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Updated: 08 अक्टूबर, 2020 11:10 AM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के पक्ष में बीजेपी (BJP) नेताओं की बयानबाजी के बावजूद शक की गुंजाइश खत्म नहीं हो रही है तो उसकी वजह भी खास है. नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग पासवान (Chirag Paswan) के अपने इरादे साफ कर दिये जाने के बावजूद बीजेपी ने न तो साफ तौर पर सारी बातों से इंकार ही किया है और न ही इकरार.

ये सवाल अब भी बना हुआ है कि चिराग पासवान के एनडीए आधा छोड़ने और आधे बने रहने के फैसले को लेकर बीजेपी का रूख क्या है? चिराग पासवान के मुताबिक उनकी पार्टी एलजेपी दिल्ली में एनडीए में यथावत है और बिहार में सिर्फ नीतीश कुमार के खिलाफ है, न कि बीजेपी के. वो भी तब जब बीजेपी बिहार विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ रही है.

बीजेपी के बागियों को टिकट देकर चिराग पासवान का जेडीयू उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारना तो ऐसा लग रहा है जैसे वो किसी अंडरकवर मिशन पर काम कर रहे हैं - और साफ तौर पर इस अंडरकवर मिशन के निशाने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं.

क्या ये नीतीश कुमार इफेक्ट है

चिराग पासवान के खुल कर मैदान में आ जाने के बाद नीतीश कुमार ने भी तेवर दिखाने शुरू कर दिये हैं. नीतीश कुमार ने ऐसा कुछ कहा तो नहीं है, लेकिन बीजेपी नेताओं के बयानों से तो ऐसा ही लगता है.

नीतीश कुमार को एनडीए के नेता के तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जून में ही पहली डिजिटल रैली में स्थापित कर दिया था. फिर जब प्रधानमंत्री कई कार्यक्रमों के सिलसिले में बिहार के लोगों से मुखातिब हुए तो बताया कि नीतीश कुमार बिहार के फिर से मुख्यमंत्री बनें ये भी उनके मन की बात का ही हिस्सा है - और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा तो जब से बिहार पहुंचे हैं शायद ही ऐसी कोई सार्वजनिक इवेंट हुआ हो जब वो ये बताना भूले हों कि नीतीश कुमार की ही एनडीए के नेता हैं और बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी मिल कर चुनाव लड़ेंगे.

चिराग पासवान के नीतीश कुमार के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने के बाद जेपी नड्डा की तरफ से कोई बयान नहीं आया है - बल्कि, ऐसे सवालों का जवाब देने के लिए बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव, डिप्टी सीएम सुशील मोदी और बिहार बीजेपी अध्यक्ष संजय जायसवाल को मोर्चे पर लगा दिया गया है.

6 अक्टूबर, 2020 को प्रेस कांफ्रेंस की सूचना मीडिया को दी गयी. बताया गया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सुशील मोदी पटना के होटल में प्रेस कांफ्रेंस करेंगे. होटल भी वही जहां पर बीजेपी के मीडिया सेल चुनाव का कामकाज चल रहा है. प्रेस कांफ्रेस शुरू हो जाने के कुछ देर बाद तक समझ पाना मुश्किल हो रहा था कि विषय सीटों का बंटवारा ही है या फिर चिराग पासवान की नयी राह पकड़ना.

शुरुआत दो बातों से हुई. दोनों ही महत्वपूर्ण बातें थीं. संजय जायसवाल ने एक बार फिर बीजेपी की नेतृत्व की बात दोहरायी, लेकिन एक ऐड-ऑन के साथ - नीतीश कुमार ही एनडीए के नेता हैं और अगर किसी को उनका नेतृत्व नहीं स्वीकार है तो वो एनडीए में नहीं होगा. दूसरी महत्वपूर्ण बात खुद नीतीश कुमार ने बतायी - जेडीयू 122 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है और बीजेपी 121 सीटों पर. ये खबर तो पहले ही आ चुकी थी कि नीतीश कुमार अपने हिस्से से 7 सीटें जीतनराम मांझी को देंगे और अगर VIP वाले मुकेश साहनी से भी डील पक्की हो जाती है तो बीजेपी अपने कोटे से उनको कुछ सीटें दे सकती है. मुकेश साहनी ने महागठबंधन में खुद को डिप्टी सीएम का उम्मीदवार नहीं घोषित करने और सीटों का नंबर नहीं साफ करने को लेकर प्रेस कांफ्रेंस से ही बगावत कर बाहर निकल गये थे.

nitish kumar, sushil modi, chirag paswanबीजेपी की तरफ से चिराग पासवान को लेकर पूरी तस्वीर साफ किये जाने तक सारी चीजें संदेहास्पद ही लगती रहेंगी!

ये सब बता देने के बावजूद ये साफ नहीं हो रहा था कि चिराग पासवान के एनडीए में होने या नहीं होने को लेकर स्टेटस अपडेट क्या है? सवाल उठा कि आखिर चुनावी गठबंधन को कैसे समझा जाये जब चिराग पासवान चुनाव नीतीश कुमार के खिलाफ लड़ने की बात कर रहे हैं, चुनाव जीतने के बाद बीजेपी के साथ सरकार बनाने की बात कर रहे हैं और नीतीश सरकार के सात-निश्चय प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार का आरोप लगा कर जांच कराने की बात कर रहे हैं.

सवाल सुन कर नीतीश कुमार ने गोलमोल जवाब दिया लेकिन लगे हाथ एहसान भी जताते गये - और मौका मिलते ही गेंद बगल में बैठे सुशील मोदी के पाले में डाल दिये. प्रेस कांफ्रेंस से पहले नीतीश कुमार के होम वर्क की झलक भी साफ मिल रही थी. ये भी साफ रहा कि चिराग पासवान के स्टैंड के बाद नीतीश कुमार ने भी बीजेपी को अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिये हैं. बीजेपी को जो करना होगा वो बाद में भले ही करे, लेकिन ऐसे मोड़ पर तो वो कोई जोखिम उठाने का खतरा नहीं ही मोल लेगी.

नीतीश कुमार का कहना था - 'हमारा काम बिहार की जनता की सेवा करना है... हमारे बारे में कौन क्या बोल रहा इससे फर्क नहीं पड़ता...'

फिर बोले, 'रामविलास पासवान की मैं इज्जत करता हूं. उनके जल्दी स्वस्थ होने की कामना करता हूं... मैं पूछता हूं कि रामविलास पासवान जो राज्यसभा गये हैं वो क्या जेडीयू की मदद के बिना ही पहुंचे हैं? बिहार में एलजेपी की 2 ही सीटें हैं ना.'

नीतीश कुमार ने आगे ये भी जोड़ा - 'हम बीजेपी के साथ मिल कर काम कर रहे हैं आगे भी करेंगे... हमारे मन में कोई गलतफहमी नहीं है - जिसे जो कहना है कहे इससे हमको कोई लेना देना नहीं है.'

नीतीश कुमार अपनी बात कह कर चुप हो गये, फिर तो सभी सवालिया निगाहें प्रेस कांफ्रेंस पार्टनर सुशील मोदी पर फोकस हो गयीं. सुशील मोदी एक पल के लिए अटके लेकिन संजय जायसवाल की बातें दोहरा दी. साथ में ये जरूर जोड़ दिया कि एनडीए में शामिल दलों के अलावा कोई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा - और अगर ऐसा हुआ तो चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज करायी जाएगी.

सवाल का जवाब नहीं मिला. सवाल था - क्या चिराग पासवान की इस हरकत के बावजूद रामविलास पासवान मोदी कैबिनेट का हिस्सा बने रहेंगे? क्या बीजेपी, चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी को एनडीए से बाहर करेगी? जवाब किसी के पास नहीं था - नीतीश कुमार भला क्या बोलते और सुशील मोदी वैसे ही टालते रहे जैसे हाथरस में पुलिस इंस्पेक्टर आधी रात को पीड़ित के अंतिम संस्कार के वक्त रिपोर्टर को ये बताने को तैयार नहीं था कि चल क्या रहा है?

जानने और समझने की बात बस इतनी ही होती तो भी कोई बात न होती - समझना तो ये जरूरी हो गया है कि बीजेपी के बागियों को चिराग पासवान एलजेपी का टिकट देकर जेडीयू उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव मैदान में क्यों उतार रहे हैं?

नीतीश के खिलाफ अंडरकवर ऑपरेशन नहीं तो ये सब क्या है?

माना जा रहा था कि बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय बक्सर विधानसभा सीट से जेडीयू उम्मीदवार होंगे, लेकिन अफसोस की बात ये हुई कि वो सीट बीजेपी के खाते में चली गयी. लिहाजा अब नीतीश कुमार नहीं बल्कि बीजेपी को तय करना है कि बक्सर सीट पर उम्मीदवार कौन होगा. एक बार फिर गुप्तेश्वर पांडेय के सामने 2009 वाली ही स्थिति पैदा हो गयी है, लेकिन लगता नहीं कि इस बार उनको ऐसी कोई फिक्र होगी क्योंकि अपने मन से तो वो जेडीयू ज्वाइन किये नहीं हैं. ये गुप्तेश्वर पांडेय ने ही बताया था कि नीतीश कुमार ने बुलाया और बोला तो पार्टी ज्वाइन कर ली. वैसे भी गुप्तेश्वर पांडेय डंके की चोट पर बता ही चुके हैं कि बिहार के दर्जन भर सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए उनको ऑफर मिले हैं - हालांकि, ये उनके जेडीयू ज्वाइन करने से पहले की बात है.

ऐसा ही किस्सा बिहार की दिनारा सीट पर सुनने को मिला है. दिनारा विधानसभा सीट बीजेपी के साथ बंटवारे में जेडीयू के हिस्से में जा चुकी है. इसे लेकर दिनारा से बीजेपी के टिकट के दावेदार राजेंद्र सिंह ने बगावत कर दी. राजेंद्र सिंह की बगावत को चिराग पासवान ने हाथोंहाथ लिया. उनको दिनारा से ही एलजेपी का उम्मीदवार बना डाला है. राजेंद्र सिंह 2015 में भी दिनारा विधानसभा से ही चुनाव लड़े थे लेकिन जेडीयू के जय कुमार सिंह से हार गये थे. तब जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन के बैनर तले चुनाव मैदान में थी. अब वो लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जेडीयू प्रत्याशी को चैलेंज करने जा रहे हैं.

राजेंद्र सिंह की ही तरह बरुण पासवान भी बीजेपी छोड़ कर एलजेपी में शामिल हो गये हैं - और वो कुटुम्बा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने जा रहे हैं. कुटुम्बा सीट भी जेडीयू के हिस्से में है जिसे नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी के साथ शेयर किया है.

राजेंद्र सिंह और बरुण पासवान में फर्क है. राजेंद्र सिंह बीजेपी के कद्दावर नेता रहे हैं और फिलहाल बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष थे. सुनने मे ये भी आ रहा है कि ऐसे ही बीजेपी के कई और भी नेता बगावत कर एलजेपी में शामिल हो सकते हैं. आखिर बीजेपी से बगावत कर सारे नेता एलजेपी मे ही क्यों शामिल हो रहे हैं या हो सकते हैं - आरजेडी में क्यों नहीं? आरजेडी भी तो बीजेपी के बागी नेताओं को हाथोंहाथ ही लेगी?

भले ही राजेंद्र सिंह के एलजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने को बगावत के तौर पर देखा जाये, लेकिन ये बात हजम नहीं हो रही है. अगर राजेंद्र सिंह की जगह कोई और हो तो एक बार सोचा भी जा सकता है, लेकिन राजेंद्र सिंह का केस हजम होना तो दूर आसानी से गले के नीचे भी नहीं उतर रहा है.

2015 में बिहार चुनाव के लिए अमित शाह ने जो चार लोगों की कोर टीम बनायी थी, राजेंद्र सिंह उनमें से एक हैं. राजेंद्र सिंह को 2015 में बीजेपी के चुनाव जीतने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद का दावेदार समझा जाता रहा. राजेंद्र सिंह संघ के प्रचारक रहे हैं और करीब डेढ़ दशक पहले वो बीजेपी में आये. झारखंड में बीजेपी के संगठन महामंत्री भी रह चुके हैं. 2015 में उनके चुनाव क्षेत्र में देश भर से पहुंचे संघ और एबीवीपी के कार्यकर्ता प्रचार के लिए डेरा डाले हुए थे.

ये सुनने में ही अजीब लगता है कि संघ से जुड़ा बीजेपी का कोई नेता सिर्फ इस बात पर बगावत कर सकता है क्योंकि उसकी सीट बंटवारे में गठबंधन पार्टनर के हिस्से में चली गयी है. मध्य प्रदेश में आलम ये है कि उपचुनाव में बीजेपी नेताओं को न सिर्फ टिकट से वंचित होना पड़ा है, बल्कि उन नेताओं के लिए मजबूरन चुनाव प्रचार भी करना पड़ रहा है जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन किये हैं. ये वही नेता हैं जिन्होंने बीजेपी नेताओं को हरा दिया था.

कितना अजीब लगता है कि पांच साल पहले जिस नेता को मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता हो, जिसके चुनाव प्रचार के लिए संघ से लेकर एबीवीपी के लोग टूट पड़े हों, जो अमित शाह की कोर टीम का हिस्सा रहा हो - वो ऐसे बगावत कर रहा है और चिराग पासवान के खेमे में जा मिलता है?

लगता नहीं कि जो ऊपर से दिखायी दे रहा है हकीकत भी बिलकुल वही है और ऐसे शक की गुंजाइश भी चिराग पासवान के स्टैंड से ही बनती है. चिराग पासवान की पार्टी का कहना है कि चुनाव बाद एलजेपी, बीजेपी के नेतृत्व में बिहार में सरकार बनाएगी. एलजेपी के विधायक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों को मजबूत करेंगे.

फिर तो राजेंद्र सिंह हों या बरुण पासवान - ये बगावतें तो अस्थायी ही हुईं. महज चुनाव तक के लिए. जो कुछ चिराग पासवान की पार्टी की तरफ से बताया गया है उससे तो यही लगता है कि ये बगावत नहीं बल्कि किसी रहस्यमय रणनीति के तहत चल रही प्रक्रिया है.

अगर राजेंद्र सिंह जीत जाते हैं तो चिराग पासवान के घोषित वादे के अनुसार वो बीजेपी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार का सपोर्ट करेंगे. अगर नहीं भी जीत पाते हैं तो साफ तौर पर जेडीयू उम्मीदवनार के ही वोट काटेंगे - और अगर हार जीत का अंतर कम रहा तो बाजी किसी तीसरे के हाथ भी लग सकती है.

फिर तो यही होगा कि सिर्फ और सिर्फ नुकसान नीतीश कुमार के उम्मीदवार को होना तय है - और अगर ऐसा होता है तो आगे के लिए ये बीजेपी के लिए फायदे का सौदा साबित होने वाला है. ये तो ऐसा लगता है जैसे बीजेपी नेता को जेडीयू के खिलाफ एलजेपी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतार दिया गया हो - एक डिस्क्लेमर के साथ जिसे बगावत का नाम दे दिया गया हो! ये तो ऐसा लग रहा है जैसे चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी नीतीश कुमार के खिलाफ अंडरकवर ऑपरेशन का हिस्सा हो!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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