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Updated: 27 अप्रिल, 2019 03:47 PM
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सवालों से कोई परे नहीं होता. सवालों को लेकर अपवाद सिर्फ आस्था से जुड़े मामलों में हो सकते हैं. सवाल का जवाब कोई सवाल भी हो सकता है - और ये भी हो सकता है कि ऐसे सवालों और जवाबों का सिलसिला अंतहीन हो, बगैर किसी निष्कर्ष पर पहुंचे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अक्सर सवालों के कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है - क्योंकि, आरोप है, वो सवालों के जवाब नहीं देते. क्या वास्तव में ऐसा ही है? क्या प्रधानमंत्री मोदी सवालों से घबराते हैं? क्या मोदी सवालों से बचते हैं?

सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि कोई भी सवाल पूछने वाला जवाब कैसा सुनना चाहता है? अगर किसी सवाल का जवाब पूछने वाले के मनमाफिक नहीं है तो क्या उसे 'सही जवाब' नहीं माना जा सकता? लेकिन ऐसी शर्त कैसे रखी जा सकती है?

प्रधानमंत्री मोदी ने तो साल 2019 की शुरुआत ही इंटरव्यू से की है. ANI के उस इंटरव्यू में तकरीबन सभी मुद्दों पर सवाल पूछे गये और जवाब भी मिले - राम मंदिर पर अध्यादेश से लेकर नोटबंदी के फैसले तक. फिर भी सवाल उठे. इंटरव्यू में पूछे गये सवालों पर भी और सवाल पूछने वाले पत्रकार पर भी. ऐसा पूर्वाग्रह क्यों है?

हर सवाल का जवाब मिल सकता है!

सिर्फ कुदरत की कुछ पहेलियां ऐसी हैं जिनसे जुड़े सवालों के जवाब नहीं मिलते - वरना, हर सवाल का जवाब मिलता है, मिल सकता है और मिलता रहेगा. सवालों के जवाब के साथ बस छोटी सी शर्त हो कि चाहे जैसा भी हो, रिस्पॉन्स को जवाब माना जाये.

1 जनवरी 2019 को ANI के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू आया था. इंटरव्यू से तमाम बातें मालूम हुईं और उनमें सबसे बड़ी बात थी कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार राम मंदिर पर न तो कोई कानून बनाने जा रही है और न ही कोई अध्यादेश लाने जा रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ तौर पर कह दिया था कि केंद्र सरकार कोई भी फैसला तभी लेगी जब सुप्रीम कोर्ट का जवाब आ जाएगा.

क्या ये राम मंदिर पर जुड़ी आशंकाओं को अटकलों पर विराम देने के लिए नाकाफी था? क्या प्रधानमंत्री मोदी ने राम मंदिर के सवाल पर जवाब नहीं दिया था? और क्या प्रधानमंत्री मोदी से जो सवाल पूछा गया वो स्तरीय नहीं था या पूछने का तरीका सही नहीं था?

बड़ा सवाल तो यही है कि ये तय कौन करेगा? जाहिर है इस जवाब से उन सभी लोगों को निराशा हुई होगी जो राम मंदिर पर कानून या कम से कम अध्यादेश की अपेक्षा रखते थे.

क्या जवाब अपेक्षा के अनुरूप होता तभी सही माना जाता? क्या जवाब मंदिर समर्थकों के खिलाफ था इसलिए कहा जा सकता है - ये भी कोई जवाब हुआ? अगर सवाल पूछने वाले के मन में किसी और जवाब की अपेक्षा होती तो क्या ये सुनने के बाद जवाब खारिज कर दिया जाता?

अदालत के फैसलों पर सवाल नहीं उठाये जाते. फैसलों की समीक्षा के लिए बड़ी अदालत में जाने का हक मिला हुआ है. बड़ी अदालत जाने के बाद भी बार बार रिव्यू पेटिशन दायर करने का अधिकार मिला हुआ है - लेकिन मनमाफिक फैसला न होने की स्थिति में कोई पक्ष उसकी आलोचना नहीं कर सकता. अदालत के फैसलों का भी दोनों पक्षों पर अलग अलग असर होता है. सवालों के जवाब भी बहुत हद तक ऐसे ही होते हैं. अगर अदालत के फैसले पर टिप्पणी अवमानना है तो जवाबों को लेकर सवाल खड़े करना भी उससे कम नहीं है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भी प्रधानमंत्री मोदी का वो इंटरव्यू अच्छा नहीं लगा था. राहुल गांधी को सिर्फ मोदी के जवाबों से ही एतराज नहीं था, बल्कि सवाल पूछने वाले पत्रकार से भी वो बेहद खफा नजर आये. राहुल गांधी ने सवाल पूछने वाले के लिए भी एक खास शब्द का इस्तेमाल किया था - Pliable Journalist. मोटे तौर पर ऐसा पत्रकार जिसकी रीढ़ की हड्डी न हो.

घटनाओं और हादसों को छोड़ दें तो ज्यादातर खबरें सूत्रों के हवाले से ही आती हैं. हाल फिलहाल सूत्रों का हवाला देने का प्रचलन जरूर बढ़ा है. नतीजा ये होता है कि सूत्रों के हवाले से कभी खबर की जगह अफवाह भी चली आती है. जल्दबाजी में खबर चयन का फैसला गलत हो तो हादसा होना तय है. ऐसी एक खबर रही कि प्रधानमंत्री मोदी 26 अप्रैल को नामांकन के बाद प्रेस कांफ्रेंस कर सकते हैं. जब इसे खारिज करते हुए खबर आयी तो राहुल गांधी को मौका मिल गया और आव देखा न ताव तपाक से ट्वीट भी कर दिया - तुम से ना हो पाएगा.

सात मुद्दे और सवाल-जवाब

सिर्फ राम मंदिर के मामले पर ही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी से उस इंटरव्यू में उन तमाम मुद्दों पर सवाल पूछे गये थे जिन पर सरकार और प्रधानमंत्री की ओर से आधिकारिक बयान की अपेक्षा की जाती है. मोदी ने इंटरव्यू में राफेल से लेकर आरबीआई तक से जुड़े सवालों के जवाब दिये थे.

1. राफेल पर जवाब : राफेल डील को लेकर पूछे गये सवाल का जवाब भी वही था जो प्रधानमंत्री संसद में अपने भाषण में कहते हैं या चुनावी रैलियों में या फिर ट्विटर पर. इंटरव्यू में मोदी का जवाब था - 'कांग्रेस झूठ बोलती है और बार-बार दोहराती रहती है... ये एक पारदर्शी और ईमानदारी का सौदा है जो सरकार और सरकार के बीच हुआ है - बाकी सब झूठा प्रचार है जो देश हित को नुकसान पहुंचाता है.'

narendra modi2019 में मोदी ने पहला इंटरव्यू 1 जनवरी को दिया था.

जब भी राफेल की बात होती है प्रधानमंत्री यही बात तो कहते हैं. अगर कभी सुप्रीम कोर्ट की ओर से कुछ आ जाता है या फिर फ्रांस से किसी का बयान आ जाता है तो उस खास प्रसंग में कोई विशेष टिप्पणी कर देते हैं.

2. माल्या-नीरव-चोकसी : बैंकों का पैसा लेकर भागने के आरोपियों के बारे में मोदी का कहना रहा, 'इस सरकार के कार्यकाल के दौरान जो लोग भागे हैं उन्हें हम आज या कल वापस लेकर आएंगे. डिप्लोमैटिक तरीके से, कानूनी तरीके से और उनकी प्रॉपर्टी जब्त करके हम उन्हें वापस लाने की पूरी कोशिश करेंगे. जिन लोगों ने भारत का पैसा चुराया है उन्हें एक-एक पैसे का हिसाब देना होगा.'

जब भी विजय माल्या, नीरव मोदी या मेहुल चोकसी की बात होती है, प्रधानमंत्री की ओर से या सरकार की तरफ से यही कहा जाता है. किसी को ये जवाब अच्छे नहीं लगते तो उसकी निजी समस्या भी तो हो सकती है. है कि नहीं?

3. किसान कर्जमाफी : किसानों की कर्जमाफी कांग्रेस की अपनी पॉलिसी हो सकती है, जरूरी तो नहीं कि दूसरे दलों की भी वैसी ही नीतियां हों. कर्जमाफी पर मोदी का कहना रहा, 'ये एक झूठ है. इसे मैं लॉलीपॉप कहूंगा. ये एक झूठ है कि वो किसानों का कर्ज माफ कर रही है. सच्चाई यह है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है. उनके अपने सर्कुलर देखिए. वह लोगों को बरगला रहे हैं.'

2018 के विधानसभा चुनावों के बाद रायबरेली पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने तो यही बात कही - दूसरे मौकों पर भी मोदी का ऐसा ही बयान रहा. यहां तक कि गोरखपुर में किसान सम्मान निधि की घोषणा के मौके पर भी.

4. नौकरी/रोजगार : नौकरी और रोजगार के मामले में विपक्ष मोदी सरकार को घेरता रहा है. राहुल गांधी अक्सर इस मामले में चीन का हवाला देते हैं. कांग्रेस अध्यक्ष के आरोपों पर प्रधानमंत्री ने इंटरव्यू में कहा था, 'सितंबर 2017 से अप्रैल 2018 के बीच 45 लाख औपचारिक रोजगार पैदा हुए. ईपीएफओ के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल 70 लाख नए रोजगार पैदा हुए... पर्यटन में विकास, मुद्रा योजना के तहत लोन, स्टार्टअप और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर आये हैं.'

5. नोटबंदी : नोटबंदी को लेकर पूछ गये सवाल में भी प्रधानमंत्री मोदी का जवाब वही था जो बाकी मंचों पर होता है. इंटरव्यू में मोदी ने कहा था, 'नोटबंदी झटका नहीं था. हमने करीब एक साल पहले ही लोगों को इस बात की चेतावनी दे दी थी कि अगर आपके पास ब्लैकमनी है तो आप पर जुर्माना लग सकता है.'

narendra modiसवाल जवाब हंसते हंसते भी हो सकते हैं, सीरियस होकर दिखाना जरूरी नहीं...

क्या नोटबंदी को लेकर कुछ ऐसी अपेक्षा रही कि इंटरव्यू में ही मोदी को बोल देना चाहिये - 'हमसे भूल हो गयी... हमका माफी कर दो...'

6. RBI : आरबीआई को लेकर कई विवाद हुए रघुराम राजन के छोड़ने से लेकर उर्जित पटेल के इस्तीफे तक. न्यूज एजेंसी ANI के सवाल पर मोदी का कहना रहा, उर्जित पटेल ने अपने निजी कारणों की वजह से इस्तीफा दिया था. मैं पहली बार यह खुलासा कर रहा हूं कि उन्होंने ये बात मुझसे छह-सात महीने पहले ही कह दिया था. यहां तक कि उन्होंने यह बात मुझे लिखकर दिया था. उन पर किसी तरह का कोई राजनीतिक दबाव नहीं था. आरबीआई के गवर्नर के तौर पर उन्होंने काफी अच्छा काम किया था.'

जब उर्जित पटेल की नियुक्ति हुई तो उनका गुजरात कनेक्शन जोड़ा गया. जब इस्तीफा दिया तो नये विवाद उछाले गये - अब ऐसे सवालों का कोई अंत है क्या?

7. कांग्रेस मुक्त भारत : ऐसे सवाल तो इंटरव्यू में ही पूछे जाते हैं लेकिन ये मुद्दा पार्टी विशेष के लिए खास होता है. ऐसे सवाल पर मोदी का कहना है, 'कांग्रेस से जुड़े लोग भी कहते हैं कि कांग्रेस एक विचार है. एक कल्चर है. जब मैं कांग्रेस मुक्त देश की बात करता हूं तो मेरा मायना इस कल्चर और विचार से होता है... और मेरा ये कहना है कि कांग्रेस को भी इस कल्चर से मुक्त होना चाहिए.'

किसी को राहुल गांधी की आपत्ति पर आपत्ति नहीं होनी चाहिये, ठीक वैसे ही जैसे मोदी के जवाब पर. राहुल गांधी कहते हैं कि वो मोदी की तरह 'बीजेपी मुक्त भारत' नहीं चाहते. राहुल गांधी का तर्क है कि वो नफरत नहीं करते, बल्कि प्यार करते हैं.. बढ़िया है, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है - लेकिन गले मिल कर आंख मारना क्या कहलाता है?

इंडिया टुडे को दिये इंटरव्यू में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से जुड़ा एक सवाल पूछा गया तो प्रधानमंत्री ने 2002 के गुजरात दंगों की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया - मेरे ऊपर भी ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाये गये थे.

अब तो जाकी रही भावना जैसी - जवाब में भी उसके मन में वैसे ही सवाल उठेंगे.

अब किसी को ऐसी अपेक्षा हो कि उसके सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी इंटरव्यू में ही माफी मांग लें - फिर तो बहस ही बेकार है. राहुल गांधी के 'Pliable Journalist' की ही तरह केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह ने पत्रकारों के लिए 'प्रेस्टिट्युट' शब्द का इस्तेमाल किया था - और उसी ट्रेंड का हिस्सा एक और टर्म है - 'गोदी मीडिया'. अहम ये नहीं कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कौन करता है, महत्वपूर्ण ये है कि ऐसे शब्दों की जरूरत पड़ती ही क्यों है? लगता तो ऐसा है कि किसी एक पक्ष के सपोर्ट में खड़े होकर दूसरे पक्ष को नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है. किसी एक की 'गोदी' में बैठ कर की दूसरी तरफ वाले को 'गोदी मीडिया' का हक किसी को कैसे मिल जाता है?

जवाब मनमाफिक कैसे मिल सकता है?

अक्षय कुमार के साथ मोदी के इंटरव्यू की खूब चर्चा हो रही है. मोदी के उस इंटरव्यू को गैर-राजनीतिक कह कर माखौल भी उड़ाया जा रहा है. ऐसा ही रवैया साल भर पहले उस बातचीत को लेकर अपनाया गया जिसे प्रसून जोशी ने होस्ट किया था.

क्या ये सब इसलिए अनोखा लग रहा है कि देश के प्रधानमंत्री का ऐसा इंटरव्यू क्यों हो रहा है? ऐसा इंटरव्यू तो किसी फिल्म स्टार या दूसरी सेलेब्रिटी का ही होना चाहिये? किसी पॉलिटिशियन का तो कत्तई नहीं. ये ठीक है कि मैडिसन स्क्वॉयर के शो में कुछ मार्केटिंग के फंडे भी अपनाये गये थे, लेकिन आयोजन और मोदी की परफॉर्मेंस को तो किसी रॉकस्टार से कम नहीं समझा गया.

लेकिन क्या ये सब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद ही कर रहे हैं? उससे पहले कभी कुछ नहीं किया? ऐसा बिलकुल नहीं है.

नरेंद्र मोदी देश के पहले राजनेता हैं जिन्होंने गूगल हैंगआउट पर देश भर क्या दुनिया भर के लोगों से संवाद किया था. गूगल करके देखा जा सकता है कि हैंगआउट पर लोगों ने मोदी से कैसे कैसे सवाल किये थे - आप कितनी देर सोते हैं? आपकी पसंद-नापसंद क्या क्या है? ऐसे सवाल तो किसी फिल्म स्टार से ही पूछे जाते हैं - लेकिन अगर देश के लोग अपने नेता से पूछ रहे हैं तो किसी को ऐतराज क्यों होना चाहिये? प्रसून जोशी और अक्षय कुमार के इंटरव्यू उसी का एक्सटेंशन ही तो है. है कि नहीं?

अगर किसी मामले पर कोई राजनेता या शख्सियत या वो कोई भी जो सवालों के घेरे में हो, चुप रह जाता है तो भी सवाल उठते हैं. कहा जाता है कि खंडन तक नहीं किया. जब खंडन भी जवाब हो सकता है तो सीधे सीधे कही गयी बात को माकूल जवाब क्यों नहीं माना जा सकता?

अगर कोई शख्सियत या राजनेता किसी भी माध्यम से अपना बयान जारी करता है तो उसे उचित जवाब क्यों नहीं माना जा सकता? प्रेस कांफ्रेंस की जरूरत तब पड़ी जब विज्ञप्तियों से काम नहीं चल पाता रहा. तकनीकी दौर में टेलीफोन और दूसरे माध्यमों से होते हुए सोशल मीडिया आ चुका है.

क्या सोशल मीडिया पर कही गयी कोई बात किसी का जवाब नहीं हो सकती?

ये आम धारणा है कि सोशल मीडिया पर एकतरफा संवाद होता है - ट्विटर पर ट्रोल हो जाता है और सवाल-जवाब नहीं हो पाता? हद है!

ये सब सिर्फ परसेप्शन की बात है. कहीं ऐसा तो नहीं कि इंटरव्यू को भी वैसे ही समझा जाने लगा हो जैसे इंवेस्टिगेशन हो जो जांच एजेंसियों का काम है, मीडिया का नहीं. इंटरव्यू में ये अपेक्षा भी नहीं होनी चाहिये कि जवाब भी सवाल करने वाले के मनमाफिक ही मिले.

अगर किसी को सवाल पूछने के अधिकार मिला है, तो जवाब देने का अधिकार भी सुरक्षित है. 'नो कमेंट्स' भी जवाब ही होता है - और चुप रह जाना भी. मनमोहन सिंह को 'मौनमोहन' तक कहा गया, तब भी जब वो अपनी तरफ से जवाब तो दे ही चुके थे - 'हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी'.

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