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Updated: 20 जून, 2021 09:25 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी का सपोर्ट करने वाले गैर कांग्रेसी नेताओं में एमके स्टालिन सबसे आगे नजर आते हैं. 2019 के आम चुनाव से पहले आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी ऐसी ही बातें करते रहे, लेकिन चुनाव के करीब आते आते उनके भी स्वर बदल गये थे - प्रधानमंत्री पद पर फैसला चुनाव नतीजे आने के बाद होगा, लेकिन देश की जनता ने वो नौबत आने ही नहीं दी.

डीएमके नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के दिल्ली दौरे के बीच ही 19 जून को राहुल गांधी का जन्म दिन भी पड़ा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के साथ मुलाकात और तमाम सरकारी व्यस्तताओं में से समय निकालते हुए स्टालिन ने राहुल गांधी से मिल कर हैपी बर्थ डे बोला - ट्विटर पर तस्वीर शेयर करते हुए राहुल गांधी को अपना प्रिय भाई बताया है. वैसे भी राहुल गांधी को तमिलनाडु चुनाव को लेकर सबसे ज्यादा तत्पर देखा गया था. बदले में थोड़ी बहुत सीटें भी वहीं मिली क्योंकि असम और केरल में तो कांग्रेस की दाल गली नहीं - और ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के पक्ष में राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल से दूरी ही बनाये रखी.

कांग्रेस के साथ मिल कर महाराष्ट्र में सरकार बनाने से पहले भी शिवसेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ताना मारने के लिए राहुल गांधी के कंधे का ही इस्तेमाल किया करती थी. शिवसेना सांसद संजय निरुपम तो पहले भी राहुल गांधी को विपक्ष की तरफ से विकल्प के तौर पर देखते रहे. एक इंटरव्यू में ये पूछे जाने पर कि 'क्या राहुल गांधी विपक्ष की तरफ से प्रधानमंत्री बन सकते हैं?' संजय राउत का जवाब था, 'क्यों नहीं लगता है? 2014 वाले राहुल गांधी 2019 में नहीं हैं... अब राहुल गांधी देश के नेता बन चुके हैं.'

लेकिन देश की कौन कहे, आम चुनाव के नतीजे आने के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व भी छोड़ दिया. तब राहुल गांधी का जोर इस बात पर रहा कि गांधी परिवार से इतर किसी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाये. बाद में बेटे की जिद के चलते चीजें हाथ से फिसल न जाये, ये सोच कर सोनिया गांधी ने स्थिति को संभालने की कोशिश की - और एक प्रक्रिया के तहत सोनिया गांधी को कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष मान लिया गया. कांग्रेस में स्थायी अध्यक्ष की मांग को लेकर उभरे बागी गुट G23 की स्थायी कांग्रेस अध्यक्ष की डिमांड के बावजूद सोनिया गांधी मोर्चा संभाले हुए हैं - क्योंकि राहुल गांधी वैसी कोई उपलब्धि हासिल ही नहीं कर पा रहे हैं कि जश्न के बीच फिर से ताजपोशी के हीरो बन पायें.

2017 में गुजरात चुनाव के मतदान और नतीजे आने के बीच ही राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाली थी - और एक बार फिर वो तारीख नजदीक नजर आ रही है जब फिर से गुजरात में विधानसभा के चुनाव होंगे - 2022 के आखिर में.

राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस से बाहर जिस किसी ने भी खुशी का इजहार किया था, उनमें एक नाम ऐसा भी था जिसकी तरफ बरबस ही सबका ध्यान चला गया - सुधींद्र कुलकर्णी. सुधींद्र कुलकर्णी की सबसे बड़ी पहचान बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी के सहयोगी के तौर पर रही है, लेकिन 2014 के बाद से जब बीजेपी में मौजूदा नेतृत्व काबिज हुआ, वो भी मोदी-शाह विरोधी आवाजों के साथ हो लिये - और अब तो वो राहुल गांधी को ही सबसे बड़ी उम्मीद के रूप में देख रहे हैं!

ऐसे में जबकि कांग्रेस के भीतर ही राहुल गांधी से उम्मीद रखने वालों में कुछ करीबी और गांधी परिवार के प्रति निष्ठावान नेता ही नजर आते हैं, सुधींद्र कुलकर्णी के ट्वीट ने ये सवाल खड़ा कर दिया है कि उम्मीदों की उम्र आखिर कितनी लंबी होती है - और सुधींद्र कुलकर्णी जैसे कितने नेता हैं जो राहुल गांधी की नाकामियों की लंबी होती फेहरिस्त के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी है?

उम्मीद कब तक कायम रहेगी भला?

16 दिसंबर, 2017 को दिल्ली में राहुल गांधी की ताजपोशी हुई और सुधींद्र कुलकर्णी ने खुशी का इजहार करते हुए ट्विटर पर लिखा - 'एक नये नेता का उदय हुआ है. ऐसा नेता जिसकी देश को जरूरत है... आज मैं ज्यादा आश्वस्त हूं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे - और उनको बनना भी चाहिये.'

2019 के आम चुनाव से पहले सुधींद्र कुलकर्णी की ही तरह प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी नेता अमित शाह के बढ़े प्रभाव से नाराज नेताओं की एक टुकड़ी विपक्ष को एकजुट करने में जी जान से जुटी रही - अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा जैसे नेताओं ने तो विपक्षी दलों को मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करने का जोरदार नुस्खा भी सुझाया था - कांग्रेस बड़ी पार्टी होने के चलते देश भर के क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करे, लेकिन जिस राज्य में जो मजबूत पार्टी है नेतृत्व का मौका उसे दिया जाये. ममता बनर्जी जहां इस कवायद के केंद्र में नजर आ रही थीं, शरद पवार और एचडी देवगौड़ा जैसे नेताओं के साथ साथ चंद्रबाबू नायडू और के चंद्रशेखर राव जैसे नेताओं ने भी अपनी तरफ से कोई कसर आखिर तक बाकी नहीं रखी.

rahul gandhi, narendra modiलोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए राहुल गांधी को भी तो खुद से उम्मीद जगानी होगी!

स्टेट कांग्रेस के नेताओं का नाम लेकर न तो राहुल गांधी किसी पार्टी के साथ गठबंधन को राजी हुए और न ही यूपी जैसे बड़े राज्य में मायावती ने तब बने सपा-बसपा गठबंधन के आस पास कांग्रेस को फटकने दिया. उस वक्त ममता बनर्जी बंगाल में, अरविंद केजरीवाल दिल्ली में और चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन चाहते थे, लेकिन बात नहीं बन पायी - और हुआ भी वही जिसकी आशंका थी. पांस साल बाद भी कांग्रेस खुद को संभाल नहीं पायी, सत्ता हासिल करने की बात तो बहुत दूर की थी.

कांग्रेस की हार कि जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही दे दिया था, लेकिन ट्विटर पर औपचारिक तौर पर 3 जुलाई, 2019 को सार्वजनिक किये - और हाल में हुए विधानसभा चुनावों से पहले बताया था गया कि जून में कांग्रेस को स्थायी अध्यक्ष मिल सकता है. लगता है केरल और असम में कांग्रेस को मिली बुरी शिकस्त को देखते हुए राहुल गांधी ने एक बार फिर कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी से खुद को दूर कर लिया है.

फिर भी सुधींद्र कुलकर्णी जैसा व्यक्ति जिसकी जिंदगी का लंबा हिस्सा मुख्यधारा की राजनीति में गुजरा हो, अब भी राहुल गांधी से इतनी उम्मीद क्यों बनाये हुए है कि ट्विटर पर राहुल गांधी को ही उम्मीद के तौर पर पेश कर रहा है?

सुधींद्र कुलकर्णी की तरह सोचने वाले भला कितने लोग हो सकते हैं? ये सवाल सूझते ही कुछ लोगों से बात की तो राहुल गांधी को पप्पू समझने और बताने वाले कई ऐसे लोग मिले जो सुधींद्र कुलकर्णी के ट्वीट में मोदी विरोध का फ्रस्टेशन देख रहे थे, लेकिन ऐसे भी लोग रहे जो पूछते ही तपाक से बोल पड़े, 'मोदी के मुकाबले देखा जाये तो एक ही चेहरा नजर आता है - राहुल गांधी का.'

राहुल गांधी ही क्यों - ममता बनर्जी क्यों नहीं? जवाब मिला, 'कोई लॉजिक तो नहीं, लेकिन लगता है विपक्ष में एक ही चेहरा है और वो है राहुल गांधी. सिर्फ राहुल गांधी.'

मतलब, बंटवारे का आधार पसंद और नापसंद मान लिया जाये. जिसे मोदी पसंद हैं उसे राहुल गांधी पप्पू नजर आते हैं और जिसके पास कोई लॉजिक नहीं है वो राहुल गांधी को पसंद करता है. अब पसंद के पीछे कोई लॉजिक तो हो भी नहीं सकता. फिर तो यही लगता है कि दोनों को पसंद करने वाले मौजूद हैं जिनका अपने अपने नेता से भावनात्मक लगाव है - अब ये बात अलग है कि पसंद करने वालों का नंबर किसके पक्ष में ज्यादा है.

उम्मीदों की भी तो कोई उम्र होती ही होगी!

अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ से बातचीत में विपक्षी दल के एक नेता की सुधींद्र कुलकर्णी के ट्वीट पर टिप्पणी थी, 'ट्वीट थोड़ा हटके भी हो सकता था - प्रिय उम्मीद, अब इतना भी निराश मत करो.' अखबार की रिपोर्ट में बताया गया है कि ये नेता कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ बागियों की सूची में शामिल नहीं थे और गांधी परिवार के साथ लंबे समय से जुड़े हैं.

अखबार से नेता का कहना था कि निस्संदेह कांग्रेस को नेतृत्व संकट से जूझना पड़ रहा है और ऐसे में राहुल गांधी जिम्मेदारी लेने से भाग भी नहीं सकते - 'हम सब तो यही अपेक्षा रखते हैं कि वो और भी जिम्मेदारी के साथ पेश आएंगे.'

सवाल ये है कि ऐसे नेताओं की उम्मीद के पीछे कोई आधार या तर्क भी है या महज भावनात्मक पक्ष ही प्रबल है, वैसे ही लोगों की तरह जिनकी नजर के सामने प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले सिर्फ राहुल गांधी का ही चेहरा नजर आता है?

ममता की राहुल गांधी से तुलना करते हुए ऐसे लोग कांग्रेस के राष्ट्रव्यापी नेटवर्क का उदाहरण भी देते हैं - लेकिन एक के बाद एक आये चुनाव नतीजे तो यही बताते हैं कि कांग्रेस के देशव्यापी कार्यकर्ता महज कागजों पर सिमट कर रह गये हैं. जैसे ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद लेफ्ट और कांग्रेस के कार्यकर्ता उनके साथ हो लिये, ठीक वैसे ही देश में जहां जो पक्ष सत्ता पर काबिज हुआ ऐसे कार्यकर्ता हवा का रुख देख कर ताकतवर के साथ हो लिये.

अभी यूपी में हुए पंचायत चुनाव को ही देखें तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा कई महीने से गांव गांव तक लोगों से कांग्रेस को जोड़ने की कोशिश में जुटी हुई हैं, लेकिन जब नतीजे आते हैं तो मालूम होता है कि बीजेपी जहां कहीं भी चूक रही है, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और कहीं कहीं मायावती की बीएसपी आगे आ जाती है, कांग्रेस जस की तस पिछड़ी हुई ही नजर आती है, फिर भी उम्मीदें हैं कि कम होने का नाम नहीं ले रही हैं.

लोगों को राहुल गांधी से जैसी भी उम्मीद हो, लेकिन लगता तो ऐसा भी नहीं कि राहुल गांधी खुद को लेकर या कांग्रेस को लेकर भी कोई खास उम्मीद अपने अंदर बचा पाये हैं. अगर सचिन पायलट पर अशोक गहलोत की टिप्पणियों को याद करें तो यही लगता है कि ट्विटर पर राजनीतिक बयान देने से कुछ भी नहीं होता - सत्ता की राजनीति में उम्मीदें बनाये रखने के लिए चुनाव जीतना भी जरूरी होता है. राहुल गांधी सब कुछ कर रहे हैं, सिवा चुनावों में कांग्रेस को जिताने के.

क्या उम्मीदों की कोई उम्र नहीं होती होगी? सबसे बड़ा सवाल तो फिलहाल यही है कि राहुल गांधी कभी पूरी न होने वाली उम्मीद क्यों बनते जा रहे हैं?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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