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Updated: 02 नवम्बर, 2019 03:43 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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महाराष्ट्र (Maharashtra Assembly Election 2019) की राजनीति में इस समय एक ऐसी हलचल मची हुई है, जिसका कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है. भाजपा-शिवसेना का गठबंधन (BJP-Shiv Sena alliance) चुनाव जीत चुका है, लेकिन शिवसेना (Shiv Sena) का मुख्यमंत्री बनाए जाने की जिद के चलते सरकार नहीं बन सकी है. वहीं दूसरी ओर है कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन (NCP-Congress alliance), जो हार गया है और यूं लग रहा है कि इस हार को स्वीकार करते हुए वह किसी मौके का फायदा उठाने की फिराक में भी नहीं है. बल्कि शरद पवार तो ये साफ-साफ कह चुके हैं कि जनता ने उन्हें विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया है, जिसका वह पालन करेंगे. लेकिन भाजपा-शिवसेना का गठबंधन जनादेश का पालन करता नहीं दिख रहा है. इसमें भी सारी दौड़-भाग शिवसेना करती हुई दिख रही है. पहले तो शिवसेना ये चाहती थी कि उनका सीएम शुरू के ढाई साल रहे, फिर ये ऑफर दिया कि शिवसेना का मुख्यमंत्री बाद में भी बन सकता है, लेकिन भाजपा को ये लिखित में देना होगा, जिसके लिए भाजपा तैयार नहीं है. उद्धव ठाकरे (Udhav Thackeray) अपने बेटे आदित्य ठाकरे (Aditya Thackeray) को सीएम की कुर्सी पर जरूर देखना चाह रहे हैं, लेकिन उन्हें ये भी ध्यान रखना होगा कि 8 नवंबर को मौजूदा सरकार का कार्यकाल खत्म होने वाला है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल जिस पर पूरे देश की निगाहें हैं वो ये है कि आखिर दोनों में से पहले कौन झुकेगा?

Shivsena, Udhav Thackeray, Aditya Thackerayशिवसेना और भाजपा दोनों ही जिद पर अड़े हैं, लेकिन बिना किसी के झुके सरकार नहीं बनेगी.

महाराष्ट्र की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट

महाराष्ट्र की राजनीति में 1990 का विधानसभा चुनाव टर्निंग प्वाइंट रहा. इसी के बाद भाजपा और शिवसेना का कद बढ़ा. साथ ही ये आखिरी चुनाव था जब एक सिंगल पार्टी ने सरकार बनाई थी. बता दें कि कांग्रेस ने शरद पवार के नेतृत्व में 141 सीटें जीती थीं, जिन्होंने 12 निर्दलीयों की मदद से सरकार बनाई थी. उसके बाद से या तो राज्य में भाजपा-शिवसेना ने सरकार बनाई है या फिर कांग्रेस-एनसीपी ने. 1995 से लेकर अब तक लगभग सभी चुनावों में तगड़ी बार्गेनिंग चली है. कभी सीएम की कुर्सी को लेकर तो कभी डिप्टी सीएम के पद के लिए.

2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 122 सीटें जीती थीं, यानी बहुमत से सिर्फ 22 सीटें कम. तब शिवसेना ने सरकार बनाने में भाजपा की मदद की और भाजपा ने जो दिया उसी में खुश हो गई. इस बार शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी. भाजपा के पास सब मिलाकर 115 विधायक हैं, जबकि शिवसेना के पास 63 विधायक हैं. पिछली बार के मुकाबले कांग्रेस को इस बार कम सीटें मिली हैं, लेकिन भाजपा के साथ भी ऐसा ही हुआ है. ऐसे में शिवसेना की कोशिश है कि भाजपा के साथ सरकार बनाने से पहले अपनी सारी शर्तें मनवा ली जाएं. अब शिवसेना चाहती है कि मुख्यमंत्री आधे-आधे समय के लिए बनें, लेकिन भाजपा को ये मंजूर नहीं है.

एनसीपी-कांग्रेस के साथ शिवसेना बनाएगी सरकार?

वैसे संजय राउत एनसीपी नेता शरद पवार से मिल चुके हैं और ट्वीट भी कर दिया है कि 'साहिब, मत पालिए अहंकार को इतना, वक्त के सागर में कई सिकंदर डूब गए.' इसने चर्चाओं को जोर दे दिया है कि शायद एनसीपी-कांग्रेस के गठबंधन के साथ मिलकर शिवसेना सरकार बना ले, लेकिन इसकी उम्मीद भी कम ही है. इसकी दो अहम वजहें हैं. एक तो ये कि शरद पवार सरकार बनाने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं दिख रहे. उन्होंने साफ कहा है कि जनादेश ये है कि वह विपक्ष में बैठें. वहीं दूसरी ओर, अगर शिवसेना कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन के साथ जाती है तो शिवसेना की छवि को नुकसान होगा. लोग भी शिवसेना से दूर हो सकते हैं क्योंकि कांग्रेस की छवि एंटी हिंदू वाली हो गई है, जबकि शिवसेना हिंदूवादी पार्टी है. ऐसे में घूम फिरकर भाजपा ही विकल्प दिख रहा है. अगर शिवसेना कांग्रेस-एनसीपी के गठबंधन के साथ सरकार बनाती भी है तो कांग्रेस और एससीपी के दिग्गज नेता बिना अनुभव वाले सीएम (आदित्य ठाकरे) को पीछे करते हुए अपनी राजनीतिक चमका सकते हैं. साथ ही, शिवसेना के माथे ये दाग भी लग सकता है कि उनके बेटे आदित्य में सरकार चलाने का हुनर नहीं है.

आदित्य नहीं हैं मुख्यमंत्री पद के लिए फिट !

उद्धव ठाकरे भले ही अपने 29 साल के बेटे आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहते हों, लेकिन ये भी सच है कि अभी उनमें सरकार चलाने की काबीलियत नहीं है. यहां तक कि खुद उद्धव ठाकरे भी सरकार चलाने में समर्थ नहीं लगते. हां, मौजूदा स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना के मजबूत दावेदार हो सकते हैं, लेकिन ठाकरे कभी परिवार से बाहर के किसी शख्स का कद बढ़ने नहीं देंगे.

तो कौन झुकेगा? भाजपा या शिवसेना?

भाजपा तो झुकती दिख नहीं रही, क्योंकि वह काफी मजबूत स्थिति में है. शिवसेना भी मुख्यमंत्री पद से नीचे बात करने को तैयार नहीं है. ऐसे में सबसे बड़ी संभावना यही है कि शिवसेना डिप्टी सीएम पद से संतुष्ट हो और फडणवीस मुख्यमंत्री बनें. क्योंकि अगर शिवसेना नहीं मानती है तो 8 नवंबर के बाद राज्य में कोई सरकार नहीं रहेगी और राष्ट्रपति शासन लग जाएगा. राष्ट्रपति शासन यानी सारी ताकत केंद्र के हाथ चली जाएगी और शिवसेना फिर से हाथ मलती रह जाएगी. वैसे भी, 29 साल के बेटे पर सरकार नहीं चला पाने का दाग लगने से तो अच्छा यही होगा कि वह डिप्टी सीएम बनकर मुख्यमंत्री बनने के गुर सीखें और भविष्य में मजबूती के साथ अपनी दावेदारी पेश करें.

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