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Updated: 10 जनवरी, 2019 04:35 PM
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अयोध्या केस में नयी तारीख मिलने की संभावना तो थी, लेकिन किसी ने ये नहीं सोचा था कि सुनवाई के लिए फिर से नयी बेंच के गठन की भी जरूरत पड़ेगी. अयोध्या केस में सुनवाई शुरू होते ही नया मोड़ उस वक्त आ गया जब जस्टिस यूयू ललित ने पांच जजों की बेंच से खुद को अलग कर लिया.

अब सुनवाई की नयी तारीख 29 जनवरी मुकर्रर हुई है - और तब तक एक नयी बेंच भी बनानी होगी जिसमें चीफ जस्टिस किसी नये जज को शामिल करेंगे.

मुश्किल ये है कि राम मंदिर निर्माण के समर्थक सुनवाई नहीं बल्कि फैसले की तारीख सुनना चाहते हैं - सुप्रीम कोर्ट के बाहर राम मंदिर समर्थकों के प्रदर्शन की भी यही वजह है.

राम मंदिर के समर्थन में विरोध प्रदर्शन

जैसे ही अदालत की कार्यवाही शुरू हुई, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने साफ कर दिया कि अभी केस की सुनवाई नहीं, बल्कि कोर्ट में केस की सुनवाई के लिए समयसीमा तय की जाएगी. मगर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि फिर से नयी बेंच बनाने की जरूरत आ पड़ी.

वैसे तो अदालतों के बाहर मामलों की सुनवाई या फिर फैसले की घड़ी में संबंधित पक्षों को हर अपडेट का इंतजार रहता है. अयोध्या केस में ये इंतजार थोड़ा अलग लग रहा है. ऐसा लगता है जैसे सुप्रीम कोर्ट के बाहर इंतजार कर रहे लोग नयी तारीख नहीं बल्कि फैसले की तारीख सुनने के लिए बेचैन हैं.

ऐसे ही विरोध प्रदर्शन की एक झलक सुप्रीम कोर्ट के बाहर भी उस वक्त देखी गयी जब सुनवाई की नयी तारीख की खबर आयी - 29 जनवरी, 2019. राम मंदिर निर्माण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया - और उन्हें थाने ले गयी.

protest at supreme courtसुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन करते लोग

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की RSS प्रमुख मोहन भागवत की मांग के बाद वीएचपी, बजरंग दल, शिवसेना और बीजेपी के कई नेता इसे लगातार दोहराते रहे हैं. इसी सिलसिले में इंटरव्यू में पूछे गये सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना था, "हमने भाजपा के घोषणा-पत्र में भी कहा है कि इस मुद्दे का हल संविधान के दायरे में रहकर ही निकल सकता है... अदालती प्रक्रिया खत्म होने दीजिए... जब अदालती प्रक्रिया खत्म हो जाएगी, उसके बाद सरकार के तौर पर हमारी जो भी जवाबदारी होगी, हम उस दिशा में सारी कोशिशें करेंगे."

प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद कानून या अध्यादेश की मांग तो थोड़ी थमी नजर आ रही है, लेकिन उन संगठनों और साधु संतो की ओर से सुप्रीम कोर्ट से लगातार सुनवाई की डिमांड होने लगी है - ताकि फैसला जल्द से जल्द आ सके. साधु संतों की बड़ी जमात और वीएचपी जैसे संगठनों के नेता तो देश भर में मंदिर निर्माण में हो रही देर के खिलाफ प्रदर्शन करने की बात कर रहे हैं.

जस्टिस यूयू ललित ने खुद को अलग क्यों किया

अभी फैसले की कौन कहे, सुप्रीम कोर्ट में तो अभी अयोध्या केस में राम लला जन्म भूमि को लेकर सुनवाई ही नहीं शुरू हो पायी है. और सुनवाई भी तो तब शुरू होगी जब सुनवाई के लिए बेंच का गठन होगा. सुनवाई के लिए नयी पीठ की नौबत इसलिए आ गयी क्योंकि मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कुछ चीजों पर आपत्ति दर्ज करा दी.

मुस्लिम पक्ष के सीनियर वकील राजीव धवन ने सवाल तो संविधान पीठ को लेकर भी उठाया था, लेकिन असर दूसरे सवाल ज्यादा हुआ. राजीव धवन का कहना रहा कि केस पहले तीन जजों की पीठ के पास था, फिर अचानक पांच जजों की पीठ बना दी गयी, लेकिन कोई न्यायिक आदेश नहीं जारी किया गया. इसके साथ ही राजीव धवन ने बेंच में शुमार जस्टिस यूयू ललित को लेकर भी सवाल खड़े किये.

बेंच को लेकर तो सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि संविधान पीठ का गठन चीफ जस्टिस के अधिकार क्षेत्र की बात है, लेकिन दूसरे सवाल को कोर्ट ने गंभीरता से लिया.

justice uu lalitजस्टिस यूयू ललित ने अयोध्या केस की सुनवाई करने वाली बेंच से खुद को अलग कर लिया है

राजीव धवन ने ध्यान दिलाया कि अयोध्या केस से जुड़े एक मामले में 90 के दशक में जस्टिस यूयू ललित बतौर वकील यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की तरफ से पेश हो चुके हैं. वैसे राजीव धवन ने ये कहने के लिए खेद भी जताया. इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि वो खेद क्यों जता रहे हैं - 'आपने सिर्फ तथ्य को सामने रखा है.' यूपी सरकार के वकील हरीश साल्वे का इस बारे में कहना रहा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जिस मामले में जस्टिस ललित वकील के तौर पर पेश हुए थे वो बिलकुल अलग था. खुद राजीव धवन ने भी सफाई दी कि वो भी ये मांग नहीं कर रहे हैं कि जस्टिस यूयू ललित बेंच से अलग हो जायें, वो तो सिर्फ जानकारी के लिए बता रहे थे.

राजीव धवन की आपत्ति के बाद संवैधानिक पीठ के पांचों जज - जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस एनवी रमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने आपस में विचार विमर्श किया. फिर जस्टिस ललित ने खुद ही केस की सुनवाई से हटने की इच्छा जताई. बाद में, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने बताया कि चूंकि जस्टिस यू यू ललित इस मामले को नहीं सुनना चाहते इसलिए सुनवाई स्थगित करनी होगी. आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट ने केस की सुनवाई 29 जनवरी तक के लिए टाल दी.

अनुवाद में अटका अयोध्या केस

अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने बताया कि केस में कुल 88 लोगों की गवाही होगी. कोर्ट में केस से संबंधित 257 दस्तावेज रखे जाएंगे. ये दस्तावेज 13,860 पेज के हैं. जस्टिस गोगोई ने बताया कि कुछ दस्तावेज हिंदी, गुरमुखी, अरबी और उर्दू में हैं, लेकिन फिलहाल ये निश्चित नहीं है कि सभी का अनुवाद हो चुका है या नहीं. पीठ को बताया गया है कि मूल रिकॉर्ड के 15 बंडल हैं.

कोर्ट के रजिस्ट्री को इन रिकॉर्ड का निरीक्षण और आकलन करने को कहा गया है, ताकि मालूम हो सके कि अगर अनुवाद के कुछ काम बाकी हैं क्या - और अगर ऐसा है तो उसमें कितना वक्त और लगेगा.

असल में, हिंदू महासभा के वकील चाहते हैं कि जो अनुवाद हुआ है उसकी जांच हो. वकीलों ने कोर्ट से कहा कि जिन पार्टियों ने इन दस्तावेजों का अनुवाद किया है उनकी पुष्टि होनी जरूरी है.

इस तरह अब दस्तावेजों के अनुवाद की पुष्टि नये सिरे की जाएगी. तब कहीं जाकर ये रिकॉर्ड 29 जनवरी को सुनवाई के समय पेश किये जा सकेंगे.

अयोध्या केस में अभी सुनवाई की कोई समयसीमा भी तय नहीं हो पायी है. हो सकता है अगली तारीख पर भी सुनवाई की शुरुआत इसी जगह से हो.

धर्म और राजनीति का जो डेडली कॉम्बो 1992 में देखने को मिला था, कुछ कुछ वैसा ही माहौल एक बार फिर नजर आने लगा है. तब तो मामला राम मंदिर समर्थकों और स्थानीय प्रशासन या राज्य और केंद्र की सरकार के इर्द गिर्द घूमता रहा. अब तो सीधे सीधे न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा किया जाने लगा है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे बड़ा विरोध तो अमित शाह के बयान से ही हुआ जिसमें अमित शाह का कहना रहा कि अदालत को ऐसा फैसला सुनाना चाहिये जिसका पालन हो सके. जब नेतृत्व की हुंकार इतनी जोरदार होगी तो, जाहिर है बाकी नेताओं का जोश तो बात बात पर ओवरफ्लो करेगा ही. बीजेपी नेता तेजिंदर सिंह बग्गा तो सरेआम सुप्रीम कोर्ट को धमका रहे हैं - बाकी बातें इसी पैरामीटर में समझी जा सकती हैं.

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