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Updated: 25 मार्च, 2021 11:32 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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महाराष्ट्र पुलिस में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले राष्ट्रपति भवन तक शिकायत दर्ज करा आये हैं. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मिल कर बीजेपी की सहयोगी पार्टी आरपीआई के नेता ने महाराष्ट्र सरकार को बर्खास्त करने के लिए ज्ञापन सौंपा और बताया कि सरकार को हटाये बगैर जांच संभव नहीं है. रामदास आठवले से पहले पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ये मामला महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मिल कर पहले ही उठा चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट से लौटाये जाने के बाद मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह ने अब बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है. परमबीर सिंह ने अपने तबादले को चैलेंज करने के साथ ही, गृह मंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ जांच कराये जाने की मांग की है. पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर परमबीर सिंह ने महाराष्ट्र में पुलिस विभाग में ट्रांसफर पोस्टिंग में भ्रष्टाचार को लेकर सीबीआई जांच की गुजारिश की थी और उनके निशाने पर अनिल देशमुख ही रहे. सुप्रीम कोर्ट ने परमबीर सिंह को पहले हाई कोर्ट जाने की सलाह दी थी.

परमबीर सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने पुलिस सुधार (Police Reforms) को लेकर अपने निर्देशों के अनुपालन न होने को लेकर भी चिंता जतायी थी. सितंबर, 2006 में ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों की आनाकानी के मद्देनजर पुलिस सुधारों के लिए सात स्पष्ट निर्देश जारी किये थे, लेकिन उन पर आज तक कागजी खानापूर्ति से आगे कोई बात नहीं हुई है.

सुप्रीम कोर्ट ने निराशा जाहिर करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया था और कहा, "पुलिस सुधार का मुद्दा तभी उठता है, जब राजनैतिक हलचल में ज्यादा उथल-पुथल होती है."

पुलिस के राजनीतिकरण (Maharashtra Police-Politics) को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता ऐसे वक्त सामने आयी जब महाराष्ट्र के साथ साथ बिहार में भी खूब बवाल हुआ है - और विधानसभा में पुलिस बुलाकर विधायकों की पिटायी को लेकर विपक्ष आक्रामक हो गया है. मसला तो पुलिस का ही है, लेकिन महाराष्ट्र और बिहार के मामलों में काफी फर्क है.

देखा जाये तो पुलिस रिफॉर्म को लेकर सुप्रीम कोर्ट की निराशा एक तरीके से स्थिति की गंभीरता को ही बता रही है - सवाल ये है कि रामदास आठवले और देवेंद्र फडणवीस ने जो बात बढ़ाई है अगर वो और आगे बढ़े और राज्यपाल केंद्र को अपनी रिपोर्ट भेज दें और फिर उस पर राष्ट्रपति महाराष्ट्र की उद्धव सरकार को बर्खास्त कर दें तो क्या पुलिस सुधार लागू हो जाएगा?

क्या पुलिस की छवि ऐसे सुधर जाएगी?

परमबीर सिंह को हटाकर हेमंत नागराले को मुंबई पुलिस का कमिश्नर बनाया गया है - और जैसी की परंपरा है, कार्यभार संभालते ही नये पुलिस कमिश्नर ने बताया कि पुलिस की खोई विश्वसनीयता बहाल करने और छवि सुधारने की कोशिश को अपनी प्राथमिकता बताया.

मीडिया से बातचीत में हेमंत नागराले ने कहा, ‘हम जानते हैं कि मुंबई पुलिस मुश्किल दौर से गुजर रही है. समस्या का समाधान करने के लिए राज्य सरकार ने मुझे नियुक्त किया है.’

जो बवाल मचा है, उसमें तो ये समझ भी नहीं आ रहा है कि महाराष्ट्र सरकार का जो गृह विभाग पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में है और मंत्री अनिल देशमुख पर लगे आरोपों को सुप्रीम कोर्ट तक बेहद गंभीर मान रहा है - वैसे हालात में हेमंत नागराले कितना कुछ कर पाएंगे?

सुप्रीम कोर्ट से पहले अनिल देशमुख की पार्टी एनसीपी के नेता शरद पवार ने भी गृह मंत्री के खिलाफ लगे इल्जाम को काफी गंभीर बताया, लेकिन उनके बचाव में भी तर्क पेश किये और आरोपों पर भी सवाल उठाये.

महाराष्ट्र के गृह मंत्रालय से जुड़ी आईपीएस अफसर परमबीर सिंह की याचिका पर जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की बेंच में सुनवाई चल रही थी. मामले को लेकर बेंच का कहना रहा, 'ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि पुलिस सुधार पर दिये गये कोर्ट के फैसले को अभी तक लागू नहीं किया गया है - पुलिस सुधार का मुद्दा तभी उठता है जब राजनैतिक हलचल में ज्यादा उथल-पुथल होती है.'

सुप्रीम कोर्ट की पीठ दरअसल, प्रकाश सिंह की लंबी कानूनी लड़ाई की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश कर रही थी, जिस पर अमल भी किया गया तो बस आधा अधूरा ही.

prakash singh, param bir singhपरमबीर सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह की पुलिस सुधार को लेकर पहल की याद दिलायी और निर्देशों पर अमल न होने को लेकर निराशा जतायी

जस्टिस कौल की टिप्पणी काफी सख्त रही, 'किसी भी राज्य सरकार ने पुलिस सुधारों को लागू नहीं किया है - कोई भी निकाय ऐसा नहीं करना चाहता क्योंकि कोई भी निकाय सत्ता को हाथ से जाने नहीं देना चाहता.'

असल में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश उन मर्जों का ही एहतियाती इलाज है जो अभी महाराष्ट्र की पुलिस पॉलिटिक्स से निकल कर सामने आ रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस को राजनीतिक दखलंदाजी से दूर रखने के लिए राज्य सुरक्षा आयोग के गठन का भी निर्देश दिया था. एक रिपोर्ट के अनुसार करीब दो दर्जन राज्यों ने आयोग तो बना दिया, लेकिन लगभग आधे दर्जन राज्यों में विपक्ष के नेता को उसमें शामिल ही नहीं किया गया. ठीक वैसे ही के करीब डेढ़ दर्जन राज्यों ने आयोग में स्वतंत्र सदस्यों को रखने का इंतजाम तो कर दिया, लेकिन ऐसे सदस्यों के चयन के लिए स्वतंत्र चयन समिति बनाने की जहमत ही नहीं उठायी.

यूपी पुलिस के डीजीपी रहे आईपीएस अफसर प्रकाश सिंह ने पुलिस रिफॉर्म्स को लेकर लंबी लड़ाई लड़ी है और उसी बदौलत 22 सितंबर, 2006 को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधारों को मंजूरी दी. राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों के अनमने व्यवहार को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सात स्पष्ट निर्देश भी जारी किये थे.

प्रकाश सिंह के मुताबिक, राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी से बचने का रास्ता बनाते हुए कुछ कागजी सुधार जरूर पेश किया है, लेकिन जमीनी हकीकत से उसका कोई वास्ता नहीं है.

न्यूज एजेंसी पीटीआई ने एक इंटरव्यू में प्रकाश सिंह से ये समझने की कोशिश की कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अनुपालन क्यों नहीं हो पा रहा है, प्रकाश सिंह बोले, 'हर राज्य का राजनीतिक तबका और नौकरशाही इसका विरोध कर रहे हैं. उनको लगता है कि निर्देशों पर अमल हुआ तो पुलिस पर सरकार का नियंत्रण कमजोर हो जाएगा, वे नहीं चाहते कि उनका नियंत्रण कमजोर हो... वे चाहते हैं कि यही व्यवस्था बनी रहे जो अंग्रेज छोड़ गए हैं.'

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लेकर अवमानना की जवाबदेही के बारे में पूछ जाने पर प्रकाश सिंह कहते हैं, 'मैं चार बार उच्चतम न्यायालय में अवमानना याचिका दायर कर चुका हूं. मैं तो कहता हूं कि राजनीतिक नेतृत्व की जवाबदेही हो. एक बार राज्यों के गृह मंत्री के खिलाफ कार्रवाई हो जाये - देखिये जल्दी जल्दी काम शुरू हो जाएगा.'

तो क्या महाराष्ट्र में बिलकुल वैसी ही स्थिति पैदा हो गयी है कि अदालत दखल दे - और पुलिस सुधार लागू करने के मामले में देश की सभी राज्य सरकारें सुधर जायें?

बिहार में मामला अलग है, लेकिन राजनीति वही है

बिहार में भी मामला पुलिस से ही जुड़ा है और वहां भी महाराष्ट्र की ही तरह विपक्ष के निशाने पर सत्ता पक्ष है, लेकिन मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि पुलिस को और ज्यादा अधिकारों से लैस करने वाला एक संशोधन विधेयक है.

विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने विधेयक पास न हो पाये इसके लिए सड़क से सदन तक भारी विरोध प्रदर्शन का इंतजाम किया था. विधानसभा अध्यक्ष के इर्द गिर्द तो महिला विधायकों को मोर्चे में लगा दिया था - लेकिन पूरी कवायद अंत जैसे हुआ वो काफी गलत हुआ.

सबसे बड़ी बात तो ये है कि जो कुछ हुआ उसकी जिम्मेदारी लेने को कोई पक्ष तैयार नहीं है और विपक्ष के साथ साथ सत्ता पक्ष भी ठीकरा दूसरे के ही सिर पर फोड़ रहा है.

सोशल मीडिया वायरल हो रहे वीडियो में सदन के अंदर पुलिस और प्रशासन के लोग विधायकों को पीटते देखे जा सकते हैं. विधानसभा के भीतर हुई हिंसक झड़प में दो महिला विधायकों सहित दर्जन भर एमएलए घायल हुए हैं - साथ में कुछ पुलिसकर्मियों और मीडियाकर्मियों को भी चोटें आयी हैं.

ये पूरा बवाल बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधियेक, 2021 को लेकर हुआ है जिसके जरिये पुलिस को बगैर वारंट गिरफ्तारी से लेकर कोर्ट के हस्तक्षेप तक से प्रोटेक्शन दिये जाने का प्रावधान है. खास बात ये है कि विपक्ष के विरोध के बावजूद ये विधेयक पास हो गया है.

कानून बन जाने के बाद बिहार पुलिस के पास अधिकार होगा कि वो किसी भी व्यक्ति को बगैर वारंट कस्टडी में ले सकेगी. किसी के भी घर या किसी कैंपस की तलाशी के लिए कोर्ट से पुलिस को वारंट लेने की जरूरत नहीं होगी. संगीन अपराधों में पुलिस को दंड देने का भी अधिकार मिल रहा है - और सबसे बड़ी बात ये कि कोर्ट भी किसी मामले में तभी दखल देगा जब पुलिस खुद ऐसा करने को कोर्ट से कहेगी.

हालांकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि विधेयक को लेकर विपक्ष की तरफ से अफवाह फैलायी जा रही है. नीतीश कुमार का दावा है कि ये कानून ऐसा नहीं कि लोगों को तकलीफ देखा, बल्कि ये तो लोगों को सुरक्षा प्रदान करने वाला है.

विपक्ष इसे नीतीश सरकार के नये हथियार के तौर पर देख रहा है. विपक्ष को ऐसी आशंका है कि राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बिहार पुलिस का भी वैसे ही बेजा इस्तेमाल किया जा सकेगा जैसे केंद्रीय एजेंसियों को लेकर केंद्र की सरकार पर लगता रहा है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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