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Updated: 01 मई, 2020 11:40 AM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन (Raghuram Rajan) का इंटरव्यू लिया है. ये इंटरव्यू इसलिए कहा जाएगा क्योंकि इसका फॉर्मैट ऐसा ही रखा गया है. राहुल गांधी सवाल पूछते हैं और रघुराम राजन उनके जवाब देते जा रहे हैं - ठीक वैसे ही जैसे टीवी पर होता है.

कांग्रेस इसे संवाद शृंखला बता रही है जो दुनिया भर के अलग अलग एक्सपर्ट के साथ लंबा चलने वाली है. रघुराम राजन के साथ संवाद उसी कड़ी का पहला कार्यक्रम है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने पहले से ही ट्विटर पर इस शो का ट्रेलर जारी कर दिया था - और तय कार्यक्रम के मुताबिक 30 अप्रैल को 9 बजे सुबह इसे पोस्ट किया गया.

संवाद के इस कार्यक्रम में राहुल गांधी ने रघुराम राजन से अर्थ व्यवस्था से जुड़े कई सवाल पूछे और जाहिर से जवाब भी मिलने ही थे - लेकिन सवाल ये है कि कांग्रेस के अंदर ही बहुत बड़े अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) के होते हुए राहुल गांधी को रघुराम राजन से सलाह लेने की जरूरत क्यों आ पड़ी?

मनमोहन सिंह से सलाह क्यों नहीं ली

हाल फिलहाल राहुल गांधी बैंकिंग के जुड़े कुछ शब्दों को लेकर बीजेपी के निशाने पर हैं - 'राइट ऑफ' और 'वेव ऑफ'. जब भी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे विलफुल डिफॉल्टरों पर कांग्रेस की तरफ से सवाल पूछे जाते हैं मोदी सरकार और बीजेपी नेता बड़ी गंभीरता से लेते हैं. राहुल गांधी और रणदीप सुरजेवाला के आरोपों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक के बाद एक 13 ट्वीट इस बात के सबूत भी हैं और अपने आप में मिसाल भी.

राहुल गांधी ने एक ट्वीट किया था - 'संसद में मैंने एक सीधा सा प्रश्न पूछा था- मुझे देश के 50 सबसे बड़े बैंक चोरों के नाम बताइए. वित्त मंत्री ने जवाब देने से मना कर दिया. अब RBI ने नीरव मोदी, मेहुल चोकसी सहित भाजपा के ‘मित्रों’ के नाम बैंक चोरों की लिस्ट में डाले हैं. इसीलिए संसद में इस सच को छुपाया गया.' राहुल गांधी ने ये ट्वीट RTI कार्यकर्ता साकेत गोखले को मिले RBI से मिले जवाब के बाद आया जिसमें बैंकों के कर्ज न लौटाने वाले 50 बड़े कारोबारियों के नाम सार्वजनिक कर दिये गये थे.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी के ट्वीट को गंभीरता से लेते हुए ट्विटर पर अपने तरीके से हर जरूरी बात को सामने रखा. निर्मला सीतारमण ने आरोप यहां तक कह डाला कि राहुल गांधी और कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने निहायत ही बेशर्मी से लोगों को गुमराह करने की कोशिश की है. वित्त मंत्री ने कहा कि तथ्यों को संदर्भ से हटा कर सनसनीखेज बना देना कांग्रेस की स्टाइल है.

निर्मला सीतारमण ने आंकड़ों के साथ मामले से जुड़े तमाम पहलुओं पर सफाई देते हुए राहुल गांधी को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से 'राइट ऑफ' के बारे में समझने की भी सलाह दे डाली.

दरअसल, राइट ऑफ और वेव ऑफ में काफी फर्क होता है - वेव ऑफ किये जाने के बाद कर्ज लेने वाले की देनदारी खत्म हो जाती है और सरकार उसकी भरपायी करती है, जबकि राइट ऑफ में बैंक रिकवरी को लेकर निराश हो जाता है और कानूनी तरीका अपनाता है, मतलब ये कि लोन लेने वाले की देनदारी खत्म नहीं हुई रहती है.

इसी विवाद के बीच राहुल गांधी और रघुराम राजन का देश की अर्थ व्यवस्था को लेकर संवाद सामने आया है, जिसमें राहुल गांधी ने कोरोना वायरस को लेकर जारी लॉकडाउन के बाद के हालात को लेकर विस्तार से चर्चा की है. जहां तक सवालों की बात है, राहुल गांधी ने रघुराम राजन से कोई नया या खास सवाल नहीं पूछा.

सवाल ये है कि जब राहुल गांधी को वही पुराने सवाल पूछने थे तो रघुराम राजन को तकलीफ देने की जरूरत क्यों पड़ी?

manmohan singh, raghuram rajanमनमोहन सिंह के 28 साल बाद रघुराम राजन रिजर्व बैंक के गवर्नर बने थे - फिर भी राहुल गांधी को ज्यादा पसंद आये

जिस तरह रघुराम राजन दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री हैं बिलकुल वैसे ही मनमोहन सिंह भी हैं - बल्कि, रघुराम राजन से कहीं ज्यादा सीनियर हैं.

जैसे रघुराम राजन आरबीआई के गवर्नर थे, ठीक वैसे ही मनमोहन सिंह भी कभी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर हुआ करते थे. रघुराम राजन तो सिर्फ आरबीआई गवर्नर ही रहे, मनमोहन सिंह तो केंद्र सरकार में वित्त मंत्री और फिर लगातार 10 साल तक देश के प्रधानमंत्री भी रहे हैं. वैसे भी जो अर्थशास्त्री देश का प्रधानमंत्री रह चुका हो, देश में उदारीकरण लाने को लेकर उसका नाम हो उससे देश के बारे में सलाह न लेकर किसी और से सलाह लेना क्या कहलाता है.

एक खास बात ये भी है कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को कोरोना वायरस और लॉकडाउन के दौरान राजनीतिक हालात पर सलाह देने के लिए जो 11 सदस्यों की टीम बनायी है उसके चेयरमैन मनमोहन सिंह ही हैं - और कुछेक मौकों पर मनमोहन सिंह को राहुल गांधी अपना राजनीतिक गुरु भी बता चुके हैं.

कुछ नया तो पूछा नहीं

राहुल गांधी और रघुराम राजन के सवाल जवाब को ध्यान से सुनने पर कोई नयी बात सामने नहीं आती - वही पुराने सवाल पूछे गये हैं जो राहुल गांधी के भाषणों में या बयानों में देखने सुनने को मिलते हैं. राहुल गांधी ने उन सवालों को ही रघुराम राजन के सामने रखा है जिन को लेकर वो अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को घेरते आये हैं.

राहुल गांधी ने कोरोना टेस्टिंग को लेकर भी सवाल पूछा और बेरोजगारी को लेकर भी - और फिर किसानों और गरीबों को लेकर भी. ये तो वे ही सारे सवाल हैं जिन पर राहुल गांधी या तो ट्वीट करते हैं या प्रेस कांफ्रेंस या जब भी जरूरत होती है बयान देते रहते हैं.

राहुल गांधी ने पूछा कि कोरोना संक्रमण से नौकरियों पर क्या असर पड़ेगा? किसानों और मजदूरों को डायरेक्ट ट्रांसफर और मनरेगा, विधवा पेंशन जैसे कार्यक्रमों पर भी चर्चा हुई. रघुराम राजन का सुझाव रहा कि लोगों तक पैसे और खाना पहुंचाने की कोशिश की जानी चाहिये.

रघुराम राजन का एक सुझाव रहा - 'गरीबों की मदद के लिए 65 हजार करोड़ रुपयों की जरूरत है. भारत का जीडीपी 200 लाख करोड़ है. ऐसे में 65 हजार करोड़ ज्यादा बड़ी रकम नहीं है - उनकी जिंदगी बचाने के लिए ऐसा कर सकते हैं.'

राहुल गांधी ने रघुराम राजन से लॉकडाउन खोलने के बाद की चुनौतियों पर भी चर्चा की.

हां, राहुल गांधी का एक सवाल जरूर अलग था - 'अभी देश संकट में हैं लेकिन कोविड-19 के बाद क्या हिंदुस्तान को फायदा भी होगा?

रघुराम राजन की पहली टिप्पणी तो यही रही कि कोविड-19 महाआपदा जैसी घटनाओं के किसी भी देश के लिए शायद ही कोई सकारात्मक नतीजे होते हैं - लेकिन, बदले माहौल में कुछ मौके ऐसे हो सकते हैं जिनका फायदा उठाया भी जा सकता है.

आरबीआई का गवर्नर पद छोड़ने के बाद से ही रघुराम राजन विपक्षी खेमे के भारतीय नेताओं के पसंदीदा अर्थशास्त्री रहे हैं. आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल तो उनको राज्य सभा में भी भेजना चाहते थे लेकिन वो मना कर दिये - फिर केजरीवाल को अपने करीबियों से ही काम चलाना पड़ा.

असल में रघुराम राजन की प्रासंगिकता उनकी काबिलियत से ज्यादा मोदी विरोधी रूख से बनी रहती है - क्योंकि नोटबंदी के वक्त वो आरबीआई के गवर्नर थे और वो तरीका उनको पसंद नहीं था.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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