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Updated: 01 मई, 2019 07:45 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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2014 से अब तक यूपी में विपक्ष का एक ही दांव बीजेपी के खिलाफ चल पाया है - कैराना मॉडल. 2018 के उपचुनावों में विपक्ष का कैराना मॉडल इतना कारगर रहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी को वोट देने की अपील भी बेअसर रही.

कैराना से पहले बीजेपी के खिलाफ विपक्ष ने गठबंधन के कई प्रयोग किये. यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन भी एक प्रयोग ही रहा जो पूरी तरह फेल रहा. गठबंधन का गोरखपुर और फूलपुर मॉडल भी विपक्ष को कामयाबी दिलाया लेकिन उसका भी वही हाल हुआ जो विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी रही है. गोरखपुर में तो बीएसपी के सहयोग से समाजवादी पार्टी के टिकट पर जो उम्मीदवार जीता था वो भी बीजेपी में जा मिला. अब तो कम ही संभावना लगती है कि गोरखपुर और फूलपुर में विपक्ष उपचुनाव वाले नतीजे दोहरा पाएगा.

कैराना मॉडल की खासियत ये रही कि पूरा विपक्ष ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा था. गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव वो मॉडल है जिस पर विपक्ष फिलहाल बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उत्तर प्रदेश में जूझ रहा है. गोरखपुर और फूलपुर में सपा-बसपा तो साथ थे लेकिन मैदान में कांग्रेस ने भी प्रत्याशी खड़े कर रखे थे. कैराना में पूरे विपक्ष की एक ही उम्मीदवार रहीं तबस्सुम हसन. गोरखपुर और फूलपुर में कांग्रेस भी फील्ड में डटी रही. सिर्फ तबस्सुम हसन ही ऐसी नेता है जो फिर से कैराना के मैदान में डट गयी हैं. बाकी सीटों की तो बात ही छोड़ दें, विपक्ष के पास बेहतरीन मौका था, प्रधानमंत्री मोदी को वाराणसी में घेरने का - लेकिन वे ऐसे बिखरे कि चुनाव ही एकतरफा लगने लगा है.

बीजेपी को नुकसान पहुंचाने या फिर कांग्रेस की जीत को लेकर प्रियंका गांधी वाड्रा जो भी दावे करें, सच तो ये है कि उत्तर प्रदेश में बिखरे विपक्ष का पूरा फायदा बीजेपी को मिलता नजर आ रहा है. यूपी की ही तरह बिहार में भी महागठबंधन आपसी लड़ाई में उलझा हुआ है, कैसे उम्मीद की जाये कि वो एनडीए को चुनौती दे सकेगा, जब वे खुद ही एक दूसरे से जूझ रहे हैं.

वाराणसी में बेहतरीन मौका था, गवां डाला

वाराणसी में पूरे विपक्ष के पास बेहतरीन मौका था, सबने गवां डाला. पहले तो सुनने में आया कि प्रियंका गांधी वाड्रा बीजेपी उम्मीदवार प्रधानमंत्री मोदी को चैलेंज करेंगी. फिर अचानक एक दिन वाराणसी और गोरखपुर के कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी गयी. वाराणसी से दोबारा कांग्रेस ने अजय राय को भी उम्मीदवार बनाया. 2014 में अजय राय की जमानत जब्त हो चुकी है.

किसी एक उम्मीदवार पर विपक्ष में आम राय की कोशिश की बजाये समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस से शालिनी यादव को झटक कर अपना भी उम्मीदवार उतार दिया. जब अखिलेश यादव को लगा कि तेज बहादुर यादव काम के हो सकते हैं तो उन्होंने शालिनी यादव को पीछे करके तेज बहादुर को भी टिकट थमा दिया. कुछ देर के लिए शालिनी यादव पीछे हो गयीं और डमी उम्मीदवार बनी रहीं.

akhilesh yadavपहले राहुल गांधी और फिर अघखिलेश यादव ने मौका गवांया...

तेज बहादुर यादव ने दो हलफनामे दाखिल किये थे - एक बतौर निर्दलीय उम्मीदवार और दूसरा समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में. जब दोनों में फर्क पाया गया तो नोटिस जारी हुआ. जितनी देर की मोहलत मिली थी, उसमें जवाब देना मुश्किल ही थी. तेज बहादुर ने पहले 24 अप्रैल को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में दाखिल हलफनामे में बताया था कि भ्रष्टाचार के आरोप के चलते सेना से उन्हें बर्खास्त किया गया. जब 29 अप्रैल को समाजवादी पार्टी का टिकट मिलने पर दोबारा नामांकन किया तो हलफनामे ये जानकारी को छुपा ली - और यही चुनाव आयोग के नोटिस की वजह बना. अगर कोई व्यक्ति जो राज्य या केंद्र सरकार से भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त किया गया हो या सरकार के प्रति उसकी बगावत देखी गई हो तो उसे बर्खास्तगी की तारीख से 5 साल तक अयोग्य घोषित किया जा सकता है.

जिस बात का अंदेशा था, हुआ भी वही. वाराणसी से सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी तेज बहादुर यादव का नामांकन खारिज हो गया. लिहाजा डमी कैंडिडेट बनी शालिनी यादव को सामने आना पड़ेगा.

पहले भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आजाद रावण ने भी वाराणसी से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने की बात कही थी. शहर में जाकर रोड शो भी किया - लेकिन बाद में पीछे हट गये. कैराना उपचुनाव में चंद्रशेखर ने जेल से ही विपक्ष के उम्मीदवार का समर्थन किया था - और उसी तरह वाराणसी से तेज बहादुर यादव भी किया था. चंद्रशेखर आजाद के समर्थन पर पानी फिर गया. गौर करने वाली बात ये है कि चंद्रशेखर ने अपने इलाके में सहारनपुर से कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद को सपोर्ट किया है, जबकि वाराणसी में कांग्रेस प्रत्याशी के होते हुए गठबंधन का सपोर्ट किया था. तेज बहादुर का नामांकन रद्द होने के बाद स्टैंड जो भी हो मतलब क्या रह गया.

तेज बहादुर यादव, दरअसल, अखिलेश यादव को 'टू-इन-वन' नजर आये होंगे - एक तो उनकी बीएसएफ की पृष्ठभूमि और दूसरा यादव होना. एक रैली में अखिलेश यादव ने कहा भी, ‘भाजपा के लोग चुनाव प्रचार के दौरान आतंकवाद की बात कर रहे हैं. हमने वाराणसी से एक फौजी को टिकट देकर उनके इस मुद्दे की भी हवा निकाल दी है. वो फौजी असली है, जिसने सीमा पर देश की सुरक्षा की है. भाजपा के लोग कहते हैं कि उनकी वजह से देश सुरक्षित है - लेकिन हम कहते हैं कि हमारे जवानों की वजह से ही देश सुरक्षित है.'

अब तो ये हथियार भी फेल हो गया. अब अगर डमी प्रत्याशी फिर से शालिनी यादव सामने आती हैं तो सब कुछ नये सिरे से शुरू करना होगा. अब तो लोगों को ये शक भी हो सकता है कि जैसे तेजबहादुर के लिए शालिनी को पीछे कर लिया वैसे कहीं किसी और वजह से कर लिया दो क्या होगा? आज तक के साथ एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में प्रियंका वाड्रा ने वाराणसी से अपनी उम्मीदवारी के साथ साथ यूपी में सपा-बसपा गठबंधन को नुकसान पहुंचाने को लेकर भी सफाई दी है. प्रियंका वाड्रा का कहना है कि वाराणसी से चुनाव लड़ने को लेकर उन्होंने कांग्रेस की बात मानी है - क्योंकि उन्होंने कहा भी था कि पार्टी चाहेगी तो वो चुनाव जरूर लड़ेंगी.

वाराणसी से चुनाव न लड़ने के फैसले को लेकर प्रियंका वाड्रा ने कहा कि ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि वो एक सीट पर फोकस होतीं तो कांग्रेस के दूसरे उम्मीदवारों का प्रचार नहीं कर पातीं. कांग्रेस के चलते गठबंधन को नुकसान से प्रियंका वाड्रा ने साफ तौर पर इंकार किया है.

प्रियंका वाड्रा के मुताबिक, यूपी में कांग्रेस का उम्मीदवार या तो जीत रहा है या फिर बीजेपी के वोट काट रहा है, सपा-बसपा गठबंधन का तो कतई नहीं. प्रियंका वाड्रा ने कहा कि एक एक उम्मीदवार कांग्रेस ने पूरे रिसर्च के बाद उतारे हैं. सभी में राहुल गांधी सहित यूपी के नेताओं की भी राय ली गयी है.

कोई कुछ भी कहे, ये तो साफ है कि विपक्ष ने वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी को घेरने की जगह खुला मैदान छोड़ दिया है - और मुकाबला एकतरफा लगने लगा है.

जैसा यूपी वैसा ही बिहार का महागठबंधन का हाल है

जो हाल यूपी में सपा-बसपा गठबंधन का है तकरीबन मिलता जुलता बिहार के महागठबंधन का भी है. यूपी में कांग्रेस गठबंधन से बाहर है लेकिन बिहार में शुरू से ही उसका हिस्सा है. बावजूद इसके कहीं बागी चुनौती बने हुए हैं तो कहीं कहीं फ्रेंडली मैच भी चल रहा है.

1. सुपौल, बिहार : महागठबंधन में बिहार की सुपौल सीट कांग्रेस के हिस्से में आयी है. कांग्रेस ने सांसद रंजीत रंडन को दोबारा टिकट दिया है. गठबंधन में साथ होने के बावजूद आरजेडी कांग्रेस उम्मीदवार के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश यादव का समर्थन कर रही है. आरजेडी के पिपरा विधायक यदुवंश यादव ने दिनेश यादव का सपोर्ट किया था. वैसे सुपौल में 23 अप्रैल को वोट डाले जा चुके हैं.

दरअसल, झगड़े का कनेक्शन मधेपुरा से जुड़ा है. मधेपुरा में रंजीता रंजन के पति पप्पू यादव निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. मधेपुरा से आरजेडी ने जेडीयू से बागी होकर निकले सीनियर नेता शरद यादव को टिकट दिया है. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव चाहते थे कि पप्पू यादव मैदान से हट जायें, जब रंजीता के माध्यम से कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया तो नयी राजनीतिक चाल चली गयी.

2. मधुबनी, बिहार : महागठबंन में मधुबनी संसदीय सीट वीआईपी यानी विकासशील इंसान पार्टी के हिस्से में चली गयी तो कांग्रेस नेता शकील अहमद बागी हो गये. शकील अहमद निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गये हैं.

3. पटना साहिब, बिहार : चर्चित पटना साहिब सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा के लोकेशन और सिचुएशन वही बरकरार रखते हुए कांग्रेस ने टिकट तो दे दिया, लेकिन गठबंधन के ही दूसरे दल को उम्मीदवार खड़ करने से नहीं रोक पायी. वीआईपी ने पटना साहिब से रीता देवी को टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया है. वीआईपी के महासचिव छोटे साहनी की दलील है कि ऐसा नयी पार्टी होने के चलते करना पड़ रहा है. वीआईपी नेता का कहना है कि किसी भी नयी पंजीकृत पार्टी के लिए कम से कम 10 सीटों पर चुनाव लड़ना होता है - और महागठबंधन में पार्टी को सिर्फ खगड़िया, मधुबनी और मुजफ्फरपुर की ही सीट मिल पायी थी.

यूपी के कैराना में 2018 के उपचुनाव में कांग्रेस ने अपना कोई प्रत्याशी नहीं खड़ा किया था. सपा-बसपा गठबंधन ने तो मौजूदा सांसद तबस्सुम हसन को भी टिकट दिया है, लेकिन कांग्रेस ने भी हरेंद्र सिंह मलिक को मैदान में उतार दिया है. बीजेपी ने अपना उम्मीदवार बदलते हुए हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह की जगह प्रदीप चौधरी को टिकट दिया है.

2018 के उपचुनाव से तुलना करें तो कैराना में भी इस बार पुराने मॉडल को नजरअंदाज किया गया है और बीजेपी भी नये उम्मीदवार और नयी रणनीति के साथ सतर्क होकर चुनाव लड़ रही है. निश्चित तौर पर विपक्ष की चुनौती बढ़ी हुई है - और साफ लग रहा है कि कैराना मॉडल के अलावा विपक्ष के पास कहीं कोई कारगर उपाय नहीं है.

कैराना मॉडल पर मुकाबला और कहीं न सही वाराणसी में तो हो ही सकता था जहां कोई और नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद बीजेपी के उम्मीदवार हैं. जिस तरह विपक्ष वाराणसी में चुनाव लड़ रहा है, बेहतर होता मैदान से हट कर नरेंद्र मोदी को निर्विरोध चुने जाने का मौका दे देता - इज्जत भी बच जाती और जमानत भी.

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मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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