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Updated: 18 जुलाई, 2021 07:29 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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2022 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में दो फाड़ होने की नौबत आ गई है. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच जारी कलह खुलकर सतह पर आ चुकी है. पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत के एक बयान में गैर-आधिकारिक रूप से नवजोत सिंह सिद्धू को तवज्जो मिलने की बात से नाराज सीएम अमरिंदर सिंह ने मंत्रियों और विधायकों की आपात बैठक बुला ली. हरीश रावत ने अपने बयान से भड़की चिंगारी के बाद सफाई देते हुए कहा कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया. माना जा रहा है कि पंजाब में जारी इस घमासान का जल्द ही हल निकाल लिया जाएगा. लेकिन, पंजाब के इस बवाल का असर अगले साल होने वाले उत्तराखंड विधानसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है. दरअसल, अगले साल होने वाले पांच राज्यों के चुनाव में यूपी और पंजाब के साथ ही उत्तराखंड भी शामिल है.

पंजाब कांग्रेस प्रभारी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत राज्य में एक बार फिर से सियासी पारी खेलने के लिए जोर-आजमाइश में लगे हुए हैं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि पंजाब कांग्रेस प्रभारी होने के चलते सिद्धू और कैप्टन की इस लड़ाई में हरीश रावत को नुकसान झेलना पड़ सकता है. हालांकि, उत्तराखंड में अभी तक कांग्रेस की ओर से सीएम उम्मीदवार कौन होगा, इसका फैसला नहीं हो सका है. लेकिन, उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी देवेंद्र यादव समय आने पर सीएम का चेहरा तय करने की बात कर रहे हैं. पंजाब में चल रहे सियासी घमासान को ठीक से हैंडल नहीं कर पाने का दोष कहीं न कहीं हरीश रावत के सिर आ सकता है. अगर ऐसा होता है, तो उत्तराखंड में भी सिरफुटौव्वल की स्थिति बन सकती है.

उत्तराखंड में हरीश रावत और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के बीच CM फेस की रेस चल रही है. उत्तराखंड में हरीश रावत और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के बीच CM फेस की रेस चल रही है.

उत्तराखंड में CM फेस के फेर में फंसी कांग्रेस

उत्तराखंड में कांग्रेस, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के बीच चल रही CM फेस की रेस में फंसी हुई है. विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही यहां भी गुटबाजी सामने आने लगी है. इसी साल जनवरी में हरीश रावत ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में गुटबाजी को लेकर अपना दर्द बयां किया था. हालांकि, प्रीतम सिंह ने इसे रावत की प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा बताया था. हरीश रावत कांग्रेस आलाकमान से अपनी नजदीकी के चलते खुद को मुख्यमंत्री घोषित करने की मांग को हवा देने में लगे हैं. रावत गुट का कहना है कि भाजपा को हराने के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा होना बहुत जरूरी है. राज्य में नेता प्रतिपक्ष रहीं इंदिरा हृदयेश के निधन के बाद रावत गुट संगठन पर दबाव बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता है.

वहीं, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह सामूहिक नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ने की पैरवी कर रहे हैं. उत्तराखंड को लेकर कांग्रेस आलाकमान मंथन में जुटा हुआ है और दोनों नेताओं के बीच सियासी हल निकालने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं. इंदिरा हृदयेश के निधन से प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी खाली हो चुकी है. हरीश रावत गुट इस कुर्सी के सहारे ही पूरा खेल रचने की कोशिश कर रहा है. कहा जा रहा है कि रावत के लिए सीएम उम्मीदवार घोषित होने की राह में रोड़ा बने प्रीतम सिंह को संगठन से हटाकर नेता विपक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया गया है. वहीं, प्रीतम सिंह अपने किसी करीबी को अध्यक्ष पद पर काबिज करवाने के बाद ही नेता प्रतिपक्ष बनने को तैयार हैं.

उत्तराखंड में जातीय समीकरण के साथ ही क्षेत्रीय समीकरण भी काफी मायने रखता है. हरीश रावत कुमाऊंनी ठाकुर परिवार से आते हैं और प्रीतम सिंह गढ़वाली ठाकुर हैं. इस स्थिति में सीएम प्रत्याशी के तौर पर रावत के नाम की घोषणा होने पर गढ़वाल के ब्राह्मण नेता को प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान सौंपी जाएगी. वहीं, प्रीतम सिंह के नाम पर मुहर लगने पर किसी कुमाऊंनी ब्राह्मण नेता पर दांव खेला जाएगा. रावत और प्रीतम गुट इस पद पर अपने-अपने करीबियों को फिट करवाने की जुगत में लगे हुए हैं.

क्या पंजाब का फॉर्मूला उत्तराखंड में भी होगा इस्तेमाल?

पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की बात सामने आते ही सीएम अमरिंदर सिंह नाराज हो गए थे. इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से हुई सिद्धू की मुलाकात के बाद कैप्टन ने शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर चेतावनी देते हुए कहा कि पंजाब के मामलों में दखल न दें, वरना नुकसान हो जाएगा. वहीं, इस मामले को लेकर सांसद मनीष तिवारी ने एक ट्वीट में पंजाब में धार्मिक आधार पर जनसंख्या के आंकड़े पेश कर प्रदेश अध्यक्ष के पद पर हिंदू नेता पैरवी करते नजर आए. कैप्टन अमरिंदर सिंह भी नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बात पर राजी नहीं हैं. पंजाब को लेकर कांग्रेस आलाकमान जो भी फैसला लेगा, उसका असर उत्तराखंड में भी देखा जाएगा.

पंजाब में महीनों से चली आ रही इस सियासी उठापटक के बाद अगर शीर्ष नेतृत्व पंजाब में अमरिंदर सिंह के पक्ष में खड़ा होता है, तो उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले हरीश रावत भी कैप्टन की तरह बगावती सुर अपना सकते हैं. राज्य में फिलहाल कांग्रेस के 10 विधायक हैं और ज्यादातर रावत के पक्ष में हैं. अमरिंदर सिंह की तरह ही हरीश रावत का भी उत्तराखंड कांग्रेस में काफी प्रभाव माना जाता है. वहीं, कांग्रेस आलाकमान अगर कैप्टन से ऊपर नवजोत सिंह सिद्धू को तरजीह देता है, तो इसके बाद जो पंजाब कांग्रेस में होगा, वो उत्तराखंड में भी हो सकता है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रीतम सिंह कांग्रेस के खिलाफ विद्रोह छेड़ दें.

ऐसी किसी भी स्थिति के बनने पर अंततोगत्वा फायदा भाजपा को ही मिलेगा. कहा जा सकता है कि रावत ने पंजाब को अपनी राजनीति के लिए एक प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया है. अमरिंदर सिंह और हरीश रावत दोनों ही उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं, जहां वो नई कांग्रेस यानी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के खांचे में फिट नहीं होते हैं. देखना दिलचस्प होगा कि विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड में कांग्रेस किसे सीएम पद का उम्मीदवार बनाती है?

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