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Updated: 19 जुलाई, 2022 01:17 PM
निधिकान्त पाण्डेय
निधिकान्त पाण्डेय
  @1nidhikant
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वो कहते हैं ना...कि हर एक वोट की कीमत होती है! सही कहते हैं. एक-एक वोट की कीमत होती है, खासकर लोकसभा-राज्यसभा के सांसदों की और ये फिलहाल 700 है. मैं रूपये का कोई आंकड़ा नहीं बता रहा, इसे कहते हैं वोट वैल्यू. देश में इस समय राष्ट्रपति चुनाव की चर्चा है. वोट बैलट बॉक्स में बंद हो चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित लोकसभा-राज्यसभा के लगभग हर सांसद का 700 की वैल्यू वाला वोट दर्ज हो चुका है. राष्ट्रपति चुनाव में हर राज्य के विधायक भी वोटिंग करते हैं और वो कर भी चुके हैं लेकिन उनके वोट की वैल्यू 700 नहीं होती वो हर राज्य की अलग-अलग होती है. उसके बारे में भी आपसे बात होगी कि राष्ट्रपति चुनाव में कैसे और क्या गणित है बीजेपी नेतृत्व वाले NDA की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू और विपक्ष के साझा उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के बीच. कौन बनेगा राष्ट्रपति? इसका फैसला 21 जुलाई को होगा लेकिन दोनों उम्मीदवारों में से किसके जीतने के आसार ज्यादा हैं इस पर भी हम चर्चा करेंगे.

Draupadi Murmu, President, Yashwant Sinha, Narendra Modi, Congress, Vice President, Jagdeep Dhankhar, Margret Alvaमाना यही जा रहा है कि द्रौपदी मुर्मू देश की अगली राष्ट्रपति और जगदीप धनखड़ देश के अगले उप राष्ट्रपति बनेंगे

इसके अलावा देश के उपराष्ट्रपति का चुनाव भी होना है. भाजपा के नेतृत्व में एनडीए ने जगदीप धनखड़ को उम्मीदवार बनाया तो विपक्ष ने मार्गरेट अल्वा के नाम की घोषणा की है. अगस्त के पहले हफ्ते में चुनाव और उसी दिन जीतने वाले के नाम की घोषणा भी हो जाएगी. उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव की प्रक्रिया राष्ट्रपति चुनाव से अलग होती है. आइये इस बारे में चर्चा की जाए.

महामहिम रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई को समाप्त हो रहा है और देश के 15वें राष्ट्रपति के लिए वोटिंग 18 जुलाई को दर्ज हो गई, काउंटिंग 21 जुलाई को होगी और उसी दिन रिजल्ट भी घोषित कर दिया जायेगा. नए राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण होगा 25 जुलाई को. हमारा आपसे सवाल है कि क्या देश को पहली आदिवासी राष्ट्रपति मिलने का यश प्राप्त होगा?

21 जून को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा ने NDA की तरफ से द्रौपदी मुर्मू के नाम की घोषणा की थी. द्रौपदी मुर्मू आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं. विपक्ष के साझा उम्मेदवार यशवंत सिन्हा को हराकर अगर द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति चुनी गईं तो वे देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति हो सकती हैं जबकि ट्राइबल जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली प्रेजिडेंट यानी पहली आदिवासी राष्ट्रपति भी, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति चुनाव का गणित समझना भी जरूरी है.

राष्ट्रपति चुनाव में

आम जनता वोट नहीं डालती

लोकसभा-राज्यसभा के सदस्य वोटिंग करते हैं

सभी राज्यों के विधायक भी वोट डालते हैं

वोटों की संख्या नहीं उनकी वैल्यू मायने रखती है

वोटों की वैल्यू वाला पहलू समझने वाली बात है. इस साल यानी 2022 में राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदाताओं के वोट की कुल वैल्यू 10,86,431 है. अब आप सोचेंगे कि ये कैसे तय होता है? राष्ट्रपति को चुनने के लिए लोकसभा में 543 और राज्यसभा में 233 सदस्य हैं. इसके अलावा देश की सभी विधानसभाओं के 4120 सदस्य. इनमें दिल्ली और पुडुचेरी के विधायक भी शामिल हैं. यानी 4800 से ज्यादा सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में इलेक्टोरल कॉलेज के जरिए शामिल हुए.

अब यहां महत्वपूर्ण बात ये है कि लोकसभा और राज्यसभा के वोटों का वेटेज एक होता है लेकिन विधानसभा के सदस्यों का वेटेज अलग-अलग होता है. मोटे तौर पर कहें तो विधायकों के वोट का वेटेज राज्य की जनसंख्या के आधार पर तय होता है. जैसे-यूपी में 403 विधायकों में हर एक वोट की वैल्यू 208 है यानी कुल मूल्य 83,824 हुआ. जबकि तमिलनाडु और झारखंड के एक विधायक के वोट की वैल्यू 176 है.

महाराष्ट्र में 175, बिहार में 173, आंध्र प्रदेश में 159, गोवा में 20, मणिपुर में 18, मेघालय में 17, नगालैंड में 9, अरुणाचल प्रदेश व मिजोरम में 8-8 और सिक्किम में एक विधायक के वोट की वैल्यू 7 है. सांसदों के वोटों के वेटेज का हिसाब ये है कि पहले सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के वोटों का वेटेज जोड़ा जाता है. फिर उस सामूहिक वेटेज को राज्यसभा और लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग दिया जाता है. जो नंबर मिलता है, वही एक सांसद के वोट का वेटेज होता है.

राष्ट्रपति चुनाव में एक सांसद के वोट की वैल्यू 708 से घटकर 700 हो गई है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में अभी कोई विधानसभा नहीं है. अब द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति बनेंगी या यशवंत सिन्हा, ये वोट की संख्या नहीं, वोटों की वैल्यू का टोटल निर्धारित करेगा. दो मजेदार बातें बताता चलूं.. पहले वोटिंग के लिए कलरफुल पेन की बात. राष्ट्रपति चुनाव में चुनाव आयोग वोटिंग के लिए सांसदों और विधायकों को विशेष पेन देता है.

सांसद हरे तो विधायक गुलाबी रंग के पेन से अपनी वरीयता दर्ज करते हैं. लोकसभा-राज्यसभा सदस्य संसद में वोटिंग करते हैं जबकि सभी राज्यों के विधायक अपने-अपने राज्य की विधानसभाओं में वोट डालते हैं. वोटिंग के बाद काउंटिंग के लिए विधायकों के वोट और सभी मतपेटियों को फ्लाइट से दिल्ली लाया जाता है. यहां आती है एक और मजेदार बात. फ्लाइट में बैलेट बॉक्स को यात्रियों के रूप में बुक किया जाता है क्योंकि सुरक्षा कारणों से उन्हें बैगेज एरिया नहीं रखा जाता.

राष्ट्रपति चुनाव की गणित में NDA उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू का पलड़ा भारी लग रहा है. करीब साढ़े चार लाख वोट वैल्यू वाली BJP ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है. वहीं जिन मुख्य पार्टियों ने उन्हें समर्थन की घोषणा की है उनमें YSR कांग्रेस के करीब 45000 वोट, BJD के करीब 31000 वोट, जेडीयू के 14000 से ज्यादा वोट के अलावा मुर्मू के साथ शिवसेना के उद्धव गुट और शिंदे गुट, JD(S), BSP, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), अकाली दल और SBSP के 93 हजार वोट भी हैं. यानी कुल संख्या - 6 लाख 66 हजार को पार करती नजर आती है.

मुर्मु को अभी तक इतने दलों का समर्थन प्राप्त हो चुका है कि वोट प्रतिशत 60 से ज्यादा दिख रहा है. ऐसा लगता है कि द्रौपदी मुर्मू ही नई राष्ट्रपति बनने वाली हैं. ऐसे में उनका भी थोडा परिचय जान लेते हैं-

द्रौपदी मुर्मू का जीवन परिचय

जन्म 20 जून 1958 को ओडिशा में हुआ था

वे दिवंगत बिरंची नारायण टुडू की बेटी हैं

श्याम चरम मुर्मू से उनकी शादी हुई थी

वे मयूरभंज जिले के कुसुमी ब्लॉक के एक संथाल आदिवासी परिवार से आती हैं

रामा देवी विमेंस कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की

ओडिशा के राज्य सचिवालय में क्लर्क की नौकरी की

वे झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनीं

एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू ने जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. अपने शुरुआती दिनों में द्रौपदी मुर्मू को काफी संघर्ष करना पड़ा, झारखंड का राज्यपाल बनने के बाद मुर्मू ने एक इंटरव्यू में कहा था- 'मैंने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. मैंने अपने दो बेटों और अपने पति को खो दिया. मैं पूरी तरह से तबाह हो गयी थी. लेकिन भगवान ने मुझे लोगों की सेवा करते रहने की ताकत दी है'

लगता है द्रौपदी मुर्मू की इसी ताकत ने उन्हें कई पार्टियों के समर्थन के रूप में बैलट बॉक्स में वोट दिलवा दिए हैं जिनकी वैल्यू के रूप में उन्हें जीत मिलनी लगभग तय मानी जा रही है और शायद 21 जुलाई को उनके नाम की घोषणा होने की औपचारिकता मात्र बाकी रह गई है.

अब वक्त हो चला है उपराष्ट्रपति के चुनाव के बारे में बात करने का..

राजनीति में बीजेपी का अपने विरोधियों को चौंकाना कोई नई बात नहीं है. खासकर बीजेपी में मोदी-शाह युग की शुरुआत के बाद ऐसा कई बार देखा गया है कि बीजेपी अलाकमान ने अपने फैसलों से न सिर्फ विरोधियों को चौंकाने का काम किया है बल्कि कई बार तो उनकी पार्टी के नेता भी कुछ समझ नहीं पाते लेकिन पिछले कुछ सालों से यही बीजेपी की रणनीति रही है और बीजेपी ऐसे ही चल रही है.

राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए द्रौपदी मुर्मू के बाद बीजेपी ने उपराष्ट्रपति के नाम का ऐलान भी कर दिया है. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गए हैं, वहीं विपक्ष ने कांग्रेस नेता मार्गरेट अल्वा को उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया है. अल्वा को महिला मुद्दों पर काम करने के लिए जाना जाता है.

हम आपको दोनों उपराष्ट्रपति उम्मीदवारों के बारे में बताएंगे. ये भी बताएंगे कि क्यों उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए बीजेपी ने धनखड़ को ही उम्मीदवार बनाया. साथ ही उपराष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया भी समझाएंगे और बताएंगे की किस उम्मीदवार का गणित कितना मजबूत है.

पहले बात करते हैं राजस्थान से आने वाले जगदीप धनखड़ की...

जगदीप धनखड़ अगर उपराष्ट्रपति बनते हैं तो वो भैरो सिंह शेखावत के बाद राजस्थान से उपराष्ट्रपति बनने वाले दूसरे व्यक्ति होंगे. एनडीए दलों के पास बहुमत को देखते हुए धनखड़ का अगला उपराष्ट्रपति बनना तय माना जा रहा है, अगर ऐसा होता है तो 75 साल के संसदीय इतिहास में पहली बार होगा, जब संसद के दोनों सदन राज्यसभा और लोकसभा की अध्यक्षता राजस्थान के नेता करेंगे. अभी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला भी राजस्थान से ही आते हैं.

कौन हैं जगदीप धनखड़ ?

बीजेपी संसदीय दल की बैठक के बाद पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उनके नाम का ऐलान किया. जेपी नड्डा ने कहा कि 'किसान पुत्र' जगदीप धनखड़ एनडीए की ओर से उम्मीदवार होंगे. इसके बाद देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी धनखड़ की तारीफ करते हुए लिखा- ‘किसान पुत्र जगदीप धनखड़ अपनी विनम्रता के लिए जाने जाते हैं. वह संविधान के जानकार हैं. उन्हें विधायिका के कार्यों का पूरा ज्ञान है. वह राज्यपाल हैं. उन्होंने हमेशा किसानों, युवाओं, महिलाओं और वंचितों की भलाई के लिए काम किया है. खुशी है कि वह हमारे उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं. मुझे विश्वास है कि वह राज्यसभा के सभापति के तौर पर देश को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से सदन की कार्यवाही का मार्गदर्शन करेंगे.'

जेपी नड्डा और पीएम मोदी की बातों से ये तो आपको पता चल ही गया होगा कि जगदीप धनखड़ एक किसान पुत्र हैं. साथ ही विनम्रता भी उनकी एक पहचान है. जगदीप धनखड़, राजस्थान की जाट बिरादरी से आते हैं. राजस्थान में जाटों को आरक्षण दिलाने में जगदीप धनखड़ का बड़ा हाथ रहा है. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनके टकराव से भी हाल में उनको एक खास पहचान मिली है.

ममता बनर्जी ने एक बार धनखड़ पर निशाने साधते हुए कहा था कि राजभवन में एक राजा बैठते हैं. 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के कैथाना गांव में जन्मे जगदीप धनखड़ ने शुरुआती पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल से की. बाद में जगदीप धनखड़ ने सैनिक स्कूल की प्रवेश परीक्षा पास की. स्कूली शिक्षा के बाद जगदीप धनखड़ ने राजस्थान के महाराजा कॉलेज से ग्रेजुएशन किया.

साल 1978 में उन्होंने जयपुर विश्वविद्यालय में एलएलबी कोर्स में एडमिशन लिया. कानून की डिग्री लेने के लेने बाद जगदीप धनखड़ ने वकालत शुरू कर दी और साल 1990 आते-आते राजस्थान हाई कोर्ट में सीनियर एडवोकेट का दर्जा हासिल कर लिया. सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश के कई हाईकोर्ट में धनखड़ वकालत करने लगे.

1989 में जगदीप धनखड़ सक्रिय राजनीति में आए.

पहली बार झुंझुनू लोकसभा क्षेत्र से भाजपा से सांसद निर्वाचित हुए.

1990 में वे देश के संसदीय कार्य राज्यमंत्री बने.

1990 में ही अजमेर जिले की किशनगढ़ सीट से वे विधायक भी निर्वाचित हुए.

2019 में जगदीप धनखड़ को भाजपा ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया था.

जाट समाज से आने वाले धनखड़ के दो और भाई हैं, जिनमें से एक कांग्रेस के नेता हैं, जबकि दूसरे बिजनेसमैन. आपने सूत्रों के बारे में तो सुना ही होगा. आपको पता है कि ये सूत्र क्या होते हैं? ये जो हम अक्सर अखबारों में और टीवी न्यूज में पढ़ते-सुनते रहते हैं कि सूत्रों के हवालों से फलाने ने ये कहा.. फलाना मुख्यमंत्री बनने वाला है.. आदि-इत्यादि..

कुछ साल पहले तक ये सूत्रों की जानकारी सही पाई जाती थी.. लेकिन मोदी-शाह काल में सूत्रों का अस्तित्व मिटने के कगार पर है क्योंकि हर बार सूत्रों की जानकारी गलत ही साबित होती है. दरअसल सूत्रों की चर्चा मैं इसलिए करने लगा कि कोई सूत्र ये कह रहा था कि मुख्तार अब्बास नकवी को उपराष्ट्रपति बनाया जा सकता है.. तो कोई शिवराज सिंह चौहान को उपराष्ट्रपति बनाने की बात कर रहा था.

सूत्रों के मुताबिक तो किसी सिख को भी उपराष्ट्रपति बनाने की बात हो रही थी और तर्क ये दिया जा रहा था कि कोई सिख अब तक उपराष्ट्रपति नहीं बना है इसलिए मोदी सरकार ये फैसला लेकर सबको चौंका सकती है.. लेकिन सब गलत साबित हुए और नाम सामने आ गया जगदीप धनखड़ का.

कैसे जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति पद के लिए बीजेपी की पहली पसंद बन गए?

बीजेपी के इस फैसले से क्या राजस्थान के आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी को फायदा दिख रहा है?

इस फैसले के बाद क्या राजस्थान में वसुंधरा राजे का दबदबा खत्म होने जा रहा है?

दरअसल राजस्थान के जाट समुदाय से आने वाले जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने जाटलैंड और राजस्थान की राजनीति को साधने का काम किया है. भाजपा का ये फैसला सिर्फ आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर नहीं बल्कि बीजेपी की भावी सोच को भी दिखाता है. राजस्थान के शेखावटी के झुंझुनू के जाट बहुल क्षेत्र से आने वाले धनखड़ से पार्टी को राज्य के सामाजिक समीकरणों में काफी मदद मिलेगी.

राजस्थान के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया भी जाट समुदाय से आते हैं. राजस्थान की राजनीति में चार समुदाय जाट, गुर्जर, राजपूत और मीणा काफी अहमियत रखते हैं. इसके अलावा पिछड़े व दलित भी समीकरणों को बनाते-बिगाड़ते रहते हैं. कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद पिछड़ा वर्ग से आते हैं और उसके दूसरे नंबर के नेता सचिन पायलट गुर्जर समुदाय से हैं,

ऐसे में भाजपा का भावी समीकरण जाट, मीणा और राजपूत के साथ अन्य वर्गों को जोड़ने को लेकर है. देश में कांग्रेस की इस समय केवल दो ही राज्यों में सरकारें हैं - राजस्थान और छत्तीसगढ़. अशोक गहलोत को कांग्रेस में एक ऐसे नेता के तौर पर जाना जाता है जो किसी भी मुश्किल परिस्थिति से कांग्रेस को बाहर निकाल लाते हैं. इसलिए भाजपा के लिए राजस्थान में अशोक गहलोत को मात देना एक चुनौती की तरह है.

धनखड़ के कद को बढ़ाने से भाजपा को राजस्थान में वसुंधरा राजे पर भी लगाम कसने का मौका मिलेगा. वैसे भी राजस्थान में वसुंधरा राजे, बीजेपी के लिए गहलोत से बड़ी चुनौती मानी जाती हैं, खासकर मोदी और शाह के आने के बाद. भाजपा नहीं चाहती कि राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे का मतलब बीजेपी हो क्योंकि राजस्थान की राजनीति में कई सालों से तो ऐसा ही रहा है.

जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करने के बाद राजस्थान में भाजपा की राजनीति में कितना बदलाव आता है और इससे भाजपा को कितना फायदा होता है ये तो समय ही बताएगा. फिलहाल चर्चा विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा की.

कौन हैं मार्गरेट अल्वा ?

मार्गरेट अल्वा का जन्म 1942 में मैंगलोर में हुआ था. इसके बाद ही मद्रास प्रेसिडेंसी की अलग-अलग जगहों पर पली-बढ़ीं. उनके पिता इंडियन सिविल सर्विस में थे. उनकी शादी अल्वा परिवार में हुई थी. उनके सास-ससुर दोनों सांसद थे. इस परिवार में ही उन्होंने राजनीति के गुर सीखे.

मार्गरेट अल्वा गुजरात, गोवा, राजस्थान और उत्तराखंड की राज्यपाल भी रह चुकी हैं.

मार्गरेट अल्वा चार बार राज्यसभा सांसद रह चुकी हैं.

1974 से 1992 के बीच वे चार बार ऊपरी सदन की सदस्य रहीं.

साल 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार में उन्हें कार्मिक मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का पद मिला था.

लोकसभा के लिए वे पहली बार 1999 में कर्नाटक की कनारा सीट से चुनी गई थीं.

1986 में निर्वाचित निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण के लिए पहल करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी.

मार्गरेट अल्वा, 1986 में कांग्रेस की राजीव गांधी सरकार में महिला और बाल विकास मामलों की मंत्री थीं. उसी दौरान उन्होंने पंचायत से लेकर संसद यानी सभी निर्वाचित निकायों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का कानून लाने की पहल की थी.

मार्गरेट अल्वा पहली बार इंदिरा गांधी के शासन के दौरान चर्चा में आईं. उस दौरान वह कांग्रेस पार्टी में कई पदों पर रहीं. वे वायोलेट अल्वा और जोएचिम अल्वा की पुत्रवधू हैं. सास-ससुर दोनों सांसद थे. मार्गरेट अल्वा 42 साल की उम्र में ही मंत्री बन गई थीं, जो उन दिनों एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी. 2016 में मार्गरेट अल्वा ने अपनी बायोग्राफी 'करेज एंड कमिटमेंट' में लिखा था – ‘राजीव गांधी जब शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अध्यादेश लाने जा रहे थे, तब मैंने उन्हें मौलवियों के सामने नहीं झुकने को कहा था. हालांकि, उन्होंने मेरा सुझाव मानने से मना कर दिया था.’

2008 में मार्गरेट अल्वा ने अपनी ही पार्टी कांग्रेस पर टिकटों की खरीद फरोख्त का आरोप लगाया था. इसके बाद उनको पार्टी से बाहर कर दिया गया. इसके अलावा अपने बेटे के लिए भी टिकट मांगा था और टिकट नहीं मिलने पर एक बार तो इन्होंने पार्टी ही छोड़ दी थी. मार्गरेट अल्वा दावेदारी मजबूत हो सकती है लेकिन उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा उम्मीदवार जगदीप धनखड़ का ही पलड़ा भारी है.. कैसे, चलिए आपको बताते हैं.

संविधान के मुताबिक, उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा हो जाने के 60 दिनों के भीतर चुनाव कराना ज़रूरी होता है. इसके लिए चुनाव आयोग एक निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करता है जो किसी एक सदन का सेक्रेटरी जनरल होता है. निर्वाचन अधिकारी चुनाव को लेकर पब्लिक नोट जारी करता है और उम्मीदवारों से नामांकन मंगवाता है.

संविधान के अनुच्छेद 63 में कहा गया है कि 'भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा'. अनुच्छेद 64 के तहत, उपराष्ट्रपति "राज्यों की परिषद का पदेन अध्यक्ष होगा". वहीं संविधान के अनुच्छेद 65 में कहा गया है कि 'राष्ट्रपति की मृत्यु, इस्तीफे या हटाने की स्थिति में उपराष्ट्रपति उस तारीख तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा जब तक कि नए राष्ट्रपति की नियुक्ति नहीं की जाती.'

उपराष्ट्रपति का चुनाव

अनुच्छेद 66 उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया को निर्धारित करता है. उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक मंडल यानी इलेक्टोरल कॉलेज के जरिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के जरिए होता है. संसद के दोनों सदनों राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य वोटिंग में हिस्सा लेते हैं. हर सदस्य केवल एक वोट ही डाल सकता है.

आपको बता दें कि उपराष्ट्रपति के चुनाव में दोनों सदनों के लिए मनोनीत सांसद भी वोटिंग कर सकते हैं. इस प्रकार से राज्यसभा चुने हुए सदस्य (233) और मनोनित सदस्य (12), वहीं लोकसभा के चुने हुए सदस्य (543) और मनोनीत सदस्य (2) दोनों सदनों के कुल 790 निर्वाचक हिस्सा लेते हैं. जबकि राष्ट्रपति चुनाव में ये मनोनीत सदस्य हिस्सा नहीं लेते.

लोकसभा और राज्यसभा में भाजपा के 394 सांसद हैं. इसके अलावा NDA उन्हें समर्थन करने वाले सदस्य मिला लें तो धनखड़ को हराना मुश्किल होगा इसीलिए ये तय माना जा रहा है कि देश के अगले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ही बनेंगे.

कब है उपराष्ट्रपति चुनाव ?

उपराष्ट्रपति चुनने के लिए वोटिंग अगले महीने 6 अगस्त को होगी. देश में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का पद काफी अहम होता है लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि सत्ता में रहने वाली पार्टियां अपने राजनीतिक नफे-नुकसान को देखते हुए इन पदों पर लोगों की उम्मीदवारी तय करते हैं. हालिया स्थिति और पार्टियों का समर्थन तो यही दर्शाता है कि नए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों सत्ता पक्ष के हो सकते हैं यानी द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति और जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति बन सकते हैं. 

लेखक

निधिकान्त पाण्डेय निधिकान्त पाण्डेय @1nidhikant

लेखक आजतक डिजिटल में पत्रकार हैं.

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