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Updated: 27 जून, 2022 05:16 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या के बाद रिलीज किया गया उनका गाना एसवाईएल (SYL) यूट्यूब से हटा दिया गया है. पंजाब और हरियाणा के बीच दशकों से विवाद का मुद्दा रही एसवाईएल यानी सतलुज-यमुना लिंक नहर पर यह गाना बनाया गया था. सिद्धू मूसेवाला के इस गाने एसवाईएल के वीडियो में कई खालिस्तानी उग्रवादियों की तस्वीरें दिखाई गई थी. मूसेवाला का ये गाना खालिस्तानी विचारधारा को बढ़ावा देने वाला था. जिसके चलते केंद्र सरकार की ओर से आपत्ति जताने के बाद यूट्यूब पर इसे बैन कर दिया गया है. इस बीच बड़ी खबर ये है कि पंजाब के संगरूर लोकसभा उपचुनाव में शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के प्रत्याशी सिमरनजीत सिंह मान ने जीत हासिल कर ली है. सिमरनजीत सिंह मान एक अलग सिख देश यानी खालिस्तान की मांग करने वाले नेताओं में शामिल हैं. और, अब वह सांसद बन चुके हैं. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि केंद्र सरकार ने सिद्धू मूसेवाला का गाना यूट्यूब से हटवा दिया है. लेकिन, सांसद बने सिमरनजीत का क्या करेगी?

सिमरनजीत की 'जीत' से बढ़ेगी चिंता

इस साल हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों को हाशिये पर पहुंचा दिया था. इस जीत के बाद सीएम भगवंत मान के इस्तीफे से संगरूर लोकसभा सीट खाली हो गई थी. जिस पर शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के उम्मीदवार सिमरनजीत सिंह मान ने आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी गुरमैल सिंह को मात दे दी है. हालांकि, माना जा रहा था कि पंजाब विधानसभा चुनाव में सियासी दलों का सूपड़ा साफ करने वाली आम आदमी पार्टी यहां आसानी से जीत हासिल कर लेगी. लेकिन, संगरूर लोकसभा उपचुनाव से पहले भगवंत मान की पंजाब सरकार कानून-व्यवस्था को लेकर कठघरे में खड़ी थी.

Sidhu Moosewala s song syl removed from YouTube but what about Pro Khalistan Simranjit Singh Mann who became Sangrur Lok Sabha Seat MPसिद्धू मूसेवाला उसी खालिस्तानी विचारधारा से प्रेरित था. जिसे सिमरनजीत सिंह मान ने पंजाब में दशकों से पोषित किया है.

 

सिद्धू मूसेवाला की हत्या ने संगरूर लोकसभा उपचुनाव में आम आदमी पार्टी के लिए हालात मुश्किल कर दिए थे. इतना ही नहीं, पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही खालिस्तान समर्थकों की खुलेआम नारेबाजी और प्रदर्शन काफी तेजी से बढ़ा. हाल ही में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की जान लेने वाले दिलावर सिंह बब्बर की तस्वीर को भी दरबार साहिब के म्यूजियम में जगह दी गई है. वहीं, अब संगरूर लोकसभा उपचुनाव में सिमरनजीत सिंह मान की जीत से पंजाब में खालिस्तान की मांग वाले प्रदर्शनों और अन्य कार्रवाईयों में तेजी आने की संभावना है. क्योंकि, सिमरनजीत सिंह मान खुद भी उसी खालिस्तानी विचारधारा के समर्थक रहे हैं.

पंजाब में आम आदमी पार्टी पर पहले से ही खालिस्तान समर्थक होने का आरोप लग चुका है. दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल पर कुमार विश्वास ने पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले खालिस्तान समर्थकों से मिलने का आरोप लगाया था. और, हाल-फिलहाल में हुई घटनाओं पर भगवंत मान सरकार की हीला-हवाली ने इन आरोपों को और हवा दे दी है. पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए खालिस्तानी विचारधारा से निपटना एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है. क्योंकि, संगरूर लोकसभा उपचुनाव में एक बड़ी आबादी ने सिमरजीत सिंह मान को जिताकर इसका इशारा कर दिया है.

अतीत नहीं बना है खालिस्तान का विचार

1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान मारे गए जरनैल सिंह भिंडरावाले के खात्मे के साथ ही मान लिया गया था कि खालिस्तानी विचारधारा को नियंत्रित कर लिया गया है. लेकिन, इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से इसने एक बार फिर के बीच अपनी धमक महसूस करवा दी. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख विरोधी दंगों का दौर थमने के बाद माना जाने लगा कि खालिस्तानी विचारधारा कमजोर पड़ चुकी है. लेकिन, गाहे-बगाहे इसका छिट-पुट रूप लोगों के सामने आता रहता था. लेकिन, बीते साल हुए किसान आंदोलन के बाद खालिस्तानी विचारधारा में अचानक एक तेजी आई है.

पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पंजाब पुलिस के मुख्यालय पर हमला, हरियाणा में 4 खालिस्तानी आतंकियों की विस्फोटक ले जाते हुए गिरफ्तारी, धर्मशाला में हिमाचल प्रदेश विधानसभा परिसर के मुख्य गेट पर खालिस्तान के झंडे लगे मिलना जैसी घटनाएं इशारा हैं कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को और तेजी से बढ़ावा मिल सकता है. बीते दिनों अफगानिस्तान के गुरुद्वारे पर इस्लामिक आतंकी संगठन आईएस के हमला करने को भी इससे जोड़कर देखा जाना बहुत जरूरी है. क्योंकि, आईएस ने गुरुद्वारे पर हमला करने के बाद इसके पीछे नूपुर शर्मा की पैगंबर पर कथित टिप्पणी को वजह बताया था.

देखा जाए, तो इस हमले को सिखों में हिंदुओं के प्रति घृणा भरने के एक टूलकिट के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. ऐसी घटनाओं पर एक समय के बाद क्रिया की प्रतिक्रिया जैसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. तो, मिश्रित आबादी वाले सीमावर्ती राज्य पंजाब में आने वाले समय में हालात और बिगड़ जाएं. और, ऐसी स्थिति से निपटने के लिए केंद्र सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती सुरसा का मुंह खोले खड़ी है.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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