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Updated: 20 जनवरी, 2021 08:55 PM
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पाकिस्तान के लिए किसी के भी और कोई भी नियम शायद मायने नहीं रखते हैं. अगर आपको नियमों की अनदेखी और अवहेलना करना सीखना है, तो पाकिस्तान से सीख सकते हैं. ऐसा कहने की वजह ये है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित और लुप्तप्राय पक्षी होउबारा बस्टार्ड के शिकार के लिए संयुक्त अरब अमीरात का शाही परिवार पाकिस्तान पहुंच चुका है. होउबारा बस्टार्ड के शिकार पर विश्व के कई देशों में प्रतिबंध लगा हुआ है. बावजूद इसके पाकिस्तान की इमरान खान सरकार ने संयुक्त अरब अमीरात के शाही परिवार के 11 सदस्यों को होउबारा बस्टार्ड के शिकार की अनुमति दी है. ये सभी लोग शिकार के लिए बलूचिस्तान के पंजगुर जिले में पहुंच चुके हैं. इस सप्ताह की शुरुआत में पाकिस्तान सरकार ने दुबई के शासक शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम और उनके परिवार के पांच अन्य सदस्यों को भी शिकार के मौसम 2020-21 के लिए विशेष परमिट जारी किया है. गौर करने वाली बात यह है कि वर्तमान प्रधानमंत्री इमरान खान जब विपक्ष में थे, तो होउबारा बस्टार्ड के शिकार की अनुमति की जमकर आलोचना करते थे. वहीं, अब उनकी ही सरकार इसके शिकार की अनुमति दे रही है.

शिकारी सफारी चालू रखने को पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी सरकार

यह पहला मौका नहीं है, जब खाड़ी देशों के शाही परिवार और उनके अमीर दोस्त पाकिस्तान के रेगिस्तानों में इन संरक्षित और दुर्लभ पक्षियों का शिकार करेंगे. यह विवादास्पद निजी शिकारी दौरे करीब चार दशक से अधिक समय से चले आ रहे हैं. 2015 में पाकिस्तान की हाईकोर्ट ने होउबारा बस्टार्ड के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया था. हालांकि, प्रतिबंध के बाद भी इसका शिकार जारी रहा. वहीं, 2106 में हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में पाकिस्तान सरकार ने चुनौती दी और फैसला रद्द कर दिया गया. पाकिस्तानी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अरब देशों से अपने मैत्री संबंधों का हवाला देते हुए कहा था कि शिकार क्षेत्र के आसपास के अविकसित इलाकों में अमीर अरब शेखों के आने से समृद्धि आती है. पाकिस्तान सरकार ने शिकार को जारी रखने के लिए तर्क दिया था कि शिकार पर बैन लगने से उसके खाड़ी देशों से बने संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा.

संरक्षित होने के बावजूद शिकार की इजाजत

अंतरराष्ट्रीय होउबारा संरक्षण फंड (आईएफएचसी) के अनुसार, होउबारा बस्टार्ड एशिया, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में पाया जाता है. अफ्रीकी होउबारा और एशियाई होउबारा दो अलग-अलग प्रजातियां हैं. लुप्तप्राय हो चुके एशियाई होउबारा का संबंध भारत में पाए जाने वाले बस्टार्ड पक्षी से है. ये पक्षी हर वर्ष शीत ऋतु में पाकिस्तान में रहने के लिए आते हैं. कुछ पक्षी ईरान और तुर्कमेनिस्तान भी जाते हैं. आईएफएचसी की मानें, तो वर्तमान में करीब 42 हजार एशियाई और 22 हजार अफ्रीकी होउबारा ही बचे हैं. इनकी गिरती हुई संख्या की वजह अवैध तौर पर किया जा रहा शिकार है. घटती आबादी के मद्देनजर यह प्रवासी पक्षी अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत संरक्षित हैं. साथ ही स्थानीय वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत इसके शिकार पर भी प्रतिबंध है. पाकिस्तानियों को इस पक्षी का शिकार करने की अनुमति नहीं है.

क्यों किया जाता है होउबारा बस्टार्ड का शिकार?

होउबारा बस्टार्ड के शिकार के लिए पाकिस्तान ने कई हिस्सों को ब्लॉक के तौर पर बांटकर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों से आने वाले अपने दोस्तों को आवंटित किया है. यह लोग हर साल होउबारा बस्टार्ड का शिकार करने के लिए अपने शिकारी साजोसामान और बाज पक्षियों के साथ आते हैं. यह लोग होउबारा को अपने खेल और इसके मांस के लिए मारते हैं. माना जाता है कि होउबारा के मांस में कामोत्तेजक गुण होते हैं. इन शिकारी दौरों की मीडिया कवरेज की अनुमति नहीं है. यहां आने वाले लोगों के काफिले में दर्जनों गाड़ियां होती हैं और यह लोग अपने कुक व अन्य स्टाफ को साथ में ही लाते हैं. चार दशकों से ज्यादा समय से पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय द्वारा खाड़ी देशों के अमीर और शक्तिशाली अरब शेखों को होउबारा बस्टार्ड के शिकार के लिए बुलाता रहा है. अपने हितों को साधने और खाड़ी देशों से अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय लगातार ऐसा कर रहा है.

2014 में एक अरब राजकुमार ने मारे थे 2100 पक्षी

परमिट के अनुसार, हर व्यक्ति 10 दिनों की सफारी के दौरान 100 होउबारा बस्टार्ड का शिकार कर सकता है. लेकिन, अरब देशों के ये लोग परमिट की शर्तों का उल्लंघन करते हुए उससे कहीं ज्यादा होउबारा बस्टार्ड का शिकार करते हैं. 2014 में एक सऊदी अरब के राजकुमार और उनके दल ने कथित तौर पर तीन सप्ताह की सफारी के दौरान 2,100 होउबारा बस्टार्ड को मारा था. इसके बाद पाकिस्तान में होउबारा के संरक्षण को लेकर काफी आवाजें उठी थीं. इसी के चलते पाकिस्तान की हाईकोर्ट ने शिकार पर प्रतिबंध लगाया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ यह पाबंदी हटा दी थी.

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