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Updated: 11 अगस्त, 2019 07:17 PM
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राज ठाकरे भी राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल जैसा ही स्टेटस मेंटेन करने की कोशिश करते हैं - मतलब, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नीचे निशाना नहीं साधते. मौका खोज कर प्रधानमंत्री मोदी पर यथाशक्ति जोरदार हमला बोलते हैं. बीच बीच में जब मौका नहीं मिलता तो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नाम से ही काम चलाते हैं.

धारा 370 ऐसा मुद्दा है जिसने तमाम नेताओं को बोलने का मौका दिया है, जाहिर है राज ठाकरे को भी मिलना चाहिये. ऊपर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी थोड़ा मसाला दे दिया है. असल में महाराष्ट्र भी उन राज्यों में शुमार है जहां कुछ ही महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं. राज ठाकरे भी अचानक एक्टिव हो जाने की ये एक बड़ी वजह है.

राज ठाकरे ने इस बार उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की बात कर प्रधानमंत्री मोदी पर हमला बोला है - सवाल ये है कि क्या राज ठाकरे को कभी यूपी और बिहार के लोगों से माफी मिल सकती है? मुश्किल है. बल्कि, बेहद मुश्किल है.

अगर ऐसा न हुआ तो क्या कांग्रेस भी गठबंधन के हाथ राज ठाकरे की ओर बढ़ा पाएगी? ऐसा लगता है राज ठाकरे के साथ भी राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल की तरह पेश आ सकते हैं.

रोजगार के नाम पर यूपी-बिहार वालों को लुभाने की कोशिश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अगस्त, 2019 को राष्ट्र के नाम संदेश में कहा था कि जल्द ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में केंद्र और राज्य सरकार में खाली पड़े पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी. ऐसा होने पर कश्मीरी नौजवानों को रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे और इसके लिए PSU के साथ साथ निजी क्षेत्र को भी रोजगार मुहैया कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.

प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान में राज ठाकरे को राजनीतिक फायदा दिखना स्वाभाविक है. लिहाजा राज ठाकरे पूछ रहे हैं कि आखिर यूपी और बिहार के लोगों को नौकरी क्यों नहीं मिल रही है. रोजगार के अवसर क्यों नहीं उपलब्ध हो रहे हैं. दलील है - यूपी, बिहार में तो धारा 370 जैसी कोई बात है भी नहीं.

राज ठाकरे सीधे सीधे तो रोजगार का मुद्दा उठाकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, साथ ही कोशिश है कि यूपी बिहार के लोगों की सहानुभूति भी बटोर ली जाये.

राज ठाकरे अब वो पॉलिटिकल लाइन पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें बीजेपी विरोधी गठबंधन खड़ा होता है. यूपी और बिहार के लोगों के मामले में राज ठाकरे का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है. एक दौर रहा जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता राज ठाकरे के आदेश पर यूपी बिहार के लोगों को मुंबई छोड़ने के लिए मजबूर किया करते रहे. मराठी मानुष के नाम पर एमएनएस कार्यकर्ता बाहरी लोगों पर तब वैसे ही टूट पड़ते थे जैसे इन दिनों देश भर से लिंचिंग की घटनाओं की खबरें आती हैं.

raj thackeray met sonia gandhi in delhiकांग्रेस से समझौते में राज ठाकरे की सबसे बड़ी चुनौती उनकी यूपी-बिहार विरोधी छवि है.

सवाल ये है कि क्या राज ठाकरे के समर्थकों के उत्पात के लंबे अरसे तक पीड़ित रहे यूपी-बिहार के लोग उनके झांसे में आ सकते हैं? ऐसा भी तो नहीं कि राज ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने जा रहे हों - और प्रधानमंत्री मोदी की तरह 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास' के जरिये समग्र समुदायों को साथ लेकर चलने की बात कर रहे हों. चुनावों में तो प्रधानमंत्री मोदी भी बीजेपी समर्थकों को श्मशान और कब्रिस्तान का फर्क समझा कर विरोधियों की खाट खड़ी कर देते हैं, लेकिन बतौर प्रधानमंत्री वो सबकी बात करते हैं. ये बात अलग है कि मॉब-लिंचिंज जैसी घटनाओं के बाद अक्सर चुप्पी भी साध लेते हैं. कभी ये भी नहीं कहते कि 'हजार जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी...'

राज ठाकरे ने अब तक ऐसा भी कोई संकेत नहीं दिया है जैसा अरविंद केजरीवाल चुनावों में किया करते हैं. मौके की नजाकत को समझते हुए वो माफी मांग लेते हैं. 2015 के चुनाव में केजरीवाल का ये प्रयोग बेहद सफल रहा. मानहानि के अदालती मामलों से भी छुटकारा पाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने भी माफी मांगने का ही रास्ता चुना और कामयाब रहे.

राज ठाकरे की तरफ से ऐसी कोई बात सामने नहीं आयी है. फर्ज कीजिए राज ठाकरे भी राजनीतिक हितों का ख्याल रखते हुए लोगों से माफी मांगते हैं तो क्या यूपी और बिहार के लोग माफ कर देंगे?

राज ठाकरे आज यूपी और बिहार के लोगों के रोजगार का मुद्दा उठा रहे हैं, लेकिन एमएनएस कार्यकर्ता तो उनकी रोजी रोटी छुड़ाने पर ही आमादा रहे हैं. अब ऐसी घटनाओं में कमी की वजह राज ठाकरे का घटता सपोर्ट है. राज ठाकरे राजनीति के हर हथकंडे अपना कर थक चुके हैं - लेकिन दिन पर दिन उनकी राजनीतिक सिकुड़ती ही जा रही है.

अगर राज ठाकरे फिर भी यूपी और बिहार के लोगों का मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाते हैं तो उनके लिए आगे का रास्ता बंद लगता है - न माया मिलने वाली, न राम.

क्या कांग्रेस राज ठाकरे की ओर हाथ बढ़ाएगी?

2019 के आम चुनाव के दौरान राहुल गांधी को लेकर राज ठाकरे के स्वर बदल गये थे. वो मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को PM मैटीरियल मानने लगे थे. कहने लगे थे - राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनना चाहिये. अफसोस की बात यही रही कि न तो राज ठाकरे के 'मुंह में कभी घी-शक्कर' रहा और न ही उनकी जबान पर कभी सरस्वती ही बैठ पायीं.

थोड़ा पीछे लौटें तो राज ठाकरे ने राहुल गांधी पर पुराने अंदाज में ही तंज कसा था. जब राहुल गांधी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की शानदार जीत दिला दी तो राज ठाकरे की टिप्पणी रही - 'पप्पू' अब परम पूज्य को गया है.

जुलाई, 2019 में ही राज ठाकरे दिल्ली आकर सोनिया गांधी से मिल चुके हैं. बताया तो ये गया कि दोनों नेताओं के बीच बातचीत का मुद्दा EVM रहा, लेकिन ये पूरा सच नहीं लगता. 40 मिनट की मुलाकात में राज ठाकरे भला कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात कैसे भूल सकते हैं?

देखा जाये तो राज ठाकरे भी राजनीति के उसी मोड़ पर खड़े हैं जिसकी दूसरी छोर पर राहुल गांधी. दोनों की राजनीति करीब डेढ़ दशक पुरानी है लेकिन अब तक हासिल शून्य ही रहा है.

राहुल गांधी और राज ठाकरे की परवरिश एक जैसी ही हुई है. राहुल गांधी नेहरू-गांधी परिवार में राजनीतिक को करीब से देखे हैं तो राज ठाकरे, महाराष्ट्र के ठाकरे परिवार में. राहुल गांधी की राजनीतिक में ऑफिशियल एंट्री 2004 में हुई, जबकि राज ठाकरे राजनीतिक विरासत न मिलने की स्थिति में 2006 में शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाये - और अपने बूते अपना मुकाम हासिल करने में जुट गये. मुश्किल ये रही कि राज ठाकरे अब तक लोगों को ये नहीं समझा पाये कि वो शिवसेना से अलग कैसे हैं. शिवसेना की राजनीति के समथर्क उनसे वैसे ही दूरी बना लेते हैं. अगर वो किसी तरह अपने ऊपर कोई उदार छवि ओढ़ कर बीजेपी-शिवसेना गठबंधन के पक्ष में खड़े होते हैं तो भी फेल हो जाते हैं - क्योंकि लोग कंफ्यूज हो जाते हैं. कुछ कुछ वैसे ही जैसे बीजेपी से अलग होकर बाबूलाल मरांडी झारखंड में एक बार भी राजनीतिक तौर पर खड़ा नहीं हो पाये.

2019 के आम चुनाव में भी राज ठाकरे ने कोई कम मेहनत नहीं की थी. चुनाव मैदान में सीधे सीधे नहीं उतरने के बावजूद राज ठाकरे ने महाराष्ट्र भर में बीजेपी और शिवसेना के खिलाफ 10 रैलियां की. दिलचस्प बात ये हुई कि जिन 10 इलाकों में राज ठाकरे की रैली हुई थी उनमें से 8 पर बीजेपी-शिवसेना ने शानदार जीत हासिल की.

मीडिया रिपोर्ट से मालूम होता है कि राज ठाकरे आने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर यूपीए का हिस्सा बनना चाहते हैं. इस सिलसिले में वो एनसीपी नेताओं की भी मदद ले रहे हैं. ये कोशिश काफी हद तक वैसी ही लगती है जैसे अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए हर संभव कोशिश किये, लेकिन आखिर तक बात नहीं बन सकी.

तब कांग्रेस नेता के कड़े विरोध के चलते दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ समझौता नहीं हो पाया था. शीला दीक्षित की दलील ये रही कि कांग्रेस को आप सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का नुकसान उठाना पड़ेगा. ऐसा लगता है, राज ठाकरे की यूपी-बिहार के लोगों की नजर में खराब छवि आड़े आएगी. फिर तो समझौते कि गुंजाइश कम ही बचती है.

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