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Updated: 09 मई, 2022 10:52 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राहुल गांधी (Rahul Gandhi) नेपाल से लौटते ही तेलंगाना के दौरे पर निकल गये थे. राहुल गांधी के लिए दिक्कत वाली बात ये रही कि उनका एक और वीडियो लीक हो जाने की वजह से वो राजनीतिक मकसद पीछे छूट गया जिसे वो अड्रेस करने की कोशिश कर रहे थे. नेपाल के नाइटक्लब वाले वीडियो के बाद राहुल गांधी के तेलंगाना दौरे से भी एक वीडियो बवाल मचा रहा है.

वैसे राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (K Chandrashekhar Rao) पर जिस तरह से हमला बोला है, ऐसा लगता है जैसे कांग्रेस नेता को टीआरसे नेता में तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की छवि नजर आने लगी हो - और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी दलों के नेतृत्व की होड़ में ममता बनर्जी के बाद केसीआर को भी नये चैलेंज के तौर पर देखने लगे हों.

कांग्रेस भले ही राहुल गांधी के लिए प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी बरकरार रखी हो, लेकिन राहुल गांधी को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता होगा, ऐसा उनकी बातों से ही लगता है - लेकिन विपक्षी खेमे में वो खुद को सबसे बड़ा नेता तो मानते ही हैं. अपना ये रुतबा बनाये रखने के लिए ही तो वो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही टारगेट करते रहे हैं - और ऐसा वो तकरीबन 24 घंटे करते हैं. हो सकता है शरद यादव इसी कारण कहते हों कि राहुल गांधी कांग्रेस के लिए चौबीस घंटे काम करते हैं.

वैसे राहुल गांधी ने टीआरएस नेता केसीआर पर भी उसी स्टाइल में हमला बोला है जैसे वो प्रधानमंत्री मोदी को टारगेट करते हैं. कहते हैं, वो एक राजा की तरह व्यवहार करते हैं. लगे हाथ क्षेत्रीय कांग्रेस नेताओं को भी पहले से ही आगाह कर देते हैं - अगर किसी ने अगर किसी ने टीआरएस के साथ गठबंधन की पैरवी की तो उसे कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा.

तेलंगाना की तैयारी कहां तक हुई?

सोनिया गांधी और प्रशांत किशोर के बीच चल रही बातचीत टूटने की एक वजह तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता के. चंद्रशेखर राव भी बने थे. एक तरफ प्रशांत किशोर कांग्रेस को प्रजेंटेशन दे रहे थे, दूसरी तरफ ऐन उसी वक्त टीआरएस के साथ उनकी डील फाइनल स्टेज में थी. फिर अचानक प्रशांत किशोर की कंपनी आईपैक और टीआरएस ने कॉनट्रैक्ट साइन कर दिया - और असर ये हुआ कि कांग्रेस की तरफ से प्रशांत किशोर के मामले में बढ़ाये हुए कदम पीछे खींचने का मौका मिल गया. दोनों के रास्ते अलग अलग हो गये.

फिर तो ये साफ हो गया कि प्रशांत किशोर कांग्रेस के जानी दुश्मन टीआरएस के लिए काम करेंगे. कहने को तो प्रशांत किशोर अभी बिहार में पदयात्रा करने जा रहे हैं. हजारों लोगों के साथ मुलाकात करने वाले हैं - अगर ढंग के कुछ लोग मिल जाते हैं और नया राजनीतिक फोरम बनाने के लिए तैयार होते हैं तो प्रशांत किशोर उस पर आगे बढ़ेंगे. ये सब खुद प्रशांत किशोर ने ही पटना में प्रेस कांफ्रेंस करके बताया है.

rahul gandhi, kcr, mamata banerjeeतेलंगाना दौरे से राहुल गांधी क्या केसीआर की सियासी धार को कम कर पाएंगे?

तब तक तेलंगाना में प्रशांत किशोर की टीम काम करती रहेगी. वैसे भी तेलंगाना में 2023 के आखिर में विधानसभा के लिए चुनाव होने वाले हैं. हालांकि, केसीआर की नजर 2024 के आम चुनाव पर भी टिकी हुई लगती है - और टीआरएस नेता की तीसरी पारी की भी जोरदार चर्चा चल रही है.

ये बात अलग है कि केसीआर ने अभी तक 2024 के आम चुनाव में अपनी भूमिका को ठीक से प्रोजेक्ट नहीं किया है. ये जरूर समझाने की कोशिश की है कि वो विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं - लेकिन ममता बनर्जी की ही तरह वो भी खुद को विपक्षी टीम का एक एक्टिव मेंबर जैसा ही पेश कर रहे हैं.

जब उत्तर प्रदेश सहित देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे थे, केसीआर मुंबई पहुंचे हुए थे. वहां केसीआर ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और एनसीपी नेता शरद पवार से मुलाकात कर काफी देर तक बातचीत भी की थी. बाद में मीडिया के सामने आये केसीआर ने ऐलान किया था कि जल्द ही विपक्ष का एजेंडा पेश किया जाएगा - अभी तक वो एजेंडा सामने तो नहीं आया है.

जाहिर है राहुल गांधी के दिमाग में ये बातें गदर मचा रही होंगी - और प्रशांत किशोर के उनकी तरफ हो जाने से और भी ज्यादा गुस्सा आता होगा. और वही गुस्सा तेलंगाना पहुंचने पर निकल गया. गुस्से में गलतियां तो होती ही हैं. एक छोटी सी गलती, वीडियो के जरिये भी मार्केट में आ गयी. फिर फजीहत तो स्वाभाविक है.

तेलंगाना पर खास नजर राहुल गांधी ने 2018 में भी तेलंगाना में चुनाव प्रचार किया था, लेकिन पूरी महफिल नवजोत सिंह सिद्धू लूट ले गये. सिद्धू ने तभी अपने कैप्टन का नाम राहुल गांधी बताया था, कैप्टन अमरिंदर सिंह को काउंटर करने के लिहाज से. राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार में क्या कहा, इससे ज्यादा सिद्धू का बयान चर्चित रहा.

बाद में अफसोस की बात इसलिए भी नहीं रही क्योंकि कांग्रेस तीन राज्यों में चुनाव जीत चुकी थी - मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़. तीनों ही राज्यों में बीजेपी को शिकस्त देना राहुल गांधी के लिए बहुत बड़ी कामयाबी रही. बाद में क्या हुआ ये ज्यादा मायने नहीं रखता क्योंकि होना भी वही था जो कुछ हुआ.

निश्चित तौर पर 2024 से पहले राहुल गांधी के मन में फिर से वैसी ही उम्मीद जगी होगी. शायद इसीलिए इस बार लक्ष्य सूची में तेलंगाना को भी शामिल कर लिया गया है. राहुल गांधी के तेलंगाना पर फोकस करने की कुछ खास वजहें भी लगती हैं.

एक वजह तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री की विपक्षी गोलबंदी की कोशिश में धुरी बनने की कोशिश है - और दूसरा, तेलंगाना में राहुल गांधी के पसंदीदा नेता रेवंत रेड्डी हैं. संघ और बीजेपी की पृष्ठभूमि से आने वाले रेवंत रेड्डी को राहुल गांधी ठीक वैसे ही पसंद करते हैं जैसे पंजाब में सिद्धू और महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष नाना पटोले को. रेवंत रेड्डी भी प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष ही हैं.

महाराष्ट्र में तो सत्ता का हिस्सेदार बन जाने से ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, लेकिन बाहर से आये रेवंत रेड्डी को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपे जाने से कई स्थानीय नेताओं में नाराजगी देखी गयी थी. राहुल गांधी के तेलंगाना दौरे में कड़ा रुख अपनाने की एक वजह ये भी लगती है.

जैसे सिद्धू के सामने राहुल गांधी ने बाकी किसी की भी परवाह नहीं की, तेलंगाना का मामला भी वैसा ही लगता है. शायद इसीलिए कह भी रहे हैं कि जो भी टीआरएस के साथ हाथ मिलाने की वकालत कर रहे हैं, कांग्रेस छोड़ कर केसीआर की पार्टी या बीजेपी ज्वाइन कर सकते हैं. अगर कांग्रेस में रहते हुए ऐसी हरकत देखी गयी तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा.

KCR और ममता का कॉमन एजेंडा

अगर राहुल गांधी पंजाब चुनाव में व्यस्त नहीं होते तो केसीआर के पहुंचते ही कांग्रेस नेता को भी मुंबई में नाना पटोले के साथ मीटिंग करते देखा जा सकता था. जैसे ममता बनर्जी के दिल्ली आने पर राहुल गांधी विपक्षी खेमे के नेताओं के साथ एक्टिव हो गये थे या तृणमूल कांग्रेस नेता के गोवा का कार्यक्रम बनते ही वो खुद भी पहुंच गये थे.

जहां तक हालिया चुनावी तैयारियों की बात है, राहुल गांधी गुजरात और कर्नाटक जाकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की हौसलाअफजाई कर चुके हैं. दोनों ही दौरों में राहुल गांधी का नया टैलेंज मोटिवेशल स्पीकर के रूप में देखने को मिला था.

राहुल गांधी के केसीआर और ममता बनर्जी से चिढ़ मचने की वजह भी है. ममता बनर्जी और केसीआर दोनों ही देश में विपक्षी मोर्चा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं. केसीआर तो 2019 के आम चुनाव में भी गैर-कांग्रेस और गैर-बीजेपी मोर्चा खड़ा करना चाहते थे, ममता बनर्जी तो अभी कुछ दिनों से कांग्रेस को किनारे रख कर विपक्ष को एकजुट करने की पक्षधर नजर आ रही हैं.

ध्यान देने वाली बात ये भी है कि दोनों ही मामलों में शरद पवार की कॉमन भूमिका है. ममता बनर्जी भी शरद पवार से मिलने के लिए मुंबई पहुंच जाती हैं - और केसीआर भी ठीक ऐसा ही करते हैं. शरद पवार बैठ कर ममता बनर्जी के साथ भी मीटिंग कर लेते हैं और ठीक वैसे ही केसीआर के साथ भी. खास बात ये है कि मिलने के बाद भी ज्यादातर चुप ही रहते हैं.

बाद में जब ऐसी गतिविधियों को लेकर मीडिया सवाल पूछता है, तो साफ साफ बोल देते हैं कि कांग्रेस को साथ लिये बगैर विपक्षी एकजुटता का मतलब नहीं रह जाता है. कांग्रेस के लिए अच्छी बात ये है कि सोनिया गांधी के बुलाने पर शरद पवार मीटिंग के लिए पहुंच भी जाते हैं. भले ही वो पूरे विपक्ष की मीटिंग न हो - क्योंकि मीटिंग में न तो ममता बनर्जी होती हैं, न केसीआर और न ही अरविंद केजरीवाल. जिस तरह से पंजाब जीतने के बाद अरविंद केजरीवाल एक्टिव देखे जा रहे हैं, महत्व तो उनका भी बढ़ ही जाता है.

शरद पवार की मदद से सोनिया गांधी ने ममता बनर्जी के तेवर को कम तो कर ही दिया है. प्रशांत किशोर का भी साथ छूट ही चुका है. राहुल गांधी ने केसीआर के खिलाफ खुद मोर्चा संभाला है, ताकि प्रशांत किशोर के प्रभाव को भी जहां तक हो सके काउंटर किया जा सके.

राहुल गांधी के लिए आगे की चुनौतियां

नेपाल से लेकर तेलंगाना तक राहुल गांधी को उनके राजनीतिक विरोधियों ने चैन से नहीं रहने दिया है. मुद्दा सिर्फ वीडियो लीक करने का ही नहीं है, मौका देख कर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी तो वायनाड का दौरा भी कर आयी हैं. स्मृति ईरानी के वायनाड दौरे का मकसद तो हर किसी को समझ में आता ही है.

तेलंगाना के वीडियो शेयर करने को लेकर कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी का बचाव करते हुए पवन खेड़ा कहते हैं, 'क्या जवाब दूं? अमित मालवीय अपरिपक्व हैं... उनको लगता है कि राष्ट्र अपरिपक्व है - वो स्वीकार क्यों नहीं करते कि वो केसीआर को कवर फायर दे रहे हैं?'

पवन खेड़ा जो भी समझाने की कोशिश करें, लेकिन अमित मालवीय ने वही किया है जो नेपाल का वीडियो हाथ लगने के बाद किया था. या ऐसा कोई भी मौका हाथ लगने पर करते हैं. अमित मालवीय के लिए तो जैसे केसीआर वैसे राहुल गांधी हैं.

राहुल गांधी को मेडक से चुनाव लड़ने की सलाह राहुल गांधी के तेलंगाना दौरे पर हैदराबाद से AIMIM नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी कटाक्ष किया है - वो राहुल गांधी को वायनाड छोड़ कर मेडक से चुनाव लड़ने की सलाह भी देने लगे हैं.

मेडक वही लोक सभा क्षेत्र है जहां से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपना आखिरी चुनाव लड़ी थीं. 1977 के आम चुनाव में समाजवादी नेता राज नारायण से हार जाने के बाद 1980 में इंदिरा गांधी ने रायबरेली के साथ मेडक से भी चुनाव लड़ा था, लेकिन फिर रायबरेली छोड़ दिया था.

लगता है राहुल गांधी को ओवैसी मेडक से चुनाव लड़ने का सुझाव स्मृति ईरानी के वायनाड दौरे की वजह से दे रहे हैं. स्मृति ईरानी ने 2019 में राहुल गांधी को अमेठी में हरा दिया था, लेकिन पूछे जाने पर स्मृति ईरानी ने यही बताया कि वो अमेठी नहीं छोड़ने वाली हैं. यानी वायनाड से चुनाव लड़ने का उनका कोई इरादा नहीं है.

राहुल गांधी के तेलंगाना वाले वीडियो को लेकर भी ओवैसी ने रिएक्ट किया है. कहते हैं, 'जब आप नहीं जानते कि तेलंगाना के लोगों को क्या संदेश देना चाहते हैं तो वे आपका समर्थन क्यों करेंगे? आपका दिमाग खाली है... आप क्या संदेश देंगे और आप टीआरएस से कैसे लड़ेंगे? आप आये हैं, आते रहिएगा.'

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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