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Updated: 22 मई, 2021 06:09 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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कोरोना की दूसरी लहर ने शहरों के साथ देश के गांवों को भी बड़ी संख्या में निशाना बनाया है. बीते कुछ दिनों में कोरोना संक्रमण के मामले कम हुए हैं, लेकिन अभी भी रोजाना ढाई लाख से ज्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं. केंद्र सरकार की एक आंतरिक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के गांवों में कोरोना संक्रमण फैलने की एक बड़ी वजह किसान आंदोलन हो सकता है. किसान आंदोलन के दौरान कुछ किसानों की कोरोना के चलते हुई मौतों की खबरें भी सामने आई है. कोरोना संक्रमण को देखते हुए कई किसान संगठन इसे टालने के पक्ष में भी हैं, लेकिन भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत आंदोलन को रद्द करने के पक्ष में नही हैं. उलटा ये कह रहे हैं कि केंद्र सरकार लिखित में दे कि किसान आंदोलन रद्द होने से कोरोना खत्म हो जाएगा. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या किसान आंदोलन को कोरोना महामारी तक के लिए टाला नहीं जा सकता है?

दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर बीते करीब सात महीनों से किसान आंदोलन जारी है.दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर बीते करीब सात महीनों से किसान आंदोलन जारी है.

केंद्र सरकार कानून टाल चुकी है फिर भी रद्द करने पर अड़े

दिल्ली के अलग-अलग बॉर्डर पर बीते करीब सात महीनों से किसान आंदोलन जारी है. किसान नेता केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग लेकर यहां जमे हुए हैं. हालांकि, धरना स्थल पर दो किसानों की कोरोना से मौत होने के बाद भाकियू (किसान सरकार) ने यहां तक कह दिया कि जब किसान ही नहीं रहेगा, तो आंदोलन कौन करेगा? लेकिन, इसके बावजूद राकेश टिकैत सरीखे किसान नेता इसे ना टालने की जिद पकड़े हुए हैं. राकेश टिकैत तर्क दे रहे हैं कि क्या चुनावी रैलियों में कोरोना नहीं फैला था? संयुक्त किसान मोर्चा ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर किसानों से बातचीत शुरू करने की मांग की है. हजारों की संख्या में किसान धरना स्थल पर इकट्ठा हैं. किसान संगठनों का दावा है कि मई के बाद और राज्यों से भी किसान आएंगे. केंद्र सरकार पहले ही इन कृषि कानूनों को करीब डेढ़ साल के लिए टाल चुकी है. इसके बावजूद किसान संगठन किसानों के साथ ही गांवों में बसने वाली एक बड़ी आबादी को खतरे में डाल रहे हैं. क्या इन किसान संगठनों की किसानों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है?

सियासी जमीन तैयार करने के लिए दांव पर किसानों की जान

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में और उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में किसान संगठनों ने 'पंचायत' बनाकर तकरीबन पूरे देश का दौरा किया था. किसानों को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए ये 'पंचायत' गांव-गांव घूमी थी. किसान नेता राकेश टिकैत ने पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों का भी दौरा किया था. अगर ये कहा जाए कि किसान संगठनों की ये 'पंचायत' कोरोना की 'सुपर स्प्रेडर' बन गई है, तो गलत नहीं होगा. वैसे, इन सभी बड़े किसान नेताओं की एंटी कोविड वैक्सीन लगवाते हुए तस्वीरें लोगों के सामने हैं. लेकिन, किसानों की जान शायद इनके लिए बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती है. अपनी सियासी जमीन को पक्का करने के लिए ये किसान नेता किसानों को भड़काने में जुटे हुए हैं. ये नेता कितने कदर असंवेदनशील हो चुके हैं, उनके बयानों से ही साफ झलक जाता है. राकेश टिकैत ने आज तक को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि सरकार कोरोना त्रासदी पर काम नहीं कर रही है. आंदोलन में मरने वालों की चिंता सता रही है.

किसान आंदोलन में हिस्सा लेने वाले ज्यादातर किसान हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब के हैं.किसान आंदोलन में हिस्सा लेने वाले ज्यादातर किसान हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब के हैं.

पंजाब और हरियाणा के गांवों में बढ़े बेतहाशा मामले

ये किसान नेता मान रहे हैं कि गांवों में कोरोना फैल रहा है, लेकिन इसके लिए भी केंद्र सरकार की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराने से नहीं चूक रहे हैं. किसान आंदोलन में हिस्सा लेने वाले ज्यादातर किसान हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब के हैं. इन सभी राज्यों के गांवों में कोरोना संदिग्धों की संख्या अचनाक से बढ़ने लगी है. इसके बावजूद किसान नेता आंदोलन से संक्रमण के फैलने की बात को नकार रहे हैं. सिंघू बॉर्डर पर जिन दो किसानों की मौत कोरोना से हुई है, उन्होंने कितने लोगों को संक्रमित किया होगा, कोई इसका अंदाजा नहीं लगा सकता है. हो सकता है कि जब ये संक्रमित लोग वापस अपने गांव जाएं, तो वहां पर कोरोना संक्रमण के मामले और बढ़ जाएं. अगर किसान नेताओं को किसानों की इतनी ही फिक्र है, तो वे आंदोलन चलने तक किसानों से धरना स्थल पर ही रहने की बात क्यों नहीं कहते हैं. जब किसान संगठनों के लिए ये लड़ाई उनकी आने वाली नस्लों के लिए है, तो इसके लिए किसान इतना तो कर ही सकते हैं. बार-बार इतनी लंबी यात्रा के दौरान कोरोना संक्रमित होने की संभावना से शायद ही कोई इनकार करेगा.

किसान भी कम जिम्मेदार नहीं

धरना स्थल पर आने वाले अधिकतर किसान कोरोना जांच भी नहीं करा रहे हैं. इनका मानना है कि जांच कराने पर इन्हें पॉजिटिव की रिपोर्ट दे दी जाएगी और आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा. इस स्थिति में जितनी जिम्मेदारी किसान नेताओं की बनती है, उतनी ही वहां मौजूद पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की भी बनती है. आखिर वो किस बिनाह पर अपने साथ गांव के लोगों की जिंदगी को भी खतरे में डाल रहे हैं. बीते साल कोरोना महामारी फैलने पर शहरों में रहने वाले लोगों ने बड़ी संख्या में गांवों को अपना ठिकाना बनाया था. लेकिन, अब गांवों में भी हालात भयावह होते जा रहे हैं. ऐसा नहीं है कि किसान आंदोलन टाला नहीं जा सकता है. लेकिन, आंदोलन की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों ने इसे हवा दे रखी है. फिलहाल किसान नेताओं के बयान ही उनकी पोल खोल दे रहे हैं. अगर किसान आंदोलन कोरोना का सुपर स्प्रेडर बना है, तो किसान नेताओं की जिद के चलते ही बना है.

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