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Updated: 20 अगस्त, 2021 06:44 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) को 2024 के आम चुनाव में चैलेंज करने की कोशिशें अभी से तेज हो चली हैं - और ऐसे माहौल में मोदी की लोकप्रियता में कमी का सीधा फायदा विपक्षी दलों के नेताओं को सीधे सीधे मिलना चाहिये, इसमें भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिये.

लेकिन क्या सर्वे में दर्ज की गयी मोदी की लोकप्रियता में गिरावट और विपक्षी नेताओं की पॉप्युलरिटी में इजाफा भी कोई खास संकेत दे रहा है - अगले चुनाव के हिसाब से ये काफी महत्वपूर्ण हो जाता है.

तात्कालिक फीडबैक की ज्यादा अहमियत होती है, बनिस्बत भविष्य की उम्मीदों के मुकाबले. मूड ऑफ द नेशन का सर्वे हर हिसाब से विपक्षी दलों (Opposition Unity) के तमाम नेताओं की कोशिशों पर एक तरीके के जनमत संग्रह जैसा ही है - और चाहे वो ममता बनर्जी हों, राहुल गांधी हों, सोनिया गांधी हों, शरद पवार हों, लालू यादव हों या फिर प्रशांत किशोर ही क्यों न हों, सर्वे के आंकड़ों को काफी गंभीरता से लेना चाहिये. सर्वे के नतीजों के हिसाब से ही अपनी रणनीतियों में फेरबदल भी करना चाहिये.

मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी दर्ज की गयी है. ये भी मानना ही पड़ेगा कि विपक्षी नेताओं की लोकप्रियता में इजाफा भी दर्ज किया गया है - लेकिन वो ऊंट के मुंह में जीरा जितना ही क्यों लगता है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अगले आम चुनाव में चुनौती देने की तैयारी कर रहे विपक्षी नेताओं के लिए मूड ऑफ द नेशन (Mood Of The Nation) साफ साफ बता रहा है कि उनकी तैयारी चाहे जितनी भी उम्दा हो - लेकिन लक्षण ठीक नहीं दिखाई पड़ रहे हैं.

2024 के हिसाब से विपक्ष है कहां?

इंडिया टुडे के लिए कार्वी इनसाइट्स के किये सर्वे मूड ऑफ द नेशन में जो सबसे बड़ी बात सामने आयी है, वो है - अगस्त, 2020 से अगस्त 2021 के बीच मोदी की लोकप्रियता में आयी गिरावट, लेकिन उससे भी बड़ी बात वो है जो मोदी को चैलेंज करने वालों को लेकर लोगों में मन में बन रही धारणा है.

सर्वे का थोड़ा ध्यान देकर विश्लेषण करें तो मालूम होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बीते साल भर में ही आधे से भी कम हो गयी है, लेकिन ये भी सच है कि अब भी विपक्षी दलों का कोई भी नेता मोदी के मुकाबले लोकप्रियता के मामले में उनके आधे नंबर भी नहीं जुटा सका है - वैसे विपक्ष की कौन कहे मोदी के सबसे करीबी और भरोसेमंद साथी अमित शाह भी नहीं.

नये और पुराने सर्वे की तुलना करें तो अगस्त, 2020 के सर्वे में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता 66 फीसदी दर्ज की गयी थी, जो जनवरी, 2021 में घट कर 38 फीसदी हो गयी थी - लेकिन अब वो 24 फीसदी लोगों की ही पसंद रह गये हैं. मतलब, सर्वे में शामिल किये गये गये महज 24 फीसदी लोग ही नरेंद्र मोदी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं.

नरेंद्र मोदी के बाद 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए अगर कोई और नेता सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है, तो वो हैं - उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. हालांकि, ये समझना थोड़ा मुश्किल हो रहा है कि जिस योगी आदित्यनाथ को लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों की सूची में लोगों ने निचले पायदान पर भेज रखा है, उन्हीं योगी आदित्यनाथ को लोग अगले प्रधानमंत्री पद के योग्य मान रहे हैं. वैसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यूपी की सत्ता में योगी आदित्यनाथ नहीं लौटते हैं तो उनके लिए दिल्ली का रास्ता भी बंद हो जाएगा, लेकिन जनाधार वाले नेताओं की लोकप्रियता ही उनकी राजनीति की प्राणवायु होती है. यही बात प्रधानमंत्री मोदी पर ही लागू होती है, मुख्यमंत्री योगी पर लागू होती है या फिर ममता बनर्जी और राहुल गांधी जैसे किसी भी नेता पर.

rahul gandhi, narendra modi, mamata banerjeeनरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में कमी और राहुल गांधी और ममता बनर्जी के मामले इजाफे के बावजूद काफी बड़ा फासला है

योगी आदित्यनाथ का प्रधानमंत्री मोदी के बाद पसंद किया जाना भी कुछ न कुछ संकेत तो दे ही रहा है. मतलब तो यही हुआ कि लोग प्रधानमंत्री मोदी के बाद भी बीजेपी की राजनीतिक विचारधारा को ही सत्ता सौंपने के बारे में सोच रहे हैं.

अब तक लोग निर्विकल्प भाव लिये हुए हैं, जिसे टीना फैक्टर कहा जाता है. मतलब, कोई विकल्प नहीं. नेता को लेकर भले ही कुछ लोगों के मन में संशय पैदा होने लगा हो, लेकिन राजनीतिक विचारधारा को देखें तो वे दूसरे विकल्पों को बीजेपी और संघ के बाद रख कर सोच रहे हैं.

लाख कोशिशों के बावजूद कोई भी विपक्षी दल या फिर विपक्षी खेमे का कोई भी नेता सीधे सीधे बीजेपी का राजनीतिक विकल्प बनने जैसा तो नजर नहीं आ रहा है.

बेशक नरेंद्र मोदी अपनी लोकप्रियता के मामले में साल भर के भीतर पहले के मुकाबले आधे से भी कम लोगों की पसंद बन चुके हों, लेकिन जो चैलेंज करने वाले हैं वे भी तो मोदी की लोकप्रियता के आधे तक नहीं पहुंच पाये हैं - प्रधानमंत्री मोदी अब भी सर्वे में 24 फीसदी लोगों की पसंद बने हुए हैं, लेकिन उनको चैलेंज कर रहे नेता जैसे तैसे बस दहाई के आंकड़े को छू भर पा रहे हैं.

ये को यही बता रहा है कि ब्रांड मोदी ही नहीं ब्रांड बीजेपी भी भी लोगों की निगाह में भरोसे का ब्रांड बना हुआ है. बीजेपी का एजेंडा बाकी सभी मुद्दों पर भारी पड़ रहा है. बीजेपी के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के आगे विपक्ष चाहे कितना ही कोरोना संकट के दौरान बदइंतजामी, बेरोजगारी या महंगाई जैसे मुद्दों को लेकर सत्ताधारी बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रहा हो, लोगों का विश्वास तो नहीं ही डिगा पा रहा है.

अब इसे कैसे समझें कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में मोदी-शाह की बीजेपी को शिकस्त देने के बावजूद प्रधानमंत्री की पसंद को लेकर अब तक सिर्फ 8 फीसदी लोगों की पसंद बन पायी हैं - और विपक्षी खेमे में अब तक अछूत बने हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी ममता बनर्जी के बराबर ही 8 फीसदी लोगों की पसंद माने जा रहे हैं.

सबसे दिलचस्प तो दोनों की लोकप्रियता में एक साल में हुई ग्रोथ है - दो दूनी चार दूना आठ फीसदी. हां, ये तो है कि दोनों ही अपने अपने इलाके में अपनी सत्ता बरकरार रखने में कामयाब रहे हैं - और दोनों को सत्ता दिलाने में प्रशांत किशोर की भी भूमिका रही है.

ये भी सही है कि दोनों ही मोदी-शाह को चैलेंज करके दिल्ली और पश्चिम बंगाल के चुनाव जीते हैं - लेकिन उसके आगे? मोदी और बीजेपी के आगे अब भी कोई ठीक से खड़ा हो पाने की स्थिति में तो नहीं लग रहा!

विपक्षी एकजुटता की हालिया कोशिशें

2024 के आम चुनाव को लेकर विपक्षी दलों की तैयारियों में कोई कमी हो गयी हो, ऐसा तो नहीं लगता. अंदर ही अंदर जोड़ तोड़ जारी है. फ्रंट पर चेहरे भले ही कम नजर आ रहे हों, लेकिन दिमाग कई काम कर रहे हैं. नये भी और पुराने अनुभवी भी.

ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे ने बीजेपी नेतृत्व का भी ध्यान खींचा ही होगा. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिले जख्म भी थोड़ी बहुत तकलीफदेह लगे ही होंगे - ममता बनर्जी की दिल्ली में दस्तक से एक्टिव हुए विपक्षी खेमे ने 2022 के विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी नेतृत्व की चिंता भी बढ़ायी होगी. संगठन की तैयारियों को को लेकर अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा बैठकों में बाहरी गतिविधियों को नजरअंदाज तो नहीं ही किया होगा - क्योंकि 2024 तो बहुत दूर है, यूपी चुनाव तो सिर पर आ खड़ा हुआ है.

भले एक हो, अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चैलेंज पेश करना, लेकिन विपक्ष में भी दो फाड़ से ज्यादा हुआ लगता है. पहला बंटवारा तो राहुल गांधी को लेकर ही हो गया है.

विपक्षी खेमे की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि कांग्रेस के साथ होने पर उसका कबाड़ा हो जाता है और कांग्रेस के न रहने पर खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है. जब तक ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में रहीं कांग्रेस पंजाब का झगड़ा सुलझाने में लगी हुई थी, जैसे ही तृणमूल कांग्रेस नेता ने दिल्ली में कदम रखे, राहुल गांधी हद से ज्यादा एक्टिव नजर आने लगे - और फिर भीतर ही भीतर मिलजुल कर ऐसी खिचड़ी पकायी गयी कि जिस शरद पवार के भरोसे ममता बनर्जी ने दिल्ली दौरे का कार्यक्रम बनाया था, बगैर उनसे मिले ही जाने को मजबूर हो गयीं.

ममता बनर्जी भले ही फिलहाल पश्चिम बंगाल से बाहर नहीं नजर आ रही हों, लेकिन मोदी के खिलाफ विपक्षी गतिविधियां बंद नहीं हुई हैं. लालू यादव ओबीसी जातियों के नाम पर राजनीति दलों को बीजेपी के खिलाफ एकजुट कर रहे हैं - और शरद पवार भी अपनी रणनीतियों के साथ साथ उनके साथ भी जुड़े हुए हैं - और बीच की खाली जगहों को भरने में प्रशांत किशोर भी अपने स्तर से जुटे ही हुए हैं.

राहुल गांधी के ब्रेकफास्ट और कपिल सिब्बल के डिनर के बाद अब सोनिया के वर्चुअल सियासी लंच की तरफ सबकी नजर है - जाहिर है बीजेपी की भी निगाहें तो होंगी ही!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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