रहे हैं तो मामला यहां तक पहुंचा कैसे? दैनिक जागरण में प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि आरजेडी नेतृत्व काफी दिनों से इस बात को लेकर बहुत दुविधा में रहा. रिपोर्ट के संकेत को समझा जाये तो लालू यादव खुद नहीं तय कर पा रहे थे कि पश्चिम बंगाल चुनाव में वो किसके साथ जायें.

आरजेडी के कांग्रेस के साथ जाने का मतलब ममता बनर्जी के विरोध में चुनाव लड़ना होता - और दूसरा रास्ता ठीक इसका उलटा होता. सीधे सीधे कोई एक राजनीतिक स्टैंड लेना जोखिम भरा था. रिपोर्ट के मुताबिक, लालू प्रसाद ने भी सबसे पहले वैसी ही कोशिशें की जो कोई भी शुरू में करता है - आगे की मुश्किल से बचने के मकसद से पहले तो लालू यादव ने दोनों दलों को साथ लाने की पूरी कोशिश की, लेकिन नतीजा वही रहा जिसकी पहले से ही आशंका रही.

अब जरा बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद सीपीआई-एमएल महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के बयान पर गौर कीजिये. तब दीपांकर भट्टाचार्य ने वाम दलों को सीधे सीधे बदले की भावना के साथ ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने की जल्दबाजी न करने की सलाह दी थी. दीपांकर भट्टाचार्य का तर्क था कि लेफ्ट के लिए ममता बनर्जी और बीजेपी दोनों एक जैसे राजनीतिक विरोधी हैं, लेकिन एक बार ये जरूर सोचना चाहिये कि दोनों में उनकी राजनीति के लिए ज्यादा खतरनाक कौन है? दीपांकर भट्टाचार्य ने ममता बनर्जी के मुकाबले बीजेपी को ज्यादा खतरनाक बताया था - और सलाह दी थी कि वाम दलों को ममता बनर्जी के साथ चुनावी समझौता कर लेना चाहिये.

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है तृणमूल कांग्रेस नेता सौगत राय ने बीजेपी के खिलाफ लेफ्ट पार्टियों को सत्ताधारी टीएमसी का साथ देने की अपील की थी. हालांकि, सौगत राय के इस बयान को तृणमूल कांग्रेस पर बीजेपी के दबाव से उपजी पुकार के तौर पर देखा गया. हाल के दिनों में टीएमसी छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन करने वाले नेताओं का तांता जो लगा हुआ है.

कुछ दिन पहले तेजस्वी यादव की तरफ से एक बयान आया जो पश्चिम बंगाल चुनाव में आरजेडी के स्टैंड में मददगार साबित हुआ. तेजस्वी यादव ने साफ साफ बोल दिया कि पश्चिम बंगाल में जो बीजेपी को हराने की स्थिति में होगा, आरजेडी उसी पार्टी का साथ देगा. बीजेपी विरोध की ये लाइन निकली तो तेजस्वी के महागठबंधन साथी दीपांकर भट्टाचार्य की सलाह से प्रेरित रही, लेकिन इसने आरजेडी की कांग्रेस और टीएमसी में से किसी एक तरफ खड़े होने की असमंजस और मुश्किल दोनों ही आसान कर देने वाली रही. तेजस्वी यादव के मिशन बंगाल को अंजाम देने के सफर पर निकले श्याम रजक कहते हैं, बीजेपी को रोकने के लिए ममता बनर्जी का साथ देना जरूरी है. श्याम रजक की राय में आरजेडी के लिए पश्चिम बंगाल में विधानसभा सीटें नहीं बल्कि सूबे से बीजेपी का सफाया ज्यादा अहम है. श्याम रजक का कहना है कि बंगाल से बीजेपी के सफाये के लिए जो भी कुर्बानी देनी होगी देंगे.

यहां कुर्बानियों की कोई लंबी चौड़ी फेहरिस्त तो नहीं है, ले देकर एक ही कुर्बानी देनी है ममता बनर्जी के लिए राहुल गांधी सहित पूरे गांधी परिवार को नाराज करने का रिस्क ही तो है - लेकिन अब ये समझना जरूरी है कि क्या तेजस्वी यादव के ममता बनर्जी पर एक तर्क ढूंढ कर राहुल गांधी पर तरजीह देने की बात बस चुनाव तक ही है या ये सिलसिला आगे भी जारी रहने वाला है?

तेजस्वी के लिए राहुल गांधी से अहम ममता बनर्जी क्यों?

ऐसा भी नहीं है कि आरजेडी को पश्चिम बंगाल में जितनी सीटों पर चुनाव लड़ना है, वो कांग्रेस के साथ होने पर नहीं मिलतीं. आरजेडी पश्चिम बंगाल में सिर्फ 6 सीटों पर लड़ना चाहती है - खास कर वे सीटें जो बिहार की सीमा से सटी हुई हैं या फिर जहां पर भोजपुरी बोलने वाले या पूर्वांचल या बिहार के लोग रहते हैं. जाहिर है कांग्रेस के सामने इससे डबल सीटों का भी प्रस्ताव आता तो वो इंकार नहीं ही करती. खासकर बिहार चुनाव के नतीजों के बाद की हालत में.

कोलकाता में तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी से आरजेडी नेताओं से पहले चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ मीटिंग हुई. माना जा रहा है कि अभिषेक बनर्जी ही चुनाव से जुड़ी काफी चीजें हैंडल कर रहे हैं. अभिषेक बनर्जी, ममता बनर्जी के भतीजे हैं और बीजेपी उनको राजकुमार कह कर हमले बोल रही है, ठीक वैसे ही जैसे बीजेपी राहुल गांधी को युवराज कह कर बुलाती है और तेजस्वी यादव को जंगलराज का युवराज.

वैसे राहुल गांधी की सेहत पर इन चीजों का बहुत फर्क पड़ता हो ऐसा नहीं लगता - क्योंकि बंगाल से ज्यादा तो वो तमिलनाडु पर जोर दे रहे हैं और तमिलनाडु के बाद भी बंगाल का नंबर नहीं आता क्योंकि केरल में भी तो चुनाव होने जा रहे हैं.

जैसे बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव की चुनावी मुहिम में प्रशांत किशोर की स्टाइल की झलकियां बार बार देखने को मिली थीं, ऐसा लगता है कि ये सब होने के पीछे कहीं न कहीं कोई न कोई कड़ी प्रशांत किशोर ही हैं. फिर तो ये भी मान कर चलना चाहिये कि लालू परिवार के कांग्रेस और टीएमसी को लेकर असमंजस खत्म करने में भी प्रशांत किशोर की ही काउंसिलिंग से मदद मिली होगी.

अब अगर पश्चिम बंगाल से दिल्ली का रुख करें तो मुंबई से आती आवाजों पर भी ध्यान देना होगा. महाराष्ट्र में शिवसेना कहने को तो गठबंधन सरकार में कांग्रेस की लीडिंग पार्टनर है, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व को लेकर उसके तेवर काफी देखने को मिले हैं. कई बार तो ऐसा भी लगा कि शिवसेना की तरफ से शरद पवार को यूपीए का चेयरपर्सन बनाने की पैरवी की जा रही है.

वैसे तो पहली बार उद्धव ठाकरे ने सोनिया गांधी की मौजूदगी में ही मोदी सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए ममता बनर्जी के सामने प्रस्ताव रखा था, लेकिन बाद में ये समझ में आया कि शिवसेना कांग्रेस पर उन दलों को तरजीह देने की कोशिश कर रही है जो फिलहाल न तो यूपीए में हैं और न ही एनडीए में.

ममता बनर्जी भी ऐसी ही नेता हैं जो एनडीए विरोध के नाम पर यूपीए के साथ होती हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने के साल भर बाद ही यूपीए छोड़ दिया था. शिवसेना कांग्रेस नेतृत्व को गिना रही है कि ममता बनर्जी ही नहीं, बल्कि, नवीन पटनायक, जगनमोहन रेड्डी या एनडीए छोड़ने वाला पंजाब का बादल परिवार भी यूपीए में नहीं है तो ऐसे मोर्चे का क्या मतलब रह जाता है. शिवसेना तो यूपीए को एनजीओ जैसा भी बता चुकी है.

जो हालात हैं, तेजस्वी यादव का राहुल गांधी से मोहभंग होना भी कोई अचरज वाली बात नहीं है. अब भी राहुल गांधी कांग्रेस की कमान थामने को तैयार नहीं नजर आये हैं - और यही वजह रही कि कांग्रेस में पूर्णकालिक अध्यक्ष का मामला मई तक के लिए टाल दिया गया है. ऐसे में अगर तेजस्वी यादव को राहुल गांधी से बेहतर ममता बनर्जी लगती हैं तो आकलन बहुत गलत भी नहीं कहा जा सकता - वैसे भी विरासत की राजनीति को आगे बढ़ाने के हिसाब से देखें तो तेजस्वी यादव क्षेत्रीय लेवल पर ही स्कोर तो राहुल गांधी से ज्यादा ही बना रहे हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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