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Updated: 25 जनवरी, 2021 01:05 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राहुल गांधी का एक छोटे से अंतराल में तमिलनाडु (Rahul Gandhi Tamil Nadu visit) का दो बार दौरा - और पश्चिम बंगाल की तरह नजर उठा कर भी न देखना, थोड़ा अजीब लगता है. विदेश दौरे से लौटने के तत्काल बाद राहुल गांधी जल्लीकट्टू देखने चेन्नई पहुंचे थे - और उसके बाद फिर तीन दिन के दौरे पर निकले हैं. वो भी तब जब पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बीजेपी नेतृत्व आमने सामने भिड़े हुए हैं. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में ममता बनर्जी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच तो शेयर करती हैं लेकिन जय श्रीराम का नारा लगते ही आपे से बाहर हो जाती हैं. राहुल गांधी को इससे कोई मतलब नहीं हो सकता, लेकिन इससे वो स्थिति की गंभीरता तो समझ ही सकते हैं. फिर भी अभी तक राहुल गांधी की पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं देखने को मिली है.

ऐसा क्यों लगता है जैसे राहुल गांधी पश्चिम बंगाल चुनाव (West Bengal Election 2021) की जगह तमिलनाडु चुनाव पर ज्यादा फोकस हैं! 2021 में विधानसभा चुनाव तो पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित पांच राज्यों में होने जा रहे हैं, लेकिन अभी तक तो राहुल गांधी सिर्फ तमिलनाडु पर ही जोर दे रहे हैं.

ऐसा तो नहीं कि बिहार चुनाव के नतीजों से सबक लेकर राहुल गांधी ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति में बदलाव किया हो. बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल कि टिप्पणी थी कि कांग्रेस नेतृत्व को हार की आदत पड़ चुकी है.

हो सकता है राहुल गांधी को लगता हो कि तमिलनाडु में कांग्रेस पश्चिम बंगाल के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर सकती है. पश्चिम बंगाल में असली लड़ाई ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच है. हो सकता है राहुल गांधी कांग्रेस के लिए कोई खास उम्मीद नहीं पा रहे हों.

जो नजरिया राहुल गांधी का पश्चिम बंगाल को लेकर लगता है, बीजेपी वैसा ही तमिलनाडु को लेकर लगता है सोच रही है. बिहार चुनाव के बाद से देखें तो एक सरकारी आयोजन को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सिर्फ एक बार चेन्नई के दौरे पर गये थे, जबकि पश्चिम बंगाल के दौरे पर अमित शाह के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जेपी नड्डा का तो लगातार कार्यक्रम बना हुआ है.

क्या बीजेपी (BJP) के साथ सीधा टकराव टालने के लिए भी कांग्रेस नेतृत्व तमिलनाडु पर ज्यादा ध्यान दे रहा है?

रणनीति तो बदली, लेकिन भाषण वही है

राहुल गांधी के तमिलनाडु दौरे से कई चीजें साफ हो रही हैं. राहुल गांधी अब हर चुनाव में हाथ आजमाने की जगह वहां फोकस कर रहे हैं जहां थोड़ी बहुत उम्मीद लगती हो. कांग्रेस के लिए पश्चिम बंगाल के मुकाबले तमिलनाडु में थोड़ा ज्यादा स्कोप है.

तमिलनाडु में फिलहाल AIADMK की सरकार है और परंपरा के मुताबिक अगली बार DMK नेता एमके स्टालिन को सत्ता पर काबिज होने की उम्मीद है. AIADMK के साथ बीजेपी का चुनावी गठबंधन है, जबकि कांग्रेस का डीएमके के साथ समझौता हुआ है. 2016 में भी परंपरा के अनुसार डीएमके को सरकार बना पाने की उम्मीद रही होगी, लेकिन तब जे. जयललिता ने उस परा पानी फेर दिया. अब तमिलनाडु की राजनीति में न तो जयललिता हैं और न ही एम. करुणानिधि.

एमके. स्टालिन के सामने ई. पलानीसामी और ओ. पनीरसेल्वम से चुनावी लड़ाई है जो आपस में ही उत्तराधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं. शशिकला और उनके भतीजे पहले ही हाशिये पर जा चुके हैं, ऐसे में एमके स्टालिन को उम्मीदें बढ़ी हुई नजर आ रही होंगी.

rahul gandhiराहुल गांधी को तमिलनाडु ज्यादा सूट करता है

राहुल गांधी को डीएमके का प्लस प्वाइंट अपने लिए फायदेमंद लग रहा होगा और यही उनके तमिलनाडु पर ज्यादा फोकस होने की वजह भी लगती है. निश्चित तौर पर बिहार चुनाव जैसे नतीजे टालने की ये कोशिश लगती है.

हैरानी की बात ये है कि राहुल गांधी ने कांग्रेस के लिए रणनीतिक बदलाव तो कर लिया है, लेकिन उनके भाषण का कंटेंट नहीं बदल रहा है. ऐसा लगता है पुरानी कॉपी ही पढ़े जा रहे हों. राहुल गांधी के भाषण का टोन और कंटेंट दोनों ही बाकी चुनावों जैसा ही है, बिहार चुनाव से ज्यादा ही मिलता जुलता लगता है. राहुल गांधी ने अपने पिछले चेन्नई दौरे में दिल्ली की सीमा पर किसानों के आंदोलन का जोर शोर से जिक्र किया था - और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा था कि मोदी सरकार को तीनों कृषि कानून वापस तो लेने ही होंगे. तमिलनाडु दौरे के पहले दिन तिरुपुर की सभा में भी राहुल गांधी ने तीनों कानूनों को लेकर वैसा ही जोरदार हमला बोला है.

किसानों का मुद्दा तो ठीक है, चलेगा भी, लेकिन एक बार फिर वो बिहार चुनाव की तरह ही मोदी सरकार के खिलाफ तेवर अपनाये हुए हैं, न कि तमिलनाडु की ऐआईएडीएमके सरकार को लेकर. बिहार में भी राहुल गांधी के निशाने पर ज्यादातर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही होते थे, बनिस्बत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मुकाबले.

एक बानगी आप भी देखिये, राहुल गांधी कहते हैं, 'मैं आपसे बात कर रहा हूं... आपसे सवाल कर रहा हूं - क्या आपने कभी पीएम को ऐसा करते देखा है?' फिर वो समझाते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज का तौर तरीका कैसा है - कहते हैं, 'वो पांच लोगों के साथ एक कमरे में बैठेंगे... देश के सबसे बड़े कारोबारी लोगों के साथ चर्चा करेंगे... वो कभी भी किसानों, मजदूरों या छोटे व्यापारियों के साथ चर्चा नहीं करेंगे कि वे क्या सोचते हैं?'

प्रधानमंत्री मोदी के रेडियो पर मन की बात पर कटाक्ष करते हुए एक रोड शो में राहुल गांधी कहते हैं, 'मैं यहां आपको ये बताने नहीं आया हूं कि क्या करना चाहिये या अपने मन की बात करने नहीं आया हूं... मैं यहां आपको सुनने आया हूं... आपकी समस्याओं को सुनकर उन्हें सुलझाने में मदद करने आया हूं.' अब एक चुनावी वादा भी सुन लीजिये. कांग्रेस के सत्ता में आने की स्थिति में राहुल गांधी कहते हैं, 'हम आपको ऐसा GST देंगे जिसमें सिर्फ एक टैक्स होगा और वो कम से कम होगा.'

राहुल गांधी आखिर कौन सी सत्ता में आने की बात कर रहे हैं? तमिलनाडु में चुनाव तीन महीने बाद होने जा रहे हैं, लेकिन वो राज्य सरकार जीएसटी को लेकर क्या कर सकती है? जीएसटी में तो जो कुछ भी बदलाव करना होगा केंद्र सरकार ही करेगी - और केंद्र सरकार तो 2024 में बदलेगी. अब 2024 में कांग्रेस की सरकार की संभावना पर भला 2021 में राहुल गांधी को वोट क्यों दे?

ये छोटी सी चीज राहुल गांधी और उनके सलाहकर जितनी जल्दी समझ लेंगे - कांग्रेस की बहुत सारी चुनौतियां तो उसी वक्त खत्म होने शुरू हो जाएंगी.

बिहार से सबक लेकर कांग्रेस ने बदली रणनीति

बिहार चुनाव में कांग्रेस ने राहुल गांधी की रैली भी उसी दिन रखी थी, जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी रैली कर रहे थे. जगह अलग अलग थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर नीतीश कुमार थे, तो राहुल गांधी आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के साथ रैली कर रहे थे. तेजस्वी यादव के निशाने पर नीतीश कु्मार थे जबकि राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी को टारगेट कर रहे थे.

ताजा बदलाव भी देखिये. चुनाव अभियान पर दिल्ली से प्रधानमंत्री मोदी भी निकलते हैं और राहुल गांधी भी. प्रधानमंत्री मोदी नेताजी जयंती के कार्यक्रम में हिस्सा लेने पश्चिम बंगाल पहुंचते हैं और राहुल गांधी तमिलनाडु में रैली और रोड शो करते हैं.

अब ये कोई संयोग तो नहीं ही लगता. राजनीति में ये सब रणनीति के तहत होता है, संयोग से नहीं. अगर बिहार का कार्यक्रम संयोग रहा तो ये सोची समझी रणनीति ही हुई. अगर दोनों ही पश्चिम बंगाल में होते तो बिहार की ही तरह मीडिया कवरेज में हिस्सेदारी करनी पड़ती.

पश्चिम बंगाल जैसा व्यवहार भी केरल के साथ हो रहा लगता है. राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद हैं. बताते हैं कि तमिलनाडु के बाद राहुल गांधी के केरल दौरे का भी कार्यक्रम बना हुआ है. जाहिर है देर सबेर पश्चिम बंगाल का भी बनेगा ही - लेकिन जब बनेगा तब बनेगा.

rahul gandhi, mamata banerjeeराहुल गांधी को ममता बनर्जी से परहेज है या पश्चिम बंगाल से?

कहीं राहुल गांधी को ऐसा तो नहीं लग रहा कि पश्चिम बंगाल में ज्यादा स्कोप तो है नहीं. बिहार जैसा तो कतई नहीं है. बिहार में कम से कम महागठबंधन सीधे सीधे एनडीए को टक्कर दे रहा था. बंगाल में असली लड़ाई तो बीजेपी और ममता बनर्जी के बीच ही है. अगर बिहार के महागठबंधन की तरह बंगाल में भी टीएमसी के साथ चुनावी समझौता होता तो बात और होती. ऐसे में बंगाल में एनर्जी बर्बाद करने से क्या फायदा?

बंगाल में टीएमसी और कांग्रेस के बीच कोई समझौता न होने की सीधी वजह तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ही लगते हैं, लेकिन असल बात तो ये है कि राहुल गांधी और ममता बनर्जी दोनों ही एक दूसरे को बिलकुल भी पसंद नहीं करते.

किस तरफ से ऐसा कम या ज्यादा है ये अलग बात है, लेकिन ममता बनर्जी कई मौकों पर राहुल गांधी से दूरी बनाते देखी गयी हैं - वो भी तब जब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे. आम चुनाव से पहले विपक्षी नेताओं के बुलावे पर दिल्ली पहुंचीं ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से तो 10, जनपथ जाकर मुलाकात की, लेकिन राहुल गांधी से किसी तरह का संपर्क तक न किया. तब इस बात की काफी चर्चा रही कि ममता बनर्जी दिल्ली आकर भी राहुल गांधी से मिले बगैर चली गयीं.

एक और ऐसा वाकया 2019 के आम चुनाव के नतीजे आने के ठीक पहले का है. एग्जिट पोल के बाद भी टीडीपी नेता एन. चंद्रबाबू नायडू विपक्ष को एकजुट करने को लेकर काफी एक्टिव थे. ममता बनर्जी से मिलने से पहले वो दिल्ली में राहुल गांधी से मिले. ऐसा लगा राहुल गांधी को ममता बनर्जी के साथ मीटिंग से कोई खास दिक्कत नहीं है, लेकिन ममता बनर्जी ने मीटिंग से इंकार कर दिया था. ममता बनर्जी की नाराजगी की नींव तब पड़ी जब वो विपक्षी खेमे में अरविंद केजरीवाल को भी शामिल करना चाहती थीं, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व तैयार नहीं हुआ. बाद में आम चुनाव से पहले भी ममता ने कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन कराने की कोशिश की, लेकिन शीला दीक्षित का बहाना लेकर राहुल गांधी टाल गये.

अब तो यही लगता है जैसे राहुल गांधी ने बंगाल अधीर रंजन के हवाले कर दिया है - और केरल में ओमन चांडी भी शशि थरूर को खासा तवज्जो दे रहे हैं. शशि थरूर के केरल भर के दौरे कार्यक्रम बनाया जा रहा है.

तमिलनाडु में राहुल गांधी को एकल नये दोस्त मिल गये हैं - उदयनिधि स्टालिन. उदयनिधि स्टालिन, एमके स्टालिन के बेटे और डीएमके यूथ विंग के प्रमुख हैं. राहुल गांधी को वैसे भी चेन्नई में कंफर्ट जोन मिल ही जाता है. नमूना देखना हो तो चेन्नई के स्टेला मारिस गर्ल्स स्कूल में राहुल गांधी का एक पुराना शो देख सकते हैं, जिसमें राहुल गांधी ने अपना फेसम डायलॉग बोला था - 'नाम तो सुना ही होगा!'

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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