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Updated: 15 अगस्त, 2019 07:56 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से NDA सरकार का फ्यूचर प्लान सामने रख दिया है - और सबको साफ कर दिया है कि उज्ज्वल भविष्य के लिए मोदी सरकार 2.0 क्या क्या करने जा रही है. हालांकि, ये समझना थोड़ा मुश्किल हो रहा है कि ये फ्यूचर प्लान कितने साल का है. कुछ कुछ वैसे ही जैसे बही-एक एक साल के लिए था और प्रधानमंत्री के बजट-भाषण आने वाले कई बरसों के लिए.

मोदी सरकार 2.0 आने वाले समय में क्या क्या करने जा रही है, इस बारे में कुछ बातें तो मोदी ने खुद सीधे सीधे बता दी हैं - और कुछ ऐसी भी हैं जिन्हें साफ साफ कही गयी बातों के जरिये समझने की कोशिश की जा सकती है.

2024 तक 'एक देश, एक चुनाव' लागू ही समझा जाये!

जम्मू-कश्मीर पर तो ज्यादा कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं रही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारी बातें 8 अगस्त को 8 बजे राष्ट्र के नाम संदेश में ही कह दिया था. मुश्किल ये है कि जो बात सरकार की बड़ी उपलब्धियों की सूची में पहले नंबर पर हो उसके जिक्र के बगैर बात आगे बढ़े तो कैसे भला.

जब प्रधानमंत्री मोदी ने वन नेशन, वन कॉन्स्टि्यूशन की बात की, तो आशय तो जम्मू-कश्मीर को लेकर धारा 370 खत्म किये जाने से ही रहा. आखिर ये मोदी सरकार के उसी फैसले की बदौलत तो मुमकिन भी हो पाया है.

1 जुलाई 2017 को आधी रात को संसद में GST को लागू करने की घोषणा हुई. 2019 के आम चुनाव से पहले ये पहला मौका रहा जब विपक्ष बिखरा नजर आया. सोनिया गांधी ने कांग्रेस के बैनर तले तमाम विपक्षी दलों को सरकार का विरोध कर इस कार्यक्रम के बहिष्कार की कोशिश की थी. जब तक सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तरफ से कांग्रेस नेता विपक्षी दलों के नेताओं से संपर्क करते, बहुत देर हो चुकी थी. सभी से एक ही जवाब सुनने को मिला - अब कोई फायदा नहीं.

प्रधानमंत्री मोदी ने तीन साल बाद एक बार फिर जीएसटी का जोर देकर जिक्र किया. मोदी ने कहा, "हमने जीएसटी के माध्यम से 'वन नेशन वन टैक्स' के सपने को साकार किया. उसी प्रकार पिछले दिनों ऊर्जा के क्षेत्र में 'वन नेशन वन ग्रिड' का काम भी सफलतापूर्वक संपन्न किया... हमने 'वन नेशन वन मोबिलिटी कार्डट की व्यवस्था विकसित की - इसी तरह से अब 'एक देश एक चुनाव' की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है."

न कयास लगाने की आवश्यकता है, न दिमाग लगाने की जरूरत है - सब कुछ साफ साफ नजर आने लगा है. जिस तरीके से मोदी सरकार के फ्लोर मैनेजरों ने तीन तलाक और धारा 370 पर अपनी कुशलता का प्रदर्शन किया है, देश में कम से कम विधानसभाओं और आम चुनाव को एक ही साथ कराने का रास्ता भी काफी हद तक साफ सुथरा नजर आने लगा है - क्योंकि बहुमत हर मुश्किल आसान कर देती है.

modi hints from red fortमोदी चाहते हैं आगे से देश में एक चुनाव हो, एक ही पार्टी हो और एक ही नेता भी!

2018 में तो कई बार लगा कि आम चुनाव के साथ बहुत सारे राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव कराये जा सकते हैं, ऐसा हो नहीं पाया. अगस्त, 2018 में विधि आयोग ने लोक सभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश भी की थी. दलील ये रही कि जनता का पैसा बचाया जाये. इसे लेकर एक मसौदा कानून मंत्रालय को भी सौंपा गया था. चुनाव आयोग भी आखिर में राजी हो गया था, बस ये कहते हुए कि सरकार रास्ते के कानूनी पत्थर हटाने का इंतजाम कर ले. बात अंतिम दौर में फंस गयी क्योंकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में ये संभव नहीं था. ये पिछले साल की बात रही. अब ऐसा नहीं है. सरकार इतनी मजबूत हो चुकी है कि संविधान संशोधन भी काफी आसान लगने लगा है.

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से लगातार छठी बार देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतना संकेत तो दे ही दिया है कि चुनावों में जो बातें चल रही थीं, सारे जुमले नहीं थे - 'मोदी है तो मुमकिन है'. तीन तलाक से लेकर धारा 370 खत्म किये जाने तक, एक ही बात समझ में आ रही है - मैंडेट है तो सरकार के लिए सब कुछ मुमकिन है.

फिर तो 2024 में आम चुनाव के साथ साथ तमाम राज्यों की विधानसभा के चुनाव कराये जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.

नहीं, देश में '2 पार्टी सिस्टम' नहीं चलेगा?

कुछ दिनों से एक चर्चा चलने लगी है कि पश्चिमी देशों की तरह भारतीय राजनीति में भी 2 पार्टी सिस्टम अघोषित तौर पर जगह बना चुका है. ऐसे में क्षेत्रीय दलों के लिए तो अस्तित्व का ही खतरा पैदा हो गया है. ऐसे में जबकि देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल के सामने अस्तित्व बचाने का दबाव हो, क्षेत्रीय दलों के बारे में भला क्या कहा जा सकता है. 2019 के आम चुनाव में क्षेत्रीय दलों को मजबूत करने का प्रस्ताव भी आया था. चुनाव से पहले विपक्षी दलों की शुरुआती बातचीत में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी की ओर से ही ये सुझाव आया था कि सभी पार्टियां मिल कर चुनाव लड़ें और आपसी समझ ऐसी हो कि जो जहां मजबूत हो उसी का उम्मीदवार हो. चुनाव आते आते एक तरफ बीजेपी और एक तरफ सारा विपक्ष हो गया लेकिन पूरी तरह बिखरा हुआ. अभी तक तो कांग्रेस निश्चित तौर पर देश में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है, लेकिन आने वाले दिनों में कौन पीछे छोड़ दे कहना मुश्किल है. ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस से लेकर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी तक होड़ लगाये हुए है.

2014 से पहले बीजेपी ने कांग्रेस मुक्त अभियान शुरू किया था और 2019 के बाद भारतीय राजनीति विपक्ष मुक्त होने के कगार पर पहुंच गयी है. संसद में जिस तरीके से बीजेपी एक के बाद एक बिल पास कराये जा रही है, विपक्ष का तो नामो-निशान ही नजर आ रहा है. धारा 370 को ही लें, नवीन पटनायक और मायावती जैसे विरोधियों ने जहां साथ दिया, वहीं जेडीयू ने फ्रेंडली विरोध जताया - और कांग्रेस ने तो विरोध में ही संशोधन कर डाला. फिर किस बात का विपक्ष. किस बात का विरोध.

कर्नाटक में सवा साल में ही जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की सरकार गिराकर बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा ने कब्जा कर लिया. गोवा में कांग्रेस के दो तिहाई विधायक बीजेपी के हो गये. अभी अभी सिक्किम में बगैर चुनाव लड़े ही बीजेपी शून्य से 10 विधायकों वाली पार्टी बन गयी - भला अब क्या चाहिये?

धारा 370 खत्म किये जाने के बाद विरोधी दलों के नेताओं में बीजेपी ज्वाइन करने की वैसी ही होड़ दिखायी दे रही है जैसे बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद देखने को मिली थी. तभी की तरह अब भी बीजेपी ज्वाइन करने वाला नेता राष्ट्रवाद की दुहाई दे रहा है.

2019 के आम चुनाव के नतीजे आने से तीन दिन पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चुनाव आयोग की खूब तारीफ की थी, लेकिन अगले ही दिन वो EVM की सुरक्षा को लेकर आयोग की जिम्मेदारी याद दिला दिये.

तब सत्ता के गलियारों में बड़ी जोर की एक चर्चा चली. बड़ी वजह ये रही कि प्रणब मुखर्जी जैसा राजनेता कोई बात यूं ही तो कहेगा नहीं और कहेगा तो 24 घंटे के भीतर भूल सुधार करने का कोई मतलब नहीं. तब EVM की सुरक्षा के मुद्दे पर विपक्ष चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा था और पूर्व राष्ट्रपति ने वैसे हालात में भी तारीफ कर दी. ये बात चुनाव आयोग के पक्ष में जाने से विपक्ष थोड़ा कमजोर महसूस कर रहा था.

तभी ये चर्चा सुनने को मिली थी कि विपक्षी दलों को एकजुट करने में लगे कुछ नेताओं की कोशिश रही कि अगर स्पष्ट बहुमत न होने की सूरत में एक ऐसा नेता चुना जाये जिसकी मुखालफत बीजेपी के लिए भी मुश्किल हो. अगर आम चुनाव के नतीजे अगल होते तो प्रणब मुखर्जी के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय सरकार की कवायद जरूर हुई होती. आखिर सुप्रीम कोर्ट ने भी तो तैयारी कर रखी थी कि कहीं खंडित जनादेश आया और सरकार बनाने में जोड़ तोड़ शुरू हुआ - और मामला आधी रात न सही दिन में भी अदालत पहुंचा तो कहीं कोई कमी नहीं रहनी चाहिये. नतीजे ऐसे आये कि ये चर्चा लंबी नहीं चल सकी.

जिस तरह से विपक्ष अभी बिखरा हुआ है - और बीजेपी अपने मिशन में लगी हुई है विपक्ष के अस्तित्व ही नहीं दो पार्टी सिस्टम की अवधारणा भी खतरे में लगने लगी है. अब तो लगता है - एक ही राष्ट्रीय पार्टी होगी और एक साथ ही चुनाव होगा. ये हो सकता है कि राष्ट्रीय पार्टी जहां कहीं भी कमजोर पड़े क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता कर ले और विरोध के नाम पर बस ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे कुछ नेताओं की राजनीति चलती रहे. फिर तो देश में एक ही पार्टी होगी जो पांच साल में पूरे देश में एक ही चुनाव लड़ेगी और एक ही नेता होगा - नरेंद्र दामोदरदास मोदी.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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