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Updated: 19 जनवरी, 2019 01:47 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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मोदी-शाह की जोड़ी को बीजेपी की पुरानी अटल-आडवाणी जोड़ी से कहीं ज्यादा ताकतवर माना जाता है. देश की मौजूदा राजनीति में ये ऐसी जोड़ी है जो चुनावी मशीन की तरह काम करती है - जिसके लिए जीत ही सब कुछ है. हार भी इस जोड़ी के लिए किसी हादसे से ज्यादा मायने नहीं रखती.

राजनीतिक पटल पर राहुल गांधी के तेजी से उभरने के बावजूद मोदी-शाह की जोड़ी पर कोई खास असर नहीं है, लेकिन नितिन गडकरी के हालिया इरादों से से बीजेपी नेतृत्व हिल उठा लगता है. मोदी-शाह और गडकरी के एक दूसरे के बारे में क्या ख्यालात हैं ये वे भी जानते हैं और वो जगजाहिर भी है.

अपने बयानों पर खुद ही सफाई देकर नितिन गडकरी ने भले ही विवाद को सीधे हमले की शक्ल से बचाने की कोशिश की हो, लेकिन इशारों इशारों में जिन्हें उन्होंने निशाना बनाया है उन्हें भी इस बात का एहसाह हो चुका है. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्‍व को ये बयानबाजी 2014 के आडवाणी के उन बयानों की तरह लग रही है, जिसे मोदी की राह में रोड़ा समझा गया था. अगर ऐसा न होता तो भला बीजेपी नेतृत्व के दूत की नितिन जयराम गडकरी के पास जाकर मुलाकात करने की क्या जरूरत होती?

जब गडकरी से मिला बीजेपी नेतृत्व का दूत

अब लगने लगा है कि नितिन गडकरी हाल फिलहाल जो कुछ भी बोले जा रहे हैं वो यूं ही नहीं है. दूसरों की कौन कहे मौजूदा बीजेपी नेतृत्व को भी ये लगने लगा है कि बयानों के धुएं के पीछे कोई आग तो है जो भीतर ही भीतर धधक रही है - और उसे किसी हवा का भी सपोर्ट मिल रहा है.

अंग्रेजी वेबसाइट Huffpost की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह इतने परेशान हो उठे कि हफ्ता भर पहले अपना एक खास दूत नितिन गडकरी के पास भेज डाला.

रिपोर्ट के मुताबिक, दूत बन कर पहुंचे बीजेपी के उस सीनियर नेता से मुलाकात में भी नितिन गडकरी ने वही बातें कही जो सफाई में ट्वीट किया था - मेरी बातों को संदर्भ से इतर समझा गया. इस पर मोदी-शाह के दूत का कहना रहा कि ऐसे 'एक्सक्यूज' हमेशा काम नहीं आते. बीजेपी नेता ने नितिन गडकरी को संयम बरतने की भी सलाह दी.

ये तो नहीं समझा जा सकता कि नितिन गडकरी जैसे नेता को बीजेपी का कोई भी नेता चुप कराने की क्षमता रखता है. फिर तो यही लगता है कि मौजूदा बीजेपी नेतृत्व नितिन गडकरी के इरादों से काफी चिंतित है. खासकर तब जब बीजेपी 2014 जैसा बहुमत 2019 में नहीं हासिल कर पाती. नेतृत्व के इस डर के पीछे नितिन गडकरी की नरेंद्र मोदी के मुकाबले स्वीकार्यता और उनका जबरदस्त नागपुर कनेक्शन है. नितिन गडकरी का घर नागपुर में संघ प्रमुख मोहन भागवत का दूसरा ठिकाना माना जाता है.

nitin gadkari, amit shah'नो एक्सक्युजेज प्लीज!'

हफपोस्ट ने ऐसे 15 लोगों से बातचीत की है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बीजेपी और नितिन गडकरी के भरोसेमंद हैं और उससे संकेत मिलता है कि संघ के भीतर भी गडकरी को समर्थन मिल रहा है और सबसे बड़ी बात समर्थकों में एक नाम मोहन भागवत भी है.

मोदी के लिए नितिन गडकरी चुनौती क्यों और कैसे

एक वक्त के बाद संघ को अटल-आडवाणी की जोड़ी से भी दिक्कत होने लगी थी. काफी हद तक मोदी-शाह की जोड़ी के प्रति भी उसकी राय वैसी ही बन चुकी है. संघ अपने एजेंडे पर पर आगे बढ़ता है और जो कोई भी डिरेल होता नजर आता है वो उसके लिए दूध में मक्खी जैसा होता है. लालकृष्ण आडवाणी से बेहतरीन मिसाल भी कोई नहीं है. सुना ये भी जाता है कि योगी आदित्यनाथ से भी संघ को बहुत आशा थी, लेकिन वो निराश करने लगे हैं. नितिन गडकरी में ऐसी बहुत सारी खूबियां हैं जो उन्हें नरेंद्र मोदी के मुकाबले बराबरी पर ला खड़ा करती हैं - और कहीं कहीं तो उनसे आगे भी.

1. मोदी-शाह से नाराज बीजेपी लॉबी: भीतर ही भीतर नितिन गडकरी हर उस नेता की पहली पसंद बन रहे हैं जो मोदी-शाह के कारण हाशिये पर चला गया है. संघप्रिय गौतम का बीजेपी नेतृत्व पर निशाना इसी बात का उदाहरण है. संघप्रिय गौतम ने नितिन गडकरी को डिप्टी पीएम बनाने की मांग की है. एक नेता की ओर से ऐसी ही चिट्ठी संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी भेजी गयी थी.

2. जबरदस्त नागपुर कनेक्शन: आरएसएस के लिए नितिन गडकरी ऐसे दुलरुवा हैं जो नागपुर में ही खेलते कूदते बड़ा हुआ है - और संघ की परवरिश से ऐसे संस्कारों से लैस है जो उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने की पूरी क्षमता रखता है. नितिन गडकरी बड़े जनाधार वाले नेता तो नहीं हैं, लेकिन उनके निजी रिश्तों का दायरा बहुत व्यापक है. साथ ही उनका मराठी ब्राह्मण होना भी वजनदार बनाता है.

bhagwat, gadkari, modiनागपुर नेटवर्क किसका कितना मजबूत?

3. मराठी मानुष का समर्थन: यूपी से ही प्रधानमंत्री बनता है वाले कंसेप्ट में महाराष्ट्र से भी प्रधानमंत्री की ख्वाहिश मजबूती लेती जा रही है. यूपी-बिहार वालों के प्रति महाराष्ट्र में राजनीतिक नजरिया क्या है बताने की जरूरत नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर वक्त टारगेट पर रखने वाले उद्धव ठाकरे भी नितिन गडकरी का विरोध नहीं कर सकेंगे, ऐसा समझा जाता है. उद्धव ठाकरे कह भी चुके हैं कि कोई मराठी प्रधानमंत्री भी जरूर बनेगा. वैसे 2050 तक मराठी प्रधानमंत्री की बात तो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी करने लगे हैं और ये काफी हद तक उनके मन की बात लगती है.

4. बिजनेस क्लास की पहली पंसद: ऐसे में जबकि विजय माल्या भगोड़े के रूप में कुख्यात हो चुके हैं, ये नितिन गडकरी में ही हिम्मत है कि वो माल्या के बचाव में दलील पेश कर सकते हैं. माल्या के सपोर्ट में गडकरी ने जो दलील पेश की है वो वही है जो देश का बड़ा कारोबारी तबका सोचता है. विजय माल्या का बचाव करते हुए नितिन गडकरी ने कहा था, '40 साल माल्या नियमित भुगतान करता रहा था, ब्याज भर रहा था. 40 साल बाद जब वो एविएशन में गया... उसके बाद वो अड़चन में आया तो वो एकदम से चोर हो गया? जो पचास साल ब्याज भरता है वो ठीक है, पर एक बार वो डिफॉल्ट हो गया... तो तुरंत सब फ्रॉड हो गया? ये मानसिकता ठीक नहीं.' नितिन गडकरी खुद भी एक उद्योगपति हैं और बिजनेस क्लास की नब्ज अच्छी तरह से पहचानते हैं.

5. पार्टीलाइन से इतर पसंदीदा नेता: नितिन गडकरी की एक और खासियत ये भी है कि वो मोदी-शाह के उलट बेहद मिलनसार और सबको साथ लेकर चलने वाले नेता हैं. ऐसे में एनडीए के सहयोगी ही नहीं, दूसरे दलों के नेताओं के बीच भी नितिन गडकरी की स्वीकार्यता कहीं ज्यादा है. नितिन गडकरी के रिश्ते कैसे होते हैं, इसका एक नमूना हाल के एक कार्यक्रम में देखने को मिला जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल थे. हुआ ये कि जैसे ही केजरीवाल बोलना शुरू करते, बीजेपी कार्यकर्ता खांसना शुरू कर देते. वे तब तक नहीं माने जब तक नितिन गडकरी ने उन्हें डांट नहीं पिलायी.

फिर अरविंद केजरीवाल ने जो कहा वो भी कम उल्लेखनीय नहीं है, 'गडकरी ने हमें कभी भी ऐसा महसूस नहीं करवाया कि वह विपक्षी पार्टी से हैं. मैं बाकी लोगों के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन जिस तरह से गडकरी जी ने हम पर प्यार बरसाया है, मुझे नहीं लगता कि बीजेपी वालों के पास इतना प्यार है. जिस जोश के साथ हम यहां इकट्ठा हुए और जिस जज्बे के साथ हमने साथ मिलकर काम किया, आशा है कि केंद्र सरकार के साथ मिलकर इसी जज्बे के साथ काम हो पाएगा.'

ये वही अरविंद केजरीवाल हैं जिन्होंने नितिन गडकरी पर पूर्ति घोटाले का आरोप लगाया था - और उसके चलते गडकरी को बीजेपी अध्यक्ष की दूसरी पारी से मरहूम होना पड़ा था. वो भी तब जब बीजेपी ने संघ की इच्छा को देखते हुए पार्टी संविधान में संशोधन तक कर लिया था.

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर संघ प्रमुख ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है - अब नहीं तो कब? वीएचपी और संत समाज इसी महीने के आखिर में मंदिर निर्माण पर बड़ा फैसला लेने वाला है.

प्रयागराज के कुंभ मेले में एक कार्यक्रम में संघ के भैयाजी जोशी ने मोदी सरकार पर करारा व्यंग्य किया था - 'राम मंदिर साल 2025 में बनेगा'. हालांकि, बाद में सफाई भी दे डाली, 'हमारी इच्छा है कि 2025 तक अयोध्या में राम मंदिर बन जाये. मैंने 2025 में शुरू करने की बात नहीं की, आज शुरू होगा तो 5 वर्षों में बनेगा.'

तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि 2025 में संघ की स्थापना के 100 साल पूरे हो रहे हैं. माना जा रहा है कि तब तक संघ सिर्फ भव्य राम मंदिर ही नहीं हिंदू राष्ट्र का अक्स भी देख रहा है - और इसके लिए संघ हर वो उपाय करने को तैयार है जो उसे जरूरी लगेगा.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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