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Updated: 13 जनवरी, 2020 01:58 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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Police Commissioner System in Noida and Lucknow: उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार है जबकि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की - लेकिन दोनों ही राज्यों में पुलिस कमिश्नर सिस्टम (Police Commissioner System) लागू करने की तैयारी चल रही है. मुमकिन है, यूपी में CM योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ये काम पहले कर लें - क्योंकि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ इस बारे में 26 जनवरी को ऐलान कर सकते हैं. सुना है कमलनाथ पिछले 15 अगस्त को ही ऐसा करने वाले थे, लेकिन संभव न हो सका. इस सिलसिले में IPS एसोसिएशन और DGP की मुख्यमंत्री से विस्तार से चर्चा हो चुकी है.

यूपी में पुलिस कमिश्नर सिस्टम की जरूरत तात्कालिक तौर पर नागरिकता कानून को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान कुछ ज्यादा ही महसूस की गयी है - लेकिन घूम फिर कर सवाल वहीं पहुंच जाता है कि ये सिस्टम लागू होने से हासिल क्या होने वाला है - मानना तो 'माननीय' को ही पड़ेगा? फिलहाल तो नोएडा के पहले पुलिस कमिश्‍नर के बतौर आलोक सिंह के नाम का एलान हो चुका है.

कुछ व्यावहारिक बदलाव भी आएंगे क्या?

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान यूपी में जान और माल का काफी नुकसान हुआ है. यही वजह है कि कानून व्यवस्था और लोगों के खिलाफ पुलिस एक्शन को लेकर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विरोधियों के निशाने पर आ गये हैं. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी तो लगातार तूफानी दौरे पर नजर आ रही हैं - लखनऊ और मुजफ्फरनगर ही नहीं वाराणसी तक हो आयी हैं. ये बात अलग है कि कोटा के अस्पताल में बच्चों की मौत के बाद पीड़ित परिवारों से न मिलने को लेकर वो भी मायावती और बीजेपी नेताओं के निशाने पर हैं.

IPS और IAS अफसरों के बीच टकराव की समस्या अक्सर देखी गयी है - और कानून व्यवस्था लागू करने में भी कई बार ये चीज आड़े आती है. यूपी के अफसरों के हवाले से आयी मीडिया रिपोर्ट से मालूम होता है कि कई जगह हालात बेकाबू इसलिए हो गये क्योंकि एहतियाती कदम वक्त रहते नहीं उठाये जा सके. रिपोर्ट बताती हैं कि ऐसा पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के बीच आपसी तालमेल की कमी के चलते हुआ है - खास कर धारा 144 लागू करने को लेकर. अफसरों का ये भी कहना है कि कई जगह तो पुलिस कप्तान और जिलाधिकारी के बीच ईगो-क्लैश के चलते भी ऐसा हुआ है. यूपी में पुलिस कमिश्नर सिस्टम पर फौरी सहमति बनने का ये बहुत बड़ा आधार बना है.

ये अफसरों की तकरार और असहमति का ही नतीजा रहा है कि यूपी में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने से जुड़े प्रस्ताव का ड्राफ्ट 14 बार बदलना पड़ा. तमाम आपत्तियों के निस्तारण के बाद आखिरकार 14वें ड्राफ्ट पर सहमति बन पायी है, हालांकि - सारे पेंच खत्म हो गये हों ऐसा नहीं है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गहरी दिलचस्पी की वजह से प्रशासनिक सेवा के अधिकारी इसे लागू करने के लिए तैयार तो हुए हैं, राजस्व वसूली का अधिकार छोड़ने को वे तैयार नहीं हैं. लिहाजा ये IAS अफसरों के पास ही रहेगा.

yogi adityanath, dgp op singhनाम तो बदल जाएगा, हालात भी बदलेंगे क्या?

पुलिस कमिश्नर को इस सिस्टम में जो अधिकार मिलते हैं, उनमें धारा 144 लगाने का अधिकार काफी अहम है. विरोध प्रदर्शनों और जूलूस वगैरह निकालने के वक्त ये एहतियाती तौर पर लगा दिया जाता है. यूपी में हुए हाल के बवाल में पुलिस अफसरों के पास ये अधिकार न होने का काफी नुकसान माना गया है.

यूपी में कमिश्नर सिस्टम लागू हो जाने के बाद धारा-144 लगाने, कर्फ्यू लगाने, 151 में गिरफ्तार करने, 107/16 में चालान करने जैसे अधिकार सीधे पुलिस के पास रहेंगे. ऐसी चीजों के लिए पुलिस अफसरों को बार बार प्रशासनिक अधिकारियों का मुंह नहीं देखना होगा.

खबर है कि यूपी में पुलिस कमिश्नर सिस्टम की शुरुआत नोएडा और लखनऊ से होने जा रही है - वैसे भी नोएडा यानी गौतम बुद्ध नगर और लखनऊ पुलिस ही फिलहाल चर्चा में सबसे ऊपर है. नोएडा के एसएसपी को सस्पेंड किया गया है - और लखनऊ के एसएसपी का गाजियाबाद ट्रांसफर हो गया है, लिहाजा नोएडा और लखनऊ दोनों को नये कप्तान की सबसे पहले जरूरत भी है.

पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने में जिन CAA विरोध प्रदर्शनों को लेकर पैदा हुई स्थिति आधार बनी है - वो सब यूपी से पहले दिल्ली में शुरू हुआ. थोड़ा पीछे लौटें तो NCR के हालात एक जैसे तो बिलकुल नहीं लगते. नोएडा और गाजियाबाद दोनों ही दिल्ली से बिलकुल सटे हुए हैं - फिर भी हालात अलग नजर आये.

दिल्ली में कमिश्नर सिस्टम है लेकिन जामिया हिंसा से शुरू हुए बवाल जेएनयू कैंपस तक पहुंचे और बिगड़ते ही गये हैं. इंटरनेट दिल्ली में बंद किये गये थे और गाजियाबाद में भी एक बार से ज्यादा बार ऐसा हुआ - लेकिन नोएडा में एक बार भी नहीं. धारा 144 जरूर लगी लेकिन नोएडा में नेट पर पाबंदी तो नहीं ही लगी. दिल्ली में पुलिस कमिश्नर सिस्टम होने पर ही वही हाल और नोएडा में न होने पर भी वैसा कुछ न हुआ.

सवाल ये है कि पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होने के बाद क्या वास्तव में हकीकत में भी कोई बदलाव देखने को मिलेगा - या फिर जैसे यूपी में जगहों के नाम बदले गये वैसे ही पुलिस विभाग में कुछ पदों के नाम बदल जाएंगे.

कानून व्यवस्था में पहली बाधा राजनीतिक है, नौकरशाही बाद में

यूपी में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होने से बदलाव की संभावनाओं पर बीती घटनाओं जैसे आशंका के बादल मंडराने लगते हैं. पुलिसवाले भी वही हैं और राजनीतिक नेतृत्व भी वही है, फिर भला ड्रेस बदल लेने से कितना फर्क आएगा - सिर्फ दो वाकयों के जरिये वस्तुस्थिति को आसानी से समझा जा सकता है. एक, उन्नाव गैंग रेप में उम्रकैद के सजायाफ्ता कुलदीप सिंह सेंगर का केस और दूसरा केंद्रीय मंत्री रहे बीजेपी नेता स्वामी चिंमयानंद का मामला.

जो विधायक रेप में मामले में आजीवन कारावास की सजा पाता हो, क्या पुलिस को उसके अपराध की भनक तक नहीं लगी होगी - लेकिन यूपी पुलिस के आला अफसर उसे 'माननीय विधायक जी' कह कर संबोधित करते रहे. ये तो यही साबित कर रहा है कि पुलिस जानबूझ कर सब कुछ छिपा रही थी - और गिरफ्तारी भी तभी संभव हो पायी जब हाई कोर्ट ने फटकार लगायी. आखिर कुलदीप सेंगर को सजा तो उन्हीं सबूतों के आधार पर मिली होगी जो सबसे पहले यूपी पुलिस को मिले होंगे.

स्वामी चिन्मयानंद का केस भी मिलता जुलता ही है. जब तक अदालत का डंडा नहीं चला पुलिस पीड़ित के ही पीछे लगी रही. पहले तो पीड़ित छात्रा से ही घंटों पूछताछ करती रही. ये मामला भी अगर अदालत तक नहीं पहुंचा होता तो रफा-दफा ही कर दिया जाता. उन्नाव केस और ये दोनों ही इस बात के सबसे बड़े मिसाल हैं कि कैसे पुलिस बाहरी हस्तक्षेप की वजह से अपना काम पेशेवराने तरीके से नहीं कर पा रही है.

हो सकता है नयी पैकेजिंग में फील थोड़ी बदल जाये जैसे जिलों के नाम बदलने के बाद रंग रोगन होने से कुछ साइनबोर्ड चमकने लगे थे. पुलिस विभाग में भी कुछ दफ्तरों में ऐसा देखने को मिल सकता है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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