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Updated: 25 अप्रिल, 2019 08:24 PM
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गांधीनगर से अमित शाह के नामांकन में एक ही कमी खल रही थी - सीन से नीतीश कुमार का नदारद होना. 26 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नामांकन में ऐसी कोई कसर बाकी नहीं रहेगी, अभी तक तो ऐसा ही आश्वासन है. नीतीश कुमार की कमी तब नहीं लगती अगर उद्धव ठाकरे, प्रकाश सिंह बादल और राम विलास पासवान जैसे नेता नहीं पहुंचे होते. वाराणसी में एनडीए के इन सभी दिग्गजों के साथ साथ नीतीश कुमार की मौजूदगी गठबंधन की एकजुटता का प्रतीक मानी जाएगी.

वाराणसी से दूसरी बार नामांकन की पूर्वसंध्या पर नरेंद्र मोदी ने बीएचयू गेट लंका से दशाश्वमेध घाट तक रोड शो किया. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने इसी रास्ते रोड शो हुआ था - और उसके बाद काशी विश्वनाथ मंदिर जाकर मोदी ने दर्शन किया था. इस बार तो दशाश्वमेध घाट से मंदिर तक विश्वनाथ कॉरिडोर भी बन चुका है जिसका प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ ही दिन पहले उद्घाटन भी किया था.

करीब महीने भर से वाराणसी से कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के चुनाव लड़ने की खूब चर्चा रही, लेकिन मोदी के नामांकन के मुहूर्त से 24 घंटे पहले ही कांग्रेस फिर एक बार अजय राय को टिकट देने की घोषणा कर दी - जता दिया कि पार्टी का इरादा क्या है.

बीजेपी के स्लोगन 'फिर एक बार मोदी सरकार' का कितना असर होता है, ये तो 23 मई को ही पता चलेगा - लेकिन बनारस के लोगों में मोदी को लेकर जो जोश नजर आ रहा है उससे ऐसा तो लग ही रहा है कि 'फिर एक बार मोदी' की जीत पक्की तो है ही.

'फिर एक बार मोदी...'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए फिर एक बार बनरास सड़क पर उमड़ पड़ा. पांच साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर काशीवासियों के बीच उनके वोट रूपी आशीर्वाद के लिए पहुंचे हैं.

narendra modiमोदी को संसद भेजने के लिए सड़क पर उतरा बनारस!

2014 में नरेंद्र मोदी को न तो किसी ने भेजा था और न ही वो खुद से पहुंचे थे, मोदी को तो मां गंगा ने ही बुलाया था. 2019 में तो लगता है गंगा मैया ने अकेले नहीं, अपितु पूरे बनारस ने मोदी के लिए पलक-पांवड़े बिछा रखे हैं - रोड शो के पूरे रास्ते ऊपर से बरसती गुलाब की पंखुड़ियां अपनेआप में सबूत हैं. दो साल पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे ही रोड शो किया था - ठीक उन्हीं मोहल्लों से गुजरते हुए. हाथ हिलाते, मुस्कुराते, अच्चे दिनों की याद दिलाते. फर्क सिर्फ ये था कि फूलों का रंग बदला हुआ था. पहले पीले फूल थे, इस बार गुलाबी.

NDA की एकजुटता का संदेश

टीडीपी नेता और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के एनडीए छोड़ देने के बाद गठबंधन में बड़े बिखराव की आशंका जतायी जा रही थी. अमित शाह के संपर्क फॉर समर्थन मुहिम के तहत गठबंधन के साथियों से घर घर जाकर मिलना, उनकी बात और मांग मानने के लिए बड़े समझौते के लिए ही तैयार हो जाना रंग दिखा रहा है. एनडीए कदम कदम पर एकजुट नजर आ रहा है. गठबंधन की एकजुटता के प्रदर्शन के लिए खास तरीके भी अपनाये जा रहे हैं. गठबंधन के नेताओं का एक साथ प्रेस कांफ्रेस कर उम्मीदवारों की घोषणा करना. बड़े नेताओं के नामांकन के मौके पर पहुंच कर एक दूसरे को समर्थन देना. प्रधानमंत्री मोदी के नामांकन के मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भी शामिल होने की संभावना है. बीजेपी के तमाम बड़े दिग्गज नेताओं ने पहले से ही बनारस में डेरा डाल रखा है.

प्रधानमंत्री मोदी के नामांकन का मौका सिर्फ वाराणसी ही नहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों के अलावा बिहार तक असर डालने वाला है. पूर्वी यूपी का वही इलाका जहां कांग्रेस को मजबूत करने की जिम्मेदारी प्रियंका गांधी वाड्रा पर सौंपी गयी है.

स्पीडब्रेकर तो है लेकिन ट्रैफिक नहीं

प्रधानमंत्री मोदी वाराणसी की जिस सड़क से संसद तक का सफर तय करने जा रहे हैं उस पर स्पीडब्रेकर तो हैं, लेकिन ट्रैफिक ना के बराबर है. हो सकता है मैदान में प्रियंका गांधी वाड्रा होतीं तो मोदी के सामने चुनौती 2014 के अरविंद केजरीवाल जैसी होती, लेकिन अब तो जैसे मैदान ही साफ है. अब तक के अपडेट के हिसाब से वाराणसी में मोदी को चुनौती देने वालों की फेहरिस्त तो लंबी है, लेकिन उनकी वैल्यू हेड-काउंट से ज्यादा नहीं लगती. गठबंधन का उम्मीदवार होने के नाते शालिनी यादव बाकियों के मुकाबले कुछ ज्यादा वोट जुटा सकती हैं. वैसे यही शालिनी यादव उसी वाराणसी से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में बीजेपी से मेयर का चुनाव हार चुकी हैं. गठबंधन की ओर से चुनाव लड़ने जा रहीं शालिनी यादव समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार हैं. अगर 2014 में समाजवादी पार्टी और बीएसपी के वोटों को मिला दें तो कुल 1,05, 866 वोट मिले थे. दिलचस्प बात ये है कि 2014 में बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले विजय प्रकाश जायसवाल अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. 2009 में नतीजे बिलकुल उल्टा रहे. बीजेपी उम्मीदवार मुरली मनोहर जोशी को जितने वोट मिले थे वो सपा और बसपा के वोटों से कम थे. 2009 में सपा और बसपा उम्मीदवारों का कुल वोट 3,09,785 रहा, जबकि मुरली मनोहर जोशी को 2,03,122 ही वोट मिल पाये थे. 2014 में मोदी को 5,81,022 वोट मिले थे जबकि दूसरे नंबर पर रहे अरविंद केजरीवाल को 2,09,238 वोट मिले थे.

जहां तक अजय राय का सवाल है तो वो भी कभी खास करामात नहीं दिखा सके हैं. 2014 में अजय राय को कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 75,614 वोट मिले थे. 2009 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर उतरे अजय राय को 1,23,874 वोट मिले थे. माना जाता है कि 2014 में मुख्तार अंसारी ने अपने समर्थकों को अजय राय को वोट देने के लिए कह दिया था. हालांकि, 2009 में अजय राय बीएसपी उम्मीदवार से पिछड़ गये थे. तब तो यहां तक कहा गया था कि जब लगा कि मुख्तार जीत सकते हैं तो अजय राय ने भी अपने समर्थकों को बीजेपी उम्मीदवार मुरली मनोहर जोशी को वोट देने के लिए कह दिया था. इस बार भी बनारस में मुस्लिम वोटों पर नजर जरूर रहेगी. देखना होगा कि मुस्लिम वोट अजय राय को मिलते हैं या फिर शालिनी यादव के खाते में जाते हैं.

2017 के विधानसभा चुनाव के वक्त भी मोदी ने ऐसा ही रोड शो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सलाह पर किया था क्योंकि अंदेशा था कि टिकट बंटवारे को लेकर कार्यकर्ताओं की नाराजगी बीजेपी को बहुत भारी पड़ सकती थी. मोदी के रोड शो ने सारी आशंकाएं खत्म कर दीं - और बीजेपी भारी बहुमत के साथ जीत कर अपना वनवास खत्म करते हुए यूपी में सरकार बनाने में कामयाब रही. मोदी के ताजा रोड शो का मकसद भी बनारस सहित आस पास के इलाकों में समर्थकों को फिर से एक खास मैसेज देना ही है - 'फिर एक बार मोदी सरकार.'

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