New

होम -> सियासत

 |  5-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 24 फरवरी, 2021 09:06 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
  • Total Shares

दिल्ली के इतिहास में 23 फरवरी 2020 को एक 'काला पन्ना' जुड़ गया था. 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के बाद एक बार फिर से दिल्ली की सड़कों पर अराजकता और हिंसा ने कब्जा कर लिया था. दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाकों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में भड़के भीषण दंगों में 53 लोगों की जान गई थी. सैकड़ों घायल हुए थे. घर जलाए गए और दुकानें लूट ली गईं. करोड़ों की सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा. ये सब शुरू हुआ CAA के विरोध से. हालांकि, सीएए की वजह से अबतक एक भी मुसलमान देश से बाहर नहीं भेजा गया, लेकिन इसके विरोध में भड़के दंगों ने एक ही झटके में 53 जिंदगियों को इस दुनिया से बाहर भेज दिया.

एक 'कपोल कल्पना' के सहारे 15 दिसंबर 2019 को दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में दिल्ली से नोएडा जाने वाली सड़क पर कब्जा कर लिया गया. कपोल कल्पना इसलिए कि नागरिकता संशोधन कानून का देश के मुस्लिम वर्ग से कोई लेना-देना ही नहीं था. सीएए के अनुसार, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के प्रवासियों को नागरिकता देने के नियमों में बदलाव किए गए थे. राजनीतिक दलों ने इसे एक अवसर के तौर पर लिया और इसे मुस्लिम वर्ग को निशाना बनाए जाने के तौर पर पेश किया. इस वजह से सीएए के खिलाफ लोगों में गुस्सा भर गया.

इसी बीच CAA के विरोध में एनआरसी (NRC) यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस को मिलाकर एक परिकल्पना रच दी गई. इस परिकल्पना में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक वर्ग मुस्लिम समाज को देश से बाहर निकालने की साजिश के तौर पर लोगों के सामने पेश किया गया. इस थ्योरी के आधार पर दिल्ली में प्रदर्शनों का दौर चल निकला. शाहीन बाग की तर्ज पर दिल्ली के अन्य इलाकों में भी प्रदर्शन किए जाने लगे. आखिरकार ये प्रदर्शन अपने चरम को पाकर दंगों की शक्ल में बदल गए. नागरिकता संशोधन कानून को लेकर शुरू हुए विरोध ने कब दंगों की शक्ल अख्तियार कर ली, लोग समझ ही नहीं सके. 

रोके जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भी एक 'काल्पनिक हौव्वा' बनाकर दिल्ली में CAA के विरोध में दंगे भड़काए गए.रोके जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भी एक 'काल्पनिक हौव्वा' बनाकर दिल्ली में CAA के विरोध में दंगे भड़काए गए.

दरअसल, इस देश में घुसपैठियों बढ़ती संख्या को लेकर केंद्र सरकार ने असम में NRC लागू किया था. इसे लेकर वहां विवाद शुरू हुआ. बड़ी संख्या में प्रवासियों के साथ भारतीय नागरिक भी इस सूची से बाहर हो गए. इस विवाद को शांत करने के लिए केंद्र सरकार सीएए कानून लाई थी. सीएए कानून आने के बाद अल्पसंख्यक समुदाय में ये भावना घर कर गई कि इस कानून के सहारे मुस्लिम समाज को निशाना बनाया जाएगा. इस स्थिति में दिल्ली दंगों का एक कारण केंद्र की मोदी सरकार भी रही. सीएए के विरोध में देशभर में हिंसा भड़की थी और जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे थे. इससे मोदी सरकार ने कोई सीख नहीं ली. दिल्ली के शाहीन बाग में भी दिल्ली-नोएडा मार्ग पर कब्जा कर प्रदर्शन शुरू हुआ था. कुछ समय बाद दिल्ली के अन्य इलाकों में भी कमोबेश यही हाल नजर आने लगा. प्रदर्शनों पर मोदी सरकार की उदासीनता ने इस 'काल्पनिक आग' को भड़कने का मौका दिया, जो आगे चलकर दंगों में तब्दील हो गई. दरअसल, मोदी सरकार जनता के बीच अपनी बात पहुंचाने में नाकाम साबित हुई. सीएए को लेकर सरकार ने अपना पक्ष तो रखा, लेकिन वह इससे मुस्लिम समाज में व्यापत गुस्से को शांत नहीं कर सकी. साथ ही इन प्रदर्शनों को रोकने के लिए सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए.

दिल्ली में 23 फरवरी 2020 को भड़के दंगों से पहले सुप्रीम ने भी इस मामले को सुलझाने के प्रयास किए थे. सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए तीन सदस्यीय टीम नियुक्त की. जिसमें पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, सुप्रीम कोर्ट की वकील साधना रामचंद्रन और वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े शामिल थे. इन वार्ताकारों ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत के जरिये हल निकालने को कहा था, लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी. वार्ताकारों में से एक पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह शाहीन बाग प्रदर्शन को शांतिपूर्ण और सड़क मार्ग अवरुद्ध होने की वजह पुलिस की अनावश्यक नाकेबंदी को बताया था. सुप्रीम कोर्ट के इस प्रयास से हल नहीं निकल सका.

रोके जाने की तमाम कोशिशों के बावजूद भी एक 'काल्पनिक हौव्वा' बनाकर दिल्ली में CAA के विरोध में दंगे भड़काए गए. इस दौरान कई एक्टिविस्ट, छात्र, बुद्धिजीवी और नेता लोगों को भड़काने में शामिल रहे. सीएए के विरोध में किया जा रहा प्रदर्शन धीरे-धीरे देशविरोधी ताकतों का अड्डा बन गया था. कट्टर इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई (PFI) द्वारा शाहीन बाग प्रदर्शन को फंडिंग किए जाने की बात भी सामने आई. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत पहुंचते ही दिल्ली में दंगे भड़क उठे थे. दंगों मुख्य रूप से उन जगहों पर ही भड़के थे, जहां मुस्लिम आबादी ज्यादा है. यह सब कुछ भारत में चल रहे प्रदर्शनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लाने के प्रयास के तौर देखा गया. ठीक वैसे ही जैसा 'टूलकिट' के जरिये किसान आंदोलन को लेकर कोशिश की गई थी.

दिल्ली दंगों को एक साल बीत जाने के बाद भी उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जिन इलाकों में दंगे भड़के थे, वहां माहौल अब पहले जैसा नहीं रहा है. दिल्ली में CAA विरोधी दंगों से लोगों को मिले जख्म आज भी सूखे नही हैं. दिल्ली दंगों ने इन इलाकों में लोगों के बीच एक गहरी खाई खोद दी है. इसे पाटने में अभी काफी समय लगेगा. जिस CAA की वजह से दिल्ली में दंगे भड़के थे, उसके चलते देश का एक भी मुस्लिम बाहर नहीं भेजा गया. लेकिन, दंगों की वजह से 53 जिंदगियां इस दुनिया से चली गईं. एक 'काल्पनिक स्थिति' ने दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश को नासूर बन जाने वाले घाव दिए हैं.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय