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Updated: 29 जुलाई, 2022 04:46 PM
निधिकान्त पाण्डेय
निधिकान्त पाण्डेय
  @1nidhikant
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'मेरा वचन ही है मेरा शासन' ये डायलॉग सुनते ही आपको बाहुबली फिल्म की याद तो आ ही गई होगी, फिल्म के दोनों भागों में आपने देखा होगा कि राजमाता शिवगामी इस डायलॉग को कुछ खास अवसरों पर प्रयोग में लाती हैं. ओरिजिनल फिल्म बनी थी तेलुगु भाषा में और उसमें ये डायलॉग कुछ इस तरह था- ‘इदे ना माट, ना माटे शासनम्!' जानकार लोग इसका अर्थ कुछ यूं बताते हैं– 'ये मेरा वचन है, मेरा वचन ही कानून है.' आप सोच रहे होंगे कि मैं बाहुबली के डायलॉग की चर्चा क्यों कर रहा हूं? दरअसल, कुछ ऐसी ही रूलिंग सुप्रीम कोर्ट ने ED यानी प्रवर्तन निदेशालय के लिए भी जारी कर दी है.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट- PMLA के तहत ED को मिले अधिकारों को जायज ठहरा दिया है. सर्वोच्च अदालत में जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने अपने फैसले में जो कहा उसकी कुछ मुख्य बातें इस तरह से हैं –

Enforcement Directorate, Investigation, Supreme Court, Narendra Modi, Prime Minister, BJP, Black Money. Partha Chatterjeeईडी को लेकर कुछ बातें सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट हो गयी हैं

PMLA कानून में बदलाव सही है.

ED की गिरफ्तारी की शक्तियां भी सही.

ED की गिरफ्तारी की प्रक्रिया मनमानी नहीं है.

ED को समन भेजने और गिरफ्तारी का अधिकार है.

सुप्रीम कोर्ट ने प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के कई प्रावधानों को संवैधानिक चुनौती देने वाली 240 से ज्यादा याचिकाओं पर बुधवार 27 जुलाई को सुनवाई की और उन याचिकाओं को रद्द करते हुए ये फैसला सुनाया. कुल मिलाकर बात यही सामने आई कि ED के पास जितने भी अधिकार हैं, वो सही हैं. तो हुआ न कुछ ऐसा कि ED का वचन ही कानून होगा।

अब ED खुद को बाहुबली समझे या शिवगामी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को कांग्रेस सहित विपक्ष के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है. यानी वो लोग जिनके खिलाफ ED की कार्रवाई चल रही है या चल रही थी, (थी इसीलिए क्योंकि कई नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर कुछ समय के लिए अपने खिलाफ चल रही ED की रेड, गिरफ्तारी या कार्रवाईयों को रुकवा दिया था और उन सारी याचिकाओं को अब सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करके ED के अधिकारों को सही ठहरा दिया है) तो उन लोगों के मन में दहशत जरूर हो रही होगी कि उनके खिलाफ जो केस चल रहे हैं वो फिर से खुलेंगे और हो सकता है कि ED के हथौड़े या सवाल उनपर जोरदार तरीके से बरसेंगे.

ऐसे कौन-कौन से मुख्य लोग हैं जिन्हें ये डर सता रहा है या जिनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के केस खुल सकते हैं जिसके कारण वो लोग ‘सकते’ में हैं. उन सभी पर विस्तार से चर्चा होगी. साथ ही ये भी बात करेंगे कि मनी लॉन्ड्रिंग ने आतंकवाद को भी बढ़ावा दिया है और सुप्रीम कोर्ट ने इसे देश और दुनिया के लिए एक गंभीर खतरा मानते हुए इस पर भी दिशा-निर्देश जारी किए. इन सब मुद्दों पर करेंगे विस्तार से चर्चा.

जो भी हो, सुप्रीम कोर्ट के ये कहने से कि PMLA कानून में बदलाव सही है, विपक्ष की हवा तो टाइट हो ही गई है. कुछ और बातों को सुप्रीम कोर्ट ने PMLA कानून के तहत सही ठहराया।

ED के सामने दिया गया बयान सबूत माना जाएगा.

अपराध से बनाई गई आय, उसकी तलाशी और जब्ती, सही.

आरोपी की गिरफ्तारी की शक्ति और संपत्तियों की कुर्की, सही.

आरोपी को एंफोर्समेंट केस इंफॉर्मेशन रिपोर्ट ECIR देने की जरूरत नहीं.

FIR की तरह होता है ECIR, इसे आरोपी को देना जरूरी नहीं.

गिरफ्तारी के समय ED के लिए कारण बता देना ही काफी होगा.

बेल की कंडीशन को भी बरकरार रखा गया है.

मनी लॉन्ड्रिंग एक स्वतंत्र अपराध है.

5 धाराएं सही (सेक्शन 5, 18, 19, 24 और सेक्शन 44 में जोड़ी गई उपधारा)

भारत में मनी लॉन्ड्रिंग कानून, 2002 में बनाया गया था लेकिन 2005, 2009 और 2012 में इसमें संशोधन किया गया. PMLA (संशोधन) अधिनियम, 2012 में अपराधों की सूची में धन को छुपाना, अधिग्रहण या कब्जा करना और धन का क्रिमिनल कामों में इस्तेमाल आदि बातों को शामिल किया गया था.यहां मैं आपको बताता चलूं कि सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में मनी-लॉन्ड्रिंग कानून में फाइनेंस बिल के जरिए जो संशोधन किया था, उसकी संवैधानिक वैधता को लेकर कोई फैसला नहीं दिया है और इसे 7 जजों की पीठ को भेज दिया है.

याचिकाकर्ताओं ने मनी-लॉन्ड्रिंग कानून और इसके तहत ED को मिली तमाम शक्तियों की वैधता को चुनौती दी थी. याचिकाओं में कहा गया था कि केंद्रीय जांच एजेंसी को इस कानून के तहत छापेमारी, जब्ती और गिरफ्तारी के लिए मनमाना ताकत दी गई है, जिसके कारण एक निर्दोष को अपनी बेगुनाही साबित कर पाना मुश्किल हो जाता है लेकिन PMLA मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से याचिकाकर्ताओं और विपक्ष के कई नेताओं को बड़ा झटका लगा है.

जबकि कोर्ट ने साफ किया कि इस कानून की समीक्षा की गई है और जांच अधिकारी को किसी भी तरह की असीमित शक्तियां नहीं दी गई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गंभीर अपराध से निपटने के लिए कड़े कदम जरूरी हैं-

मनी लॉन्ड्रिंग ने आतंकवाद को भी बढ़ावा दिया है.

मनी लॉन्ड्रिंग आतंकवाद से कम जघन्य अपराध नहीं है.

मनी लॉन्ड्रिंग एक राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को प्रभावित करता है.

मनी लॉन्ड्रिंग आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी जैसे गंभीर अपराधों को भी बढ़ावा देता है.

PMLA, मनी लॉन्ड्रिंग गतिविधियों के विषय से निपटने के लिए एक विशेष कानून है.

PMLA का वित्तीय प्रणालियों पर अंतरराष्ट्रीय प्रभाव पड़ता है जिसमें देश की संप्रभुता और अखंडता शामिल है.

PMLA के कुछ प्रावधानों की वैधता को बरकरार रखते हुए न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, जस्टिस सीटी रविकुमार और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने और अपराध की आय संबंधित गतिविधियों में शामिल लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए एक व्यापक कानून की तत्काल आवश्यकता को संबोधित करने के लिए प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट बनाया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ये कोई सामान्य अपराध नहीं है.

पीठ ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने के लिए एक व्यापक कानून बनाने की आवश्यकता दुनिया भर में महसूस की गई क्योंकि उनकी अखंडता और संप्रभुता सहित देशों की वित्तीय प्रणालियों के लिए मनी लॉन्ड्रिंग एक गंभीर खतरा है. शीर्ष अदालत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय निकायों ने भी कड़े कानून बनाने की सिफारिश की है. अंतरराष्ट्रीय निकाय काफी समय से नियमित आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग के खतरे पर चर्चा कर रहे हैं.

कोर्ट ने कहा कि PMLA की प्रस्तावना से स्पष्ट है कि ये कानून मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने और इसमें शामिल संपत्ति की जब्ती के लिए बनाया गया है. इसमें कहा गया है कि ये अधिनियम न तो शुद्ध नियामक कानून है और न ही शुद्ध दंडात्मक कानून है, बल्कि मनी लॉन्ड्रिंग के संकट को दूर करने के लिए आवश्यक कई पहलुओं का एक मिश्रण है.

कोर्ट ने कहा कि अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों को चुनौती देने पर विचार करते हुए अदालत इस तरह के एक विशेष कानून को लागू करने के उद्देश्यों, कारणों और इससे निपटने वाले मुद्दों की गंभीरता से अनजान नहीं हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि जैसे-जैसे दुनिया डिजिटल युग में आगे बढ़ी, अपराधियों ने लॉन्ड्रिंग के नए तरीके खोजे और कानून ने उनसे निपटने के नए तरीके खोजे.

आज जैसा कि हम देखेंगे, 2002 अधिनियम में कई संशोधन FATF की सिफारिशों के जवाब में हैं. FATF एक अंतर सरकारी संगठन है जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग का मुकाबला करना है. अब वक्त हो चला है नेताओं और उनमें पैदा हुए नए खौफ का क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने उनकी रातों की नींद और दिन का आराम गायब कर दिया है.

एक वक्त था जब भारत में अपराधी लोग CBI से खौफ खाते थे. नेता, माफिया यहां तक कि भ्रष्ट अधिकारियों को भी CBI से डर लगता था. भ्रष्ट लोग तो हमेशा डर के ही जीते हैं लेकिन केन्द्र की सत्ता में पीएम मोदी के आने के बाद स्थिति थोड़ी बदल गई है. अब CBI से ज्यादा ED डराती है. फिल्मी स्टाइल में कहूं तो – ‘CBI से नहीं साब, ED से डर लगता है’.

यानी ED ‘दबंग’ हो गई है.

ED अपराधियों को भी डराती है, भ्रष्टाचारी नेताओं को भी डराती है और विपक्षी नेता तो हैं ही लिस्ट में.. आप जो हमें इस समय iChowk के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पढ़ रहे हैं, हो सकता है इस वक्त भी ED की मशीनें या टीम कहीं न कहीं नोटों की गड्डी गिन रही हो. हो सकता है कि ED बंगाल में ही नोट गिन रही हो. पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के घर से ईडी ने 21 करोड़ रुपये से ज्यादा जब्त किए थे. अर्पिता के दूसरे फ्लैट से ईडी को 29 करोड़ से ज्यादा कैश और पांच किलो सोना मिला.ये खजाना टॉयलेट में छुपाया गया था.

कोर्ट में तो ED ने कहा था कि पार्थ चटर्जी के शिक्षक भर्ती घोटाले मामले में 100 करोड़ से ज्यादा कैश मिल सकता है.. अच्छा हां! वो कानपुर का पीयूष जैन तो आपको याद ही होगा. 200 करोड़ से ज्यादा कैश ED ने जब्त किया था. मोदी सरकार जब से सत्ता में आई है उसके बाद तो कई लोगों को लगने लगा है कि ED नोट जब्त करने की एक केन्द्रीय एजेंसी है. पहले घंटों लोगों को बैठाकर पूछताछ करती है और फिर घंटों तक नोटों की गिनती करती है. लेकिन ऐसा नहीं है जनाब.

ईडी केन्द्रीय जांच एजेंसी ही है, जो आजकल विपक्षी नेताओं के लिए आफत बन चुकी है. यही हाल रहा तो मोदी विरोध में गठबंधन बनाने वाले विपक्षी दल, ED विरोध में एक दिन अपना गठबंधन बना लेंगे और फिर कहेंगे हम अब साथ हैं. राहुल गांधी से ED ने पूछताछ कर ली है, सोनिया से भी पूछताछ की.. इनसे अभी और भी मुलाकातें ED कर सकती है.. इससे पहले पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम भी ED की चपेट में आ चुके हैं.

संजय राउत, लालू यादव, शरद पवार.. कितने नेताओं के नाम लूं.. इसलिए मैंने पहले ही कहा था कि ED विपक्षी नेताओं के लिए आफत बन चुकी है.सभी नेताओं के बारे में बताएंगे कि ED किन नेताओं के साथ क्या कर रही है लेकिन सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्या होगा, कौन नेता बचेगा और किन नेताओं के खिलाफ ED फिर से जांच शुरु करेगी, ये जान लेते हैं..

प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट यानि PMLA की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर से कई नेता अब मुश्किल में आ सकते हैं. कई हाई प्रोफाइल मामलों में ED की जांच पिछले कुछ समय से एक तरह से ठंडे बस्ते में पड़ी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से अपने अधिकारों पर मुहर लगवाने के बाद ED इन नेताओं के खिलाफ जांच तेज कर सकती है. कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम, उनके सांसद बेटे कार्ति चिदंबरम, जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, उद्योगपति शिविंदर मोहन सिंह, आदि के खिलाफ चल रही जांच रफ्तार पकड़ सकती है.

इनके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, फारूक अब्दुल्ला, भूपिंदर सिंह हुड्डा, नवाब मलिक, अभिषेक बनर्जी, पार्थ चटर्जी समेत कई अन्य नेता भी जांच के दायरे में हैं. बताया जाता है कि बहुत से लोगों के खिलाफ जांच और मुकदमे की कार्रवाई इसलिए भी धीमी पड़ गई थी क्योंकि ED सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही थी, जहां 240 से ज्यादा याचिकाएं दाखिल करके PMLA के तहत गिरफ्तारी, जमानत, जब्ती जैसे अधिकारों को चुनौती दी गई थी.

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया और PMLA एक्ट के तहत ED के अधिकारों पर संवैधानिक मुहर लगा दी. अब ED के सामने रास्ता साफ है कि वो इन नेताओं के खिलाफ आगे की कार्रवाई शुरु कर सकेगी. कोर्ट ने साफ कहा है कि ED के निदेशक को तलाशी, जांच, समन, बयान दर्ज कराने, दस्तावेज लेने, हलफनामा मांगने, गवाहों के परीक्षण आदि मामलों के उसी तरह के अधिकार हैं, जैसे सिविल कोर्ट को होते हैं.

ED के जिस मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट को लेकर बवाल मचा हुआ है, उसमें सजा की दर जान आपको हैरानी होगी. ये वही बात हो गई कि – ‘छोटी गंगा बोलकर नाले में कुदा दिया.’ केंद्र सरकार ने लोकसभा में इस बारे में जानकारी देते हुए कहा था कि पिछले 17 साल में 5,400 से ज्यादा मनी लॉन्ड्रिंग के केस दर्ज किए गए लेकिन सजा महज 23 मामलों में ही हुई है. मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में सजा का प्रतिशत बेहद कम है. इससे ED की कार्रवाई पर सवाल भी उठता है कि इतनी बड़े स्तर पर इतने लोगों के खिलाफ कार्रवाई होती है उसके बाद भी सजा इतने कम मामलों में क्यों हुई है.

केन्द्र के मुताबिक, पिछले 10 साल के दौरान ईडी ने बड़े पैमाने पर PMLA और फॉरेन एक्सचेंज उल्लंघन के मामले दर्ज किए थे. इसके अलावा 2021-22 वित्त वर्ष के दौरान 1,180 मनी लॉन्ड्रिंग के मामले दर्ज किए गए जबकि 5,313 फॉरेन एक्सचेंज उल्लंघन के केस रजिस्टर किए गए. 31 मार्च 2022 तक ED ने कुल 30,716 केस में फेमा के तहत जांच की और 8,109 मामलों में नोटिस जारी किया. इस दौरान 6,472 नोटिस पर निर्णय लिया गया और कुल 8,130 करोड़ रुपये जुर्माने के तौर पर और 7,080 करोड़ रुपये की संपत्ति को जब्त किया गया.

2014 के बाद ED के काम करने का तरीका बदला है. इसको ऐसे समझ सकते हैं कि 2005 से 2014 के बीच ED ने तकरीबन हर साल औसतन 534 करोड़ रुपये जब्त किये वहीं मोदी सरकार में हर साल ED ने औसतन 11,929 करोड़ रुपये जब्त किये हैं. प्रॉपर्टी सीज करने के मामले 22 गुना बढ़े. मतलब ये कि ED ज्यादा सक्रिय है. चलिए आपको मनमोहन सरकार और मोदी सरकार के दौरान ED के कुछ आंकड़ों से रुबरु करवाता हूं.

मनमोहन सरकार के दौरान

ED की कुल छापेमारी - 112

कुल प्रॉपर्टी जब्त - 5346 करोड़

शिकायत पर एक्शन - 104

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2014 से अबतक मोदी सरकार के दौरान

ED की कुल छापेमारी - 2,974

कुल प्रॉपर्टी जब्त - 95,432 करोड़

शिकायत पर एक्शन - 839

पंजाब, झारखंड, बिहार, बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा.. अब मैं सारे राज्यों के नाम नहीं बताउंगा आपको, क्योंकि देश के सभी राज्यों में विपक्षी पार्टियां तो हैं ही और ED की नजर सभी राज्यों के विपक्षी नेताओं पर ही है. फिर भी कुछ नामों को तो आपको जानना ही चाहिए..

विपक्ष लगातार ये आरोप लगा रहा है कि केन्द्र ED के जरिए विपक्षी नेताओं को टारगेट कर रही है. विपक्षी नेताओं को डराने की कोशिश कर रही है. ऐसा लगता कि विपक्षी दलों के प्रमुख नेता केंद्रीय जांच एजेंसियों के रडार पर आ गए हैं. एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से ईडी पूछताछ कर रही है तो दूसरी तरफ रेल भर्ती घोटाला मामले में आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के ओएसडी रहे भोला यादव को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है.

शिवसेना नेता संजय राउत से फिर पूछताछ के लिए ईडी ने समन जारी किया तो बंगाल टीचर भर्ती घोटाला मामले में टीएमसी विधायक से पूछताछ की गई है. मतलब हर जगह केन्द्रीय एजेंसियां जांच में लगी हुई हैं. शरद पवार भी ED के निशाने पर हैं. 2500 करोड़ रुपये के महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक लोन धोखाधड़ी केस में ED ने एनसीपी चीफ शरद पवार को समन भेजा था.

ईडी के पास पंचकूला में एजेएल के भूमि सौदे में हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा, कांग्रेस नेता मोतीलाल वोरा भी जांच के घेरे में हैं. यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले ED के पास बसपा के खाते से जुड़े 104 करोड़ रुपये की जांच का मामला सामने आया था. ईडी ने मायावती के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.

मयावती के खिलाफ 1400 करोड़ रुपये के दलित स्मारक से जुड़े मामले को भी ED ही देख रही है. ईडी ने गैरकानूनी खनन मामले में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में केस दर्ज किया था एक तरफ सरकार जहां ED की कार्रवाई को भ्रष्टाचारियों की कार्रवाई बता रही है. वहीं विपक्ष के तमाम नेता ED को अपने तरीके से परिभाषित कर रहे हैं.

समन पाने वाले संजय राउत ने ED पर निशाना साधते हुए कहा था- 'अगर ईडी का कंट्रोल दो दिन के लिए हमें दे दिया जाए तो देवेंद्र फडणवीस भी हमारे लिए वोट करेंगे.’ विपक्ष ED को केन्द्र का दूसरा तोता बता रहा है तो अखिलेश यादव ने ED को 'एग्जा मिनेशन इन डेमॉक्रेसी' नाम दिया है. तमिलनाडु के सीएम स्टालिन भी ED से त्रस्त हैं.

ED से आम आदमी पार्टी भी नहीं बच पाई है तभी तो दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने ईडी की कार्रवाई को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए कहा- 'आपके पास एजेंसियों की ताकत है, लेकिन हमारे साथ भगवान है.' सत्येंद्र जैन को 30 मई को PMLA एक्टत के तहत अरेस्‍ट किया गया था. केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर रहे नेताओं की सूची काफी लंबी है. फारुख अब्दुल्ला से मनी लांड्रिंग मामले में पूछताछ के बाद उनके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई है.

नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी से लंबी पूछताछ हो चुकी है. विपक्ष सरकार पर ये भी आरोप लगाता है कि मोदी सरकार विपक्ष का मुंह बंद करवाने के लिए केन्द्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है. बंगाल में टीएमसी नेता पार्थ चटर्जी गिरफ्तार हो चुके हैं, उनकी सहयोगी के घरों से तो करोड़ों का कैश मिलता जा रहा है.

लेकिन टीएमसी ईडी की कार्रवाई को लेकर कहती है- दिलचस्प बात ये है कि बंगाल के सारदा और रोज वैली चिटफंड घोटाले में शामिल बीजेपी के नेताओं को अब तक एक बार भी पूछताछ के लिए नहीं बुलाया गया है. ये अपने आप में केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का सबूत है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी के सारे नेता महामानव ही हैं, उनपर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा है, उन पर भी दाग लगे हैं.

ऐसे नेताओं में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कर्नाटक के ही रेड्डी बंधु शामिल हैं. रेड्डी बंधुओं पर तो 16,000 करोड़ से ज्यादा के खनन घोटाले में शामिल होने का आरोप है. जब हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस में थे तब बीजेपी ने उन पर अमेरिकी कंपनी लुइस बर्गर को ठेके सौंपने के आरोप लगाए थे. बीजेपी में शामिल होते ही ये मामला गायब हो गया. चूकि हिमंता बीजेपी में आ गए तो ED ने ये भी मान लिया कि अब उनपर कोई दाग नहीं है.

बहुचर्चित व्यापम घोटाले की अब कोई चर्चा नहीं करता.. ED तो भूल ही गई होगी. क्योंकि सीबीआई तो मामा को यानी शिवराज सिंह चौहान को क्लीन चिट दे चुकी है. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और नारायण राणे जैसे कुछ और नाम होंगे जिनके दाग अब धुल चुके हैं. हकीकत ये है कि देश की सत्ता में कोई पार्टी रहे वो इन जांच एजेंसियों को तोता बना देती है. पहले सीबीआई को तोता कहा जाता था अब राजनीतिक पार्टियां ED को तोता कह रही है. किसी भी सरकार में जांच एजेंसियों का तोता बनना खतरनाक है.. हमारे लिए भी और हमारे लोकतंत्र के लिए भी. 

लेखक

निधिकान्त पाण्डेय निधिकान्त पाण्डेय @1nidhikant

लेखक आजतक डिजिटल में पत्रकार हैं.

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