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Updated: 03 जुलाई, 2022 05:08 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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गलती मत छिपाइए. झूठ पर पर्दा आखिर क्यों डाला जाए? गलती छिपाने की कोशिश में अनगिनत गलतियों का अंदेशा है. एक झूठ छिपाने के लिए ना जाने कितने झूठ बोलने पड़ते हैं. इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है. राजस्थान में दावत-ए-इस्लाम के दो आतंकियों ने सरेआम देश के खिलाफ जंग का ऐलान किया. ISIS की तर्ज पर गला काटने का वीडियो भी डाला. लेकिन बर्बर आतंकी कार्रवाई पर पर्दा डालने के लिए जो कुछ व्यवस्थित और सांगठनिक रूप से हो रहा, उससे दुखद कोई दूसरी चीज हो ही नहीं सकती. दो आतंकियों ने एक कन्हैयालाल साहू की हत्या की. मगर देश के "जिम्मी" प्रवक्ता दीन की खिदमत में सैकड़ों गौस मोहम्मदों को "गाजी" बनने के लिए उकसा रहे हैं और युद्ध छेड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.

पता नहीं यह आतंकियों से प्यार की कौन सी वजह है जो एक से बढ़कर एक मानीखेज एंगल निकाले जा रहे हैं. प्रयास सिर्फ यही कि उदयपुर में जो कुछ हुआ उसमें ना तो इस्लाम की कट्टरवादी सोच का हाथ है, ना कांग्रेस और उसके सहयोगियों की तुष्टिकरण राजनीति का और राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार तो घटना के लिए किसी भी दृष्टि से जिम्मेदार है नहीं है. बल्कि सारे दर्द का इकलौता मर्ज भाजपा और उसके पीछे खड़ा संघ परिवार है. राजस्थान की घटना को लेकर सोशल मीडिया पर हो रहे तमाम डिबेट में से एक पर मेरी नजर गई. चूंकि, इधर कुछ दिनों में ऐसे कई कुतर्क देख चुका था तो ठहरना पड़ा.

भरोसे का संकट, गौस मोहम्मद जैसे दुश्मन घर के आसपास हों तो हर किसी का चौकन्ना रहना जरूरी

मुझे लगा कि इस पर भी बात होना जरूरी है. वह भी तब जब चौतरफा भरोसे का संकट और अफवाहों का बाजार चरम पर हो- ऐसी चीजों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. पता नहीं माचिस की किस एक तीली से समूचा आशियाना तबाह कर दिया जाए. मैं थोड़ी देर के लिए हैरान था कि भारतीय मुसलमानों में यह नई जाति "कन्वर्ट माइनारिटी" क्या है. अभी एक महीना पहले अरब के शेखों से रिश्ता जोड़ने वाला अचानक कन्वर्ट माइनारिटी के रूप में कैसे बदल गया? परेशान ना हों, क्योंकि यह अशराफ और पसमांदा की तरह दस्तावेजों में दर्ज जाति नहीं है. लेकिन जिस तरह से संदर्भों में "कन्वर्ट माइनारिटी" टर्म का इस्तेमाल हो रहा है- पता चलता है कि इसके पैदा होने की वजह भारत में सवर्णों का बेइंतहा जुल्म-ओ-सितम रहा.

असल में सोशल मीडिया पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल का नजरिया पढ़ रहा था. वे मेरे पसंदीदा लेखकों में से एक हैं. नुपुर शर्मा मामले में सुप्रीम कोर्ट को लेकर उनकी एक फेसबुक टिप्पणी पर बहुत सारे कमेंट थे. पक्ष-विपक्ष सभी तरह के. इसमें से एक टिप्पणी शाहिद हुसैन नाम के व्यक्ति की है. हालांकि मैं सही-सही दावा नहीं कर सकता कि वह हकीकत में कोई शाहिद हुसैन ही है या कोई ट्रोल. मगर मैं मान लेता हूं कि उनका खाता जेन्युइन ही होगा. तो शाहिद हुसैन साब ने लिखा- "लगता है सुप्रीम कोर्ट के जज लोग अब फैसले भारतीय संविधान से नहीं मनुस्मृति से दे रहे हैं. तभी तो एससी, एसटी, ओबीसी और कन्वर्ट माइनोरीटिज को जुर्म से भी ज्यादा सजा और ब्राह्मणवादी लोगों का जुर्म माफीनामे से ही निपट जा रहा है."

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कन्वर्ट माइनोरीटिज टर्म के तीन मकसद

देखा जाए तो शाहिद हुसैन एससी, एसटी, ओबीसी और कन्वर्ट माइनोरीटिज जिसमें बौद्ध-ईसाई शामिल हैं, उन्हें लेकर एक "महागठबंधन" बनाना चाहते हैं. हो सकता है कि यह महागठबंधन हिंदुओं की मौजूदा "महाएका" को काउंटर करने के लिए हो. शाहिद या उनकी तरह के तमाम लोग "कन्वर्ट माइनारिटीज" जैसे टर्म गढ़कर कुछ चीजों को अपने पाले में दुरुस्त करना चाहते हैं. बहुत चालाकी से.

पहली चीज यह कि भारत में जो कुछ भी खराब रहा रहा उसे हिंदुओं की डोमिनेंट जातियों के सिरे मढ़ दिया जाए. डोमिनेंट हिंदू और नॉन डोमिनेंट हिंदू के बीच जो खींचतान रही है इसमें उन्हें एक अवसर की तलाश हमेशा है.

दूसरा- हिंदुओं की नॉन डोमिनेंट जातियों को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि असल में मुसलमानों को कोई विदेशी कंट्रोल नहीं कर रहा. बल्कि पूजा पद्धति, पहनावे, खानपान, भाषा और संस्कृति को छोड़कर (बाकी कुछ बचता ही नहीं) ज्यादातर मुसलमान भी नॉन डोमिनेंट हिंदुओं की तरह ही हैं. और पूरी तरह से भारत को समर्पित मुसलमानों का मकसद डोमिनेंट हिंदुओं को कमजोर करना है. समर्पित मुसलमानों को शायद लग रहा हो कि यही मकसद हिंदुओं की नॉन डोमिनेंट जातियों का भी होगा.

टर्म से जो तीसरी बड़ी बात निकलती है वह यह कि नॉन डोमिनेंट हिंदुओं का जो समूह भाजपा और संघ के पीछे खड़ा हो रहा है- ऐतिहासिक गलती कर रहा है. उसे वहां नहीं जाना चाहिए. यह उनके जरिए सत्ता पर नियंत्रण का लॉलीपाप भर है. दुर्भाग्य यह है कि नरेंद्र मोदी से लेकर एकनाथ शिंदे तक भाजपा संघ की राजनीति में नॉन डोमिनेंट हिंदुओं का बोलबाला है और वे लगभग सभी राज्यों में सत्ता के शीर्ष पर भी नजर आ रहे हैं.

udaypur-650_070222072939.jpgउदयपुर की घटना से समूचा देश हैरान है.

कन्वर्ट माइनारिटीज में भला कैसे शामिल हों केरल के मासूम ईसाई?

कन्वर्ट माइनारिटीज, बहुत चालाक और राजनीतिक टर्म है. दुर्भाग्य से यह बौद्ध या ईसाई समुदाय को आकर्षित नहीं कर रहा. क्योंकि केरल, पूर्वोत्तर और लद्दाख में ईसाई और बौद्ध समुदाय को भी इस्लाम की कट्टरपंथी चुनौतियों का सामना करना पड़ा रहा है. लेकिन मुसलमान इस टर्म के जरिए जरूर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि ओबीसी-एससी और एसटी समुदाय जिस तरह से सवर्णवादी हिंदुओं के खिलाफ समानता के अधिकार के जूझता रहा है, उन्होंने "स्वेच्छा" से धर्म बदलकर सवर्णों को चोट पहुंचाने की कोशिश की है. इस तरह भारतीय मुसलमान खासकर पसमांदा- ओबीसी एससी और एसटी के ही भाई हैं उनसे अलग नहीं. सभी एक हो जाना चाहिए और लड़ना चाहिए. किससे? अब यह बताने की जरूरत नहीं है.

हो सकता है कि शाहिद कोई ट्रोल ही हों. लेकिन अगर वे महज ट्रोल हैं तो यह मामला शाहिद भर तक सीमित नहीं है. अगर सोशल मीडिया को लेकर चीजों पर आपकी नजरें हैं तो ना जाने कितने पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रोफ़ेसर, कवि, लेखक आदि-आदि सैकड़ों लोगों को इसी पिच पर तर्क गढ़ते सुना जा सकता है. सभी तर्कों की भाषा अलग-अलग भले नजर आती है, मगर उनके मकसद और स्थापनाएं एक जैसे हैं. वे "हेट क्राइम" और "टेरर एक्ट" को अलग मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं. मुसलमानों के खिलाफ हेट क्राइम को तो आतंकी वारदात बता देते हैं, लेकिन मुसलमानों के टेरर एक्ट (उदयपुर के संदर्भ में) को "सवर्ण हिंदुओं" की मनमानी की प्रतिक्रिया भर मानते हैं.

इस तरह की तीन कहानियां भी गुज़री होंगी आंखों के सामने से

फेसबुक पर कुमुद सिंह बड़ी पब्लिक फिगर हैं. उनके कुछ पोस्ट देखिए, वो दावा कर रही हैं कि महाराष्ट्र के ब्राह्मण असल में भारतीय नहीं, बल्कि यहूदी थे. यहूदियों ने धर्म परिवर्तन कर हिंदू ब्राह्मण का रूप ले लिया. वे यह भी साबित करने की कोशिश करती दिखती हैं कि यहूदी से चितापावन बने ब्राह्मण असल में मुसलमानों के खिलाफ ऐतिहासिक इर्ष्या की वजह से संघ और बीजेपी के जरिए बदला पूरा कर रहे हैं. कुमुद जी की विरासत कांग्रेस के रॉयल-राजनीतिक परिवार की है. उनका हर लिखा साबित करने के लिए पर्याप्त है कि कांग्रेस के मूल्यों में गहरी आस्था है. कुमुद जी को श्रेय जाएगा कि उनकी वजह से ब्राह्मणों का यहूदी कनेक्शन निकलकर सामने आ रहा है.

छत्तीसगढ़ के जंगलों में गांधीवादी कार्यकर्ता के रूप में मशहूर हिमांशु कुमार का भी एक पोस्ट है. हिमांशु पर कांग्रेस की केंद्र सरकार ने भी नक्सलियों से संबंध के आरोप में कार्रवाइयाँ की हैं. ऊपर जो "कन्वर्ट माइनारिटी" टर्म के मकसद को लेकर जानकारी दी गई है- हिमांशु भी लगभग उसी को स्थापित करने की कोशिश में हैं. वे बता रहे कि कैसे सवर्णों की वजह से जातिविहीन धर्म बदलने वाले दलित पिछड़े मुसलमानों को आतंक आदि के नाम पर परेशान किया जा रहा है. यहां क्लिक कर "हमारी एक परिचित महिला" से शुरू उनकी 2 जुलाई की पोस्ट को पढ़ सकते हैं.

कुछ प्रोफेसर तो सीबीएसई का रिजल्ट आने से पहले ही दिल्ली विश्वविद्यालय में आर्थिक तंगी की वजह से दाखिला ना हो पाने की फर्जी कहानी साझा कर रहे हैं. कहानी में कहा जा रहा कि कैसे गरीब पिछड़े किसान और मुसलमान के बच्चे भारी ट्यूशन और हॉस्टल फीस की वजह से बिना दाखिला कराए लौट गए. पिता बच्चे के लिए प्रोफ़ेसर के पैरों में गिरकर गिडगिडाता रहा. जबकि अभी दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले शुरू ही नहीं हुए. पिछले साल भी कोरोना की वजह से अकादमिक कार्य प्रभावित रहे और लगभग सभी हॉस्टल बंद थे.

देश में आग लगाने के लिए नाना प्रकार के कुतर्क गढ़े जा रहे, आखिर कौन हैं इनके पीछे?

कुल मिलाकर एक से बढ़कर एक उदाहरण दिए जा रहे हैं. ये चार किस्से बानगी भर हैं. डिफेंस, इकोनॉमी, फोरेन पॉलिसी, एनवायरमेंट- शायद ही कोई विषय बचा होगा जहां झूठ और अफवाह की मनमानी देखने को ना मिले. मनगढ़ंत कहानियां. सभी का मकसद अराजकता फैलाने के अलावा और कुछ नहीं दिखता. किसी को घंटा फर्क नहीं कि क्या असर हो रहा है? सिवाय इसके कि इस्लाम की कट्टरपंथी सोच को और पनपने का मौका ही मिल रहा. इन्हें लिखने वालों से परेशान नहीं होना चाहिए.

आखिरकार देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है. भारत का संविधान भले किसी नुपुर शर्मा को अधिकार ना देने के लिए मजबूर हो, मगर अन्य के लिए तो है ही. परेशानी केवल इतना है कि लिखे की वजह से "जहर बुझे" बैठे लोग और ज्यादा गुस्से से भर रहे. उदयपुर में कन्हैयालाल को मारने वाले आतंकियों को लेकर बेकाबू भीड़ की देह भाषा देख लीजिए. खींचकर मार देना चाहती है. महाराष्ट्र के अमरावती में लोगों का गुस्सा देखिए.

जो लोग लिख रहे हैं- वे दिलत या पिछड़े भी नहीं बल्कि ज्यादातर सवर्ण जातियों से हैं और ऐसे वैसे भी नहीं, खाए-अघाए सवर्ण हैं. उनकी विरासत देखिए. आतंकियों को बचाने की कोशिश में लगा कोई लिबरल हिंदू लिखता दिखेगा, जिसे सबूत के तौर पर नर्म और गर्म दोनों तरह का मुसलमान सोशल मीडिया पर वायरल करता नजर आएगा. इनके जरिए वह अपने तर्कों को साबित करता दिखेगा. मुसलमानों या सभी तरह के बुद्धिजन हेट क्राइम और टेरर एक्ट में अंतर भूल बैठे हैं. मुसलमान का तो फिर भी समझ में आता है. धार्मिक वजहें एक मजबूरी हो सकती हैं. लेकिन औरों की क्या मजबूरी है भला?

उदयपुर मामले में अखलाक और पहलू खान का जिक्र किया जा रहा है. रैगर के कृत्य से तुलना करते हुए मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद के बर्बर हमले की आलोचना तो करते हैं, लेकिन निंदा ढोंग नजर आती है. जैसे माफी मांगकर एहसान कर दिया हो.

टेरर एक्ट और हेट क्राइम में अंतर भूले बुद्धिजनों के सिर जाएगा कन्हैयालाल का दोष

भीड़ जिस तरह गुस्से में दिख रही है उससे कोई निर्दोष बिना मूछ वाली दाढ़ी-टोपी या चढ़े हुए पजामो भर की वजह से लिंचिंग का शिकार हो सकता है. पागलों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है. हालांकि लिखने वाले ही इन चीजों के जिम्मेदार होते हैं, मगर मैनूं क्या? उनकी दुकान चलती रहे बस. क्योंकि जब कोई निर्दोष मरता है- एक जेन्युइन मुद्दा मिल जाता है. बुद्धिजनों का लिखा ना जाने कितने गौस मोहम्मदों को प्रेरणा देता है और ना जाने कितने कन्हैयालाल की गर्दन चाकू की जद में पहुंचा देता है. उदयपुर पर तो किसी तरह मामला संभाल लिया गया, क्या इस तरह की दूसरी घटनाओं पर उपजी प्रतिक्रिया थामी जा सकती है?

स्थिति भयावह है. कुछ लोग किसी भी मुद्दे पर आग भड़काना चाहते हैं. ताकि गृहयुद्ध हो जाए. होशियार रहना होगा. आतंकियों से तो निपटा जा सकता है लेकिन अफवाहबाजों से निपटना असंभव है. उनसे उनकी ही भाषा में सवाल पूछा जाए. वे सालों से ऐसा ही करते आए हैं. नैरेटिव गढ़ते हैं और अपने ढंग से चीजों को चलाते हैं. देश की संप्रभुता के लिए उन्हें भी आतंकियों के साथ साथ रोकना पड़ेगा. किसी भी सूरत में.

लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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