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Updated: 11 अक्टूबर, 2020 10:39 PM
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चाहे वो नीतीश कुमार (Nitish Kumar) हों या तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) या फिर कोई और ही नेता क्यों न हो - ऐसा लगता है जैसे किसी भी उम्मीदवार का अस्तित्व बगैर उसकी जाति (Caste Factor) के है ही नहीं. कहने को तो सभी यही मैसेज देने की कोशिश कर रहे हैं कि वो सभी तबकों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हर सीट पर टिकट सिर्फ जातीय आधार पर ही फाइनल किये गये हैं - और जीत के लिए उसी का भरोसा है.

नेता और पार्टी बाद में पहले जाति जिंदाबाद बोलो

बिहार चुनाव में टिकटों के बंटवारे में एक तरफ गुप्तेश्वर पांडेय को टिकट न मिलने की चर्चा है, तो दूसरी तरफ मनोज कुशवाहा के जेडीयू का टिकट लौटाये जाने की. पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय को जबाव देने नहीं बन रहा है. कहते फिर रहे हैं कि नीतीश कुमार जबान के पक्के आदमी हैं, टिकट न देने की कुछ मजबूरियां रही होंगी, इसलिए कोई ये न समझे कि वो ठगे गये हैं.

पूर्व मंत्री मनोज कुशवाहा के टिकट लौटाने का किस्सा भी काफी दिलचस्प है. जब मनोज कुशवाहा को उनकी अपनी सीट कुढ़नी की जगह मीनापुर विधानसभा सीट से उम्मीदवारी की खबर मिली तो उनको तो आश्चर्य हुआ ही, इलाके में जेडीयू कार्यकर्ताओं ने विरोध भी शुरू कर दिया - बाद में पता चला कि एक जैसे नाम होने से कन्फ्यूजन के चलते ऐसा हुआ है और बिहार जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक चौधरी ने भी ऐसी गलती होने की बात स्वीकार कर ली है.

हुआ ये कि जेडीयू के किसान प्रकोष्ठ के अध्यक्ष मनोज कुमार को टिकट दिया जाना था और वही मनोज कुशवाहा को दे दिया गया - चूंकि नाम तो वो मनोज कुमार लिखते हैं लेकिन जाति उनकी कुशवाहा है इसलिए टिकट उसी जाति के दूसरे मनोज कुशवाहा को दे दिया गया.

समझने वाली बात ये है कि भले ही जातीय पहचान मिटाने के चक्कर में लोगों ने टाइटल लिखना बंद कर दिया हो या अपने नाम से पहले कुमार जोड़ कर नया नाम कर लिया हो, लेकिन चुनावों में उनकी पहचान उनकी जाति से ही होती है. टिकट उम्मीदवार के नाम को नहीं बल्कि उसकी जाति को मिलता है. बगैर जाति के चुनावी राजनीति में व्यक्ति के नाम की कोई अहमियत नहीं होती.

भोजपुरी फिल्मों के स्टार रवि किशन की जाति के बारे में काफी लोगों को तब पता चला जब वो गोरखपुर संसदीय सीट से बीजेपी के उम्मीदवार बनाये गये - रवि किशन शुक्ला. उससे पहले शायद ही कभी रवि किशन को अपना पूरा नाम बताने की जरूरत पड़ी हो - लेकिन वोट मांगने के लिए तो वो सब करना पड़ता ही है जो कभी सोचा नहीं होता है.

nitish kumar, tejashwi yadavभूलो इंकलाब, बोलो - जाति जिंदाबाद!

आशुतोष के आम आदमी पार्टी छोड़ने के बाद जब कारणों की पड़ताल चल रही थी तो मालूम हुआ कि कैसे 2014 के आम चुनाव के दौरान उनकी जाति पर जोर देने की कोशिश हो रही थी. आशुतोष ने काफी पहले ही अपने नाम से टाइटल ड्रॉप कर दिया था जिसे जाति छिपाने या उसे महत्व न देने की कोशिश के तौर पर देखा जाता है. जब चुनाव प्रचार चल रहे थे तो आप नेता आशुतोष पर लगातार दबाव बना रहे थे कि वो वोट मांगने पहुंचे तो पूरा नाम बतायें ताकि लोग उनसे जातीय तौर पर जुड़ा हुआ महसूस करें.

जब दिल्ली का ये हाल है तो बिहार का कहना ही क्या - जिस तरीके से राजनीतिक दलों ने टिकट बांटे हैं, लगता तो ऐसा है जैसे सभी को खुद से ज्यादा अपने उम्मीदवारों पर ही भरोसा है - खासकर उनके जातीय वोट बैंक पर.

जातीय समीकरण साधने की कवायद

ऐसा लगता है जैसे हर गठबंधन सबका साथ और सबका विकास जैसा संदेश देने का प्रयास कर रहा है लेकिन राजनीतिक दलों का फोकस जातीय वोट बैंक ही है. तभी तो हर गठबंधन में एक राजनीतिक दल का फोकस अपने जातीय वोट बैंक पर है तो गठबंधन के दूसरे साथी पर बचे हुए तबके को साधने की जिम्मेदारी डाल दी गयी है.

मिसाल के तौर पर देखें तो जेडीयू ने उम्मीदवारों की अपनी सूची में यादव नेताओं पर भरोसा जताया है तो बीजेपी का सवर्ण नेताओं पर ज्यादा यकीन नजर आ रहा है. महागठबंधन में भी ऐसा ही बंटवारा नजर आ रहा है. जाहिर है आरजेडी तो अपने खास यादव वोट बैंक को ही तरजीह देगी, लेकिन सिर्फ उनके ही बूते चुनाव तो जीते नहीं जा सकते - लिहाजा सवर्ण वोटों को साधने का जिम्मा तेजस्वी यादव ने कांग्रेस पर छोड़ दिया है.

सवर्ण उम्मीदवारों की संख्या के हिसाब से देखा जाये तो एनडीए ने पहले चरण में 25 सवर्ण प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है. एनडीए के बाद नंबर आता है उसी से अलग हुई चिराग पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति का जिसके 19 सवर्ण उम्मीदवार बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में किस्मत आजमाने जा रहे हैं.

महागठबंधन में ये काम कांग्रेस कर रही है और अपने हिस्से की पहले चरण की 21 सीटों में से 15 पर पार्टी ने सवर्णों को टिकट दिया है. कुशवाहा वोटों के लिए नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा दोनों में होड़ है, लेकिन सबसे ज्यादा उम्मीदवार राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के ही हैं - 17. अगर गठबंधन साथी बीएसपी के चार जोड़ दें तो संख्या 21 पहुंच जाती है. सीपीआई-एमएल के भी 8 में से तीन सीटों कुशवाहा उम्मीदवार ही हैं. पहले चरण में बीजेपी और जीतनराम मांझी की पार्टी को छोड़ कर सभी दलों ने कुशवाहा उम्मीदवारों को शिद्दत से टिकट दिया है.

नीतीश की नजर MY पर टिकी लगती है

बिहार के यादवों के एक वर्ग में धारणा बनी है कि तेजस्वी यादव सवर्णों पर खासी मेहरबानी दिखा रहे हैं. भले ही संगठन में जिला स्तर पर भी यादवों के हाथ में ही कमान हो, लेकिन आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष तो जगदानंद सिंह ही हैं. नेताओं में भी मनोज झा ही ज्यादातर हावी नजर आते हैं. नीतीश कुमार इस परसेप्शन का पूरा फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं.

नीतीश कुमार ने अपने जेडीयू कोटे का एक प्रमुख हिस्सा बरसों से लालू यादव के सबसे भरोसेमंद MY समीकरण को अपनी तरह लुभाने में इंवेस्ट किया है. नीतीश कुमार ने मुस्लिम-यादव समीकरण के जरिये 30 सीटें जीतने का दांव खेला है. जेडीयू ने इसमें 19 यादव उम्मीदवार और 11 सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशियों पर भरोसा जताया है.

जेडीयू की सूची जारी करते हुए आरसीपी सिंह ने कहा था कि नीतीश कुमार समावेशी विकास के अगुआ हैं और यही वजह है कि टिकटों के बंटवारे में हर वर्ग के लोगों का पूरा ध्यान रखा गया है.

2015 में रहा यादव विधायकों का बोलबाला

2015 के चुनाव नतीजों को ध्यान से देखें तो 243 सदस्यीय विधानसभा में सबसे ज्यादा 61 यादव विधायक चुन कर आये थे. इनमें आरजेडी के 42, जेडीयू के 11 और बीजेपी के 6 और कांग्रेस के 2 विधायक थे. यादवों के बाद एसएसी-एसटी से 40 और 24 मुस्लिम विधायक भी जीते थे. बाकी जातियों को देखें तो 19 राजपूत, 19 कोइरी, 17 भूमिहार, 16 कुर्मी, 10 ब्राह्मण, 3 कायस्थ विधायक चुनाव जीतने में कामयाब रहे.

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