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Updated: 22 मई, 2020 09:25 PM
कुंवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह
कुंवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह
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नेपाल (Nepal) के प्रधानमंत्री श्री केपी शर्मा ओली (KP Oli) ने हाल ही में संसद में अपने ज़हरीले भाषण में भारत (India) पर हमला करते हुए कहा है कि भारत का वायरस चीनी (China) और इटली की तुलना में अधिक घातक है. केपी ओली ने यह भी कहा कि कालापानी-लिपुलेख और लिंपियाधुरा त्रिपक्षीय नेपाल-भारत-चीन में हैं और किसी भी कीमत पर नेपाल के नक्शे में शामिल होंगे. 8 मई 2020 को, भारत ने कैलाश मानसरोवर रोड का उद्घाटन किया था, जिस पर नेपाल ने आपत्ति जताई थी, नेपाल ने अब एक नया नक्शा तैयार किया है, जिसमें इन तीन क्षेत्रों को शामिल किया गया है और जब भारत ने पिछले सप्ताह लिपुलेख में कैलाश मानसरोवर रोड लिंक का उद्घाटन किया, तो इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई गई. नेपाल इन क्षेत्रों पर दावे करने के लिए जो दस्तावेज बनाता है, वह उससे गायब हैं. नेपाल के नए नक्शे को सोमवार यानी 18 मई 2020 को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है. केपी शर्मा ओली ने कहा, 'अब हम कूटनीति के माध्यम से इन क्षेत्रों को प्राप्त करने का प्रयास करेंगे, अब यह मुद्दा कोई शांत नहीं होगा, यदि कोई इससे नाराज हो हमारे कदम, फिर हम इसके बारे में चिंतित नहीं हैं. हम किसी भी कीमत पर उसकी जमीन पर अपना दावा पेश करेंगे.'

Nepal, China, KP Oli, Jinping, India, Narendra Modiचीन जानता है कि यदि उसे महाशक्ति बनना है तो हर हाल में नेपाल की मदद लेनी होगी

कुछ दिनों पहले, भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने संकेत दिया कि नेपाल मानसरोवर के रास्ते पर लिपुलेख को लेकर नेपाल किसी और के इशारे पर विरोध कर रहा है. ओली ने भारतीय सेना प्रमुख मनोज नरवणे के बयान पर भी प्रतिक्रिया दी ओली ने कहा, हम जो कुछ भी करते हैं, अपने मन से करते हैं. ओली ने कहा कि वह भारत के साथ मधुर संबंध चाहते हैं लेकिन वह पूछना चाहते हैं कि वे सत्यमेव जयते मानते हैं या सिंहमेव जयते.

ओली का ये तंज भारत की सैन्य ताकत को लेकर था. नेपाल के पीएम ने कहा, ऐतिहासिक गलतफहमियों को खत्म करने का विचार केवल भारत के साथ दोस्ती को गहरा करना है. इस मुद्दे पर चीन के साथ भी बातचीत हो रही है और नेपाल ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है. कुछ दिनों पहले पीएम ओली ने नेपाल में चीन के राजदूत से मुलाकात की थी.

कुछ रिपोर्टों में कहा जा रहा था कि जब ओली का विद्रोह इस महीने पार्टी के भीतर हुआ था, तो चीनी राजदूत होउ यंकी ने उनकी कुर्सी बचाने में मदद की थी. नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रोड लिंक खोले जाने के एक दिन बाद एक बयान जारी किया और विरोध दर्ज कराया और भारतीय राजदूत विनय कुमार क्वात्रा को एक राजनयिक नोट भी सौंपा.

भारत ने जवाब में कहा कि सड़क निर्माण भारतीय क्षेत्र में ही हुआ है, लेकिन नेपाल के साथ घनिष्ठ संबंध को देखते हुए यह राजनयिक माध्यमों से इस मुद्दे को हल करने का समर्थन करता है. भारत ने यह भी कहा कि दोनों देशों को कोरोना वायरस से सफलतापूर्वक निपटना चाहिए और उसके बाद सीमा विवाद पर बातचीत की जाएगी. हालांकि, नेपाल जल्द से जल्द वार्ता चाहता है.

नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली ने संसद में यह भी उल्लेख किया कि लिपुलेक मार्ग पर सीमा विवाद पर चीन के साथ बातचीत चल रही है. ओली ने कहा, हमारे सरकार के प्रतिनिधियों ने चीनी प्रशासन से बात की है और चीनी अधिकारियों ने कहा है कि भारत और चीन के बीच समझौता तीर्थयात्रियों के लिए एक पुराने व्यापार मार्ग के विस्तार पर था और यह देश की सीमाओं या त्रिपक्षीय की स्थिति को प्रभावित नहीं करेगा.

नेपाल भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर चीन से बात करने के लिए बार-बार प्रयास करता रहा है लेकिन बीजिंग ने इससे इनकार कर दिया है. चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा, कालापानी का मुद्दा नेपाल और भारत के बीच का मामला है. हमें उम्मीद है कि दोनों देश मैत्रीपूर्ण परामर्श के माध्यम से अपने मतभेदों को हल करेंगे और किसी भी एकपक्षीय कार्रवाई को करने से बचेंगे जिससे स्थिति बिगड़ती है.

नेपाल, भारत पर दबाव बनाने के लिए चीन के साथ बातचीत के बारे में बात कर रहा है, लेकिन इस प्रयास में उसे अब तक निराशा हुई है. नेपाल 1816 की सुगौली संधि के आधार पर कालापानी, लिपुलेख जैसे क्षेत्रों पर अपना दावा करता है, हालांकि उसने इस महत्वपूर्ण दस्तावेज की मूल प्रति खो दी है. इसके अलावा, नेपाल के पास 1950 की शांति-मित्रता संधि की मूल प्रति नहीं है.

ये दोनों संधियां नेपाल के इतिहास और इसकी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. नेपाल की इस लापरवाही से भारत का पक्ष मजबूत होगा. सुगौली संधि पर नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच वर्ष 1816 में हस्ताक्षर किए गए थे. ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ युद्ध में हारने के बाद, नेपाल ने अपना काफी हिस्सा खो दिया था.

युद्ध की समाप्ति के बाद, सुगौली संधि पर कंपनी की ओर से पारिश ब्रेडशॉ और नेपाल की ओर से राज गुरु गजराज द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे और इसके आधार पर ब्रिटिश भारत और नेपाल की सीमा रेखा तय की गई थी. इस संधि में नेपाल की महाकाली नदी को दोनों देशों की सीमा का आधार बनाया गया था. हालांकि, पिछले 200 वर्षों में, नदी ने कई बार अपना मार्ग बदल दिया, जिसके कारण सीमा विवाद गहरा गया.

पुराने नक्शों और दस्तावेजों की मूल प्रतियों की कमी के कारण इस सीमा विवाद को हल करना और भी मुश्किल हो गया है. वहीं, नेपाल और भारत के संबंधों के लिए 1950 की शांति और मित्रता की संधि बहुत महत्वपूर्ण है. नेपाल और भारत सरकार के तत्कालीन राणा शासन के बीच संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे. इसके तहत दोनों देशों को ज्यादातर मामलों में नेपाली और भारतीयों को समान दर्जा देने के लिए कहा गया था.

हालांकि, नेपाल के कुछ लोग इस संधि की कुछ शर्तों को एकतरफा बताते हैं. 2016 में, जब नेपाल और भारत के संबंधों को नवीनीकृत करने और 1950 की मित्रता संधि को बदलने के लिए दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों (एमिनेंट पर्सन्स ग्रुप) के बीच बातचीत हुई, तो मूल दस्तावेज नेपाल द्वारा प्रस्तुत नहीं किए गए. 22 जुलाई 2016 को, जांच टीम ने नेपाल की संसद को बताया कि सुगौली संधि और नेपाल-भारत मैत्री संधि की मूल प्रतियां देश में मौजूद नहीं हैं.

कुछ इतिहासकारों और सांसदों का मानना है कि नेपाल के महत्वपूर्ण दस्तावेजों की मूल प्रतियां अन्य देशों में हैं. अंतर्राष्ट्रीय संबंध मामलों पर नेपाल की संसदीय समिति के अध्यक्ष पुतिल निरूला ने कहा कि मैत्री संधि की मूल प्रति भारत के पास है जबकि सिगौली संधि की मूल प्रति लंदन में है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा, 'नेपाल सरकार ने आज नेपाल का एक संशोधित आधिकारिक मानचित्र जारी किया है, जिसमें भारतीय क्षेत्र के कुछ हिस्से शामिल हैं. यह एकतरफा अधिनियम ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित नहीं है. राजनयिक के माध्यम से बकाया सीमा मुद्दों को हल करने के लिए.' वार्ता द्विपक्षीय समझ के विपरीत है. 'इसके साथ ही भारत ने नेपाल के कदम का विरोध किया है.

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि नेपाल इस मामले पर भारत की स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ है और हम नेपाल सरकार से इस तरह के अनुचित दावे करने से परहेज करने और भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का आग्रह करते हैं. उन्होंने कहा कि हमें उम्मीद है कि नेपाली नेतृत्व बकाया सीमा मुद्दों को सुलझाने के लिए राजनयिक बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल बनाएगा.

नेपाल में चीन का प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पिछले साल नेपाल का दौरा किया था जब वह भारत आए थे. पिछले 23 वर्षों में नेपाल में किसी चीनी राष्ट्रपति की यह पहली यात्रा थी. अपनी नेपाल यात्रा के दौरान, जिनपिंग ने 20 समझौतों और $ 500 मिलियन की वित्तीय सहायता की भी घोषणा की.

ओली, शी जिनपिंग की स्टाइल और चीन की गिद्ध दृष्टि एवं आक्रामक चाल, की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे चलते भारत और नेपाल के बीच भारी दुविधा पैदा हो रही है.

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कुंवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह कुंवर पुष्पेंद्र प्रताप सिंह @kunwarpushpendra.pratapsingh.5

लेखक पत्रकार हैं जो समसामयिक मुद्दों पर लिखने में रूचि लेते हैं.

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