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Updated: 18 मई, 2022 08:48 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को लेकर शरद पवार ने एक बार जमींदारों का एक किस्सा सुनाया था. तब भी और, हालांकि, अब भी एनसीपी नेता शरद पवार कांग्रेस पार्टी की अहमियत को नजरअंदाज नहीं करते - लेकिन जो आईना दिखाना चाहते हैं, गांधी परिवार कभी नहीं देखना चाहता है.

आज की तारीख में शरद पवार कांग्रेस (Congress) के लिए बहुत बड़े सपोर्ट हैं, राहुल गांधी जो भी सोचते हों लेकिन सोनिया गांधी ये जरूर मानती हैं. एक बार इंडिया टुडे के साथ इंटरव्यू में कांग्रेस नेतृत्व को लेकर पूछे जाने पर शरद पवार का कहना था कि जब भी लीडरशिप की बात आती है, कांग्रेस नेता संवेदनशील हो जाते हैं.

शरद पवार का कहना रहा, 'मैंने पहले यूपी के जमींदारों की एक कहानी सुनायी थी, जिनके पास बड़ी बड़ी हवेलियां और जमीनें थीं... लैंड सीलिंग एक्ट के बाद उनकी जमीनें कम हो गयीं. उनके पास हवेलियों के रखरखाव की ताकत भी नहीं बची - लेकिन रोज सवेरे वे सब उठ कर जमीन को देखते हुए यही कहते कि ये सब हमारा है... कांग्रेस की मानसिकता भी कुछ ऐसी ही है - वास्तविकता को स्वीकारना होगा.'

अभी उदयपुर के नव संकल्प शिविर में ही कांग्रेस नेताओं की तरफ से कहा जा रहा था कि पार्टी के पास पैसा नहीं है. कॉर्पोरेट से फंड मिलता नहीं - और पार्टी चलाना तक मुश्किल हो रहा है. ये बात कांग्रेस नेताओं ने तब कही थी जब सोनिया गांधी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में बोल दिया था कि पार्टी अब तक खूब देती रही है, अब तो लौटाओ.

और उसी चिंतन शिविर से निकल कर राहुल गांधी दावा कर रहे हैं कि बीजेपी को सिर्फ कांग्रेस ही हरा सकती है - ये बात तो शरद पवार भी मानते हैं. बार बार कहते आये हैं. चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर का भी ऐसा ही नजरिया है.

अभी पश्चिम बंगाल की जीत के बाद विपक्षी खेमे के नेताओं की कई मुलाकातें और मीटिंग हुई. जब कांग्रेस को नहीं पूछा गया तो गांधी परिवार परेशान हो उठा. इतना परेशान कि शरद पवार के पास कांग्रेस नेता कमलनाथ को भेजा गया - और जब तक शरद पवार ने मीडिया के सामने आकर ये नहीं कहा कि कांग्रेस के बगैर कोई विपक्षी गठबंधन हो ही नहीं सकता, चैन नहीं पड़ा.

शरद पवार के बाद गांधी परिवार प्रशांत किशोर से बातचीत करने लगा और ऐसा लगा जैसे वो सब छोड़ कर कांग्रेस के ही हो जाएंगे, लेकिन फिर मामला अटक गया. कांग्रेस के साथ काम बनते बनते रह जाने के बाद प्रशांत किशोर फिर से ममता बनर्जी के साथ हो गये लगते हैं. ममता बनर्जी को देश का प्रधानमंत्री बनाने के लिए नये सिरे से कोशिशें भी शुरू हो गयी है - एक वेबसाइट भी बना दी गयी है, नाम भी बिलकुल सीधा रखा गया है - इंडिया वॉन्ट्स ममता दी डॉट कॉम.

जाहिर है, ममता बनर्जी का ये खुला चैलेंज नये सिरे से कांग्रेस नेतृत्व को परेशान कर रहा होगा. ये भी हो सकता है कि क्षेत्रीय दलों (Regional Political Parties) को लेकर राहुल गांधी की ताजा राय भी ममता बनर्जी के नये कैंपेन के रिएक्शन में हो और कांग्रेस को मठाधीश के तौर पर पेश करने के लिए क्षेत्रीय दलों की विचारधार पर भी सवाल उठा दिये हों - जो भी हो, राहुल गांधी की टिप्पणी पर क्षेत्रीय दलों के नेताओं का गुस्सा तो फूट ही पड़ा है और वे अपने अपने तरीके से जताने भी लगे हैं.

क्षेत्रीय नेताओं का प्रदर्शन राहुल गांधी से बेहतर है!

अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो से पहले ही राहुल गांधी द्वारका पहुंचे थे. तब वहां कांग्रेस के नव संकल्प चिंतन शिविर का रिहर्सल चल रहा था, गुजरात कांग्रेस के लिए. किसी मोटिवेशनल स्पीकर की तरह राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को चुनाव जीतने का जो सबसे बड़ा मंत्र दिया था, वो रहा - "ये चुनाव आप जीत गये हो, बस अब इस बात को स्वीकार करना है."

rahul gandhiराहुल गांधी अब तक ये तो समझ ही चुके होंगे कि 2024 में सत्ता की नहीं, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनने जंग होने वाली है - और कांग्रेस की साख दांव पर है.

क्षेत्रीय दलों की विचारधारा को लेकर भी राहुल गांधी का आकलन करीब करीब वैसा ही लगता है. देखा जाये तो कांग्रेस 2004 में भी बीजेपी को नहीं हरा पायी थी. असल बात तो ये थी कि तब बीजेपी खुद चुनाव हार गयी थी, बल्कि हार की बड़ी वजह बीजेपी का शाइनिंग इंडिया के मोहपाश में बंधे होना ज्यादा रहा. फिर भी कांग्रेस बहुमत से बहुत पीछे रह गयी थी - और क्षेत्रीय दलों को मिलाकर यूपीए इसलिए बन सका क्योंकि ज्यादातर दल बीजेपी के साथ सहज नहीं महसूस कर पा रहे थे. और यूपीए 2 एक सफल प्रयोग की पुरनरावृत्ति रही जो आखिरकार फेल हो गया.

मुद्दे की बात तो ये है कि तकरीबन सभी क्षेत्रीय नेता राहुल गांधी से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं. हो सकता है राहुल गांधी बहुतों को अपने ही जैसा खानदानी नेता और वारिस मानते हों, लेकिन सफलता के पैमाने पर अपने समकालीन और फैमिली पॉलिटिक्स में समकक्ष शायद ही ऐसा कोई है जो राहुल गांधी से दो कदम आगे न बढ़ गया हो.

ममता बनर्जी या जगनमोहन रेड्डी के अपना मुकाम हासिल करने के रास्ते और तरीके भले अलग रहे हों, लेकिन वे भी कांग्रेस से अलग होकर ही क्षत्रप बने हैं. शरद पवार तो हमेशा ही कहते हैं कि उनकी विचारधारा कांग्रेस की है - और हो सकता है, राहुल गांधी के सॉफ्ट हिंदुत्व के प्रयोगों से बेहतर वो एनसीपी को मानते हों.

केसीआर तो राजनीतिक विरोधी हैं, लेकिन उद्धव ठाकरे और हेमंत सोरेन के साथ राहुल गांधी की पार्टी तो सरकार में साझीदार भी है - ऐसे गठबंधन साथियों में सिर्फ एमके स्टालिन की पार्टी ने ही प्रतिक्रिया में दूरी बनायी है, बाकी सभी के निशाने पर राहुल गांधी आ चुके हैं. अगर अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव की बात करें तो दोनों ही राहुल गांधी से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं.

1. जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी ने राहुल गांधी से पूछा है - 'डीएमके के साथ दस साल सत्ता में रह कर, मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-1 और यूपीए-2 सरकार चलाना क्या कोई वैचारिक प्रतिबद्धता थी?'

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी का कहना है कि संयुक्त मोर्चा की इंद्र कुमार गुजराल सरकार को कांग्रेस ने इसलिए गिरा दिया था क्योंकि वो डीएमके को कैबिनेट से बाहर रखना चाहती थी. तब कांग्रेस का मानना था कि डीएमके का लिट्टे से रिश्ता है, लेकिन बाद में कांग्रेस और डीएमके एक हो गये. लिट्टे वही श्रीलंकाई संगठन है जिसने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की थी.

कांग्रेस नेता को निशाने पर लेते हुए कुमारस्वामी ने कहा है कि राहुल गांधी को ये नहीं भूलना चाहिये कि कांग्रेस ने 10 साल तक सत्ता का मजा सिर्फ क्षेत्रीय दलों के भरोसे ही लिया है. आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी भी राहुल गांधी को याद दिलाना चाहते हैं कि जब सोनिया गांधी अपने विदेशी मूल को लेकर बीजेपी के निशाने पर थीं, ये लालू यादव ही थे जिनका कहना रहा - 'सोनिया गांधी देश की बहू हैं.' राहुल गांधी के बयान पर शिवानंद तिवारी कहते हैं, मुझे समझ में नहीं आ रहा है देश की राजनीति के बारे में उनका ज्ञान कितना है... लंबे समय तक कांग्रेस की अल्पमत सरकार क्षेत्रीय पार्टियों के सहयोग से ही चली है. 2020 के बिहार चुनाव के बाद शिवानंद तिवारी तो आरजेडी की हार के लिए भाई-बहन की जोड़ी यानी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे.

2. हाल ही में सीपीएम की तरफ से कहा गया था कि कांग्रेस खुद विचारधारा के संकट से जूझ रही है. और सॉफ्ट हिंदुत्व के चक्कर में वो बीजेपी की तरफ से दी जा रही चुनौतियों से मुकाबला नहीं कर पा रही है. कांग्रेस के सपोर्टर के तौर पर देखे जाने वाले सीताराम येचुरी ने भी कहा था कि बीजेपी और संघ तो कांग्रेस को सीरियसली लेते भी नहीं क्योंकि उनका कोई भी नेता कभी भी बीजेपी ज्वाइन कर सकता है.

3. ये पहला मौका है जब लालू यादव के बेटे तेज प्रताप यादव राहुल गांधी से खफा लगते हैं. तेज प्रताप भी राहुल गांधी को सलाह दे रहे हैं कि वो अपनी बहन प्रियंका गांधी को राजनीति में आगे लायें. तेज प्रताप यादव का कहना है कि समाजवादी पार्टियां ही संघ और बीजेपी से लड़ सकती हैं.

4. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी जेएमएम का कहना है कि ये राहुल गांधी का अपना आकलन हो सकता है और अपनी राय देना उनका हक है, लेकिन ये अधिकार उनको किसने दिया कि वो विचारधारा पर टिप्पणी करें. जेएमएम का सवाल है, 'बगैर किसी विचारधारा के हम पार्टी कैसे चला रहे हैं?'

5. बीजेडी प्रवक्ता लेनिन मोहंती कि टिप्पणी है, अपने अपने राज्यों में क्षेत्रीय दल जो नतीजे दे रहे हैं, वो पर्याप्त सबूत है. दिल्ली से लेकर केरल तक क्षेत्रीय दलों पर लोगों का भरोसा बढ़ रहा है और उसी हिसाब से वो जिम्मेदारी सौंप रहे हैं.

न नौ मन तेल हो रहा है, न...

देखा जाये तो राहुल गांधी ने अपने हिसाब से कांग्रेस को लेकर शरद पवार और प्रशांत किशोर की राय को ही आगे बढ़ाने की कोशिश की है, लेकिन थोड़ा भटक गये - और क्षेत्रीय दलों की विचारधारा पर सवाल उठा दिया. ऐसा अक्सर उनसे हो भी जाता है.

वैचारिक प्रतिबद्धता से आशय क्या है: कांग्रेस के नव संकल्प चिंतन शिविर के आखिरी दिन राहुल गांधी ने कहा था कि क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी-आरएसएस का सामना नहीं कर सकतीं - क्योंकि उनकी कोई भी वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं होती है. 

क्षेत्रीय दलों के नेता भी, भले ही विचारधारा की बात करें लेकिन ज्यादातर पार्टियां परिवार से ही चल रही हैं. जैसे ही परिवार टूटता है, विचारधारा पीछे छूट जाती है. यूपी में समाजवादी पार्टी और बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी प्रत्यक्ष प्रमाण हैं. अखिलेश यादव कहने को तो समाजवादी पार्टी का नेतृत्व करते हैं, लेकिन खुद सिर्फ अपनी बिरादरी यानी यादवों के नेता बन कर रह गये हैं. समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव कम से कम पिछड़े वर्गों के नेता तो रहे ही हैं.

मौजूदा राजनीति में जो विचारधारा हावी है वो अभी तो सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व की विचारधारा. बीजेपी तो उसी राह पर चलती है, लेकिन अब तो अरविंद केजरीवाल और मायावती जैसे नेता भी जय श्रीराम बोलने लगे हैं - दूसरी छोर पर ममता बनर्जी जैसे कितने नेता बचते हैं जो इसे राजनीतिक नारा कहते हों और अपनी चिढ़ का सार्वजनिक इजहार भी करते हों.

ड्राइविंग सीट छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचा: आरजेडी प्रवक्त मनोज झा भी राहुल गांधी को वैसा ही सुझाव दे रहे हैं, जैसा 2019 के आम चुनाव से पहले से ममता बनर्जी देती आयी हैं. राहुल गांधी की टिप्पणी के संदर्भ में कांग्रेस मनोज झा का सुझाव है, 'क्षेत्रीय दलों के हालिया इतिहास को देखते हुए उनको ड्राइविंग सीट पर रहने देना चाहिए - और कांग्रेस को खुद सहयात्री बन जाना चाहिये.

कांग्रेस की तात्कालिक दिक्कत ये है कि छोटे छोटे टास्क भी पहाड़ जैसे हो चुके हैं. मुश्किलें ऐसी हैं जो मामूली चीजों को नामुमकिन कैटेगरी में भेज चुकी हैं. विपक्षी दलों के साथ कांग्रेस नेतृत्व ब्रेकफास्ट, लंच या डिनर जो भी कर लेता हो, लेकिन खा-पी लेने के बाद सभी अपने अपने मोर्चे पर डट जाते हैं. न कांग्रेस कभी गठबंधन के लिए समझौते करने को तैयार होती है, न प्रधानमंत्री पद को लेकर.

राहुल गांधी के बयान से भी यही लगता है जैसे वो प्रधानमंत्री पद पर कांग्रेस के आरक्षण की बात कर रहे हों, लेकिन ये भूल जाते हैं विपक्षी खेमे में जातीय जनगणना की तर्ज पर कोई सर्वे कराया जाये तो कांग्रेस मीलों पीछे नजर आएगी.

ये ठीक है कि कांग्रेस नेताओं के बीच झगड़े खत्म करना एक बड़ा चैलेंज है - दिल्ली में भी और तमाम राज्यों में भी. दिल्ली में अब तक ज्यादातर सीनियर सोनिया के पक्ष में खड़े हो जाते हैं और बाकी जूनियरों की टीम तो राहुल की है ही - अब नयी चुनौती ये है कि प्रियंका की अपनी अलग ही टीम खड़ी होने लगी है. चिंतन शिविर में ही आचार्य प्रमोद कृष्णन ने प्रियंका गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने की मांग कर दी है.

जिस चैलेंज को कांग्रेस ने सबसे बड़ा बना रखा है, वो तो कोई समस्या ही नहीं होनी चाहिये - कांग्रेस के लिए एक पूर्णकालिक अध्यक्ष की सख्त जरूरत है. राहुल गांधी को संभल कर कदम बढ़ाने चाहिये क्योंकि हर तरफ कुल्हाड़ी कहीं पैर न पड़ जाये.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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