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Updated: 12 जून, 2021 03:42 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की मोदी-शाह से नाराजगी के चर्चे तो पहले ही आम हो चुके थे. सबको ये भी मालूम हो चुका था कि दिल्ली से फटाफट वीआरएस दिलाकर अरविंद शर्मा को लखनऊ भेजा जाना योगी आदित्यनाथ को बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा था - और फिर तत्काल प्रभाव से विधान परिषद भेज दिया जाना तो जैसे जले पर नमक छिड़कने जैसा था.

जब RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले की मीटिंग में न बुलाये जाने से नाराज होकर योगी आदित्यनाथ सोनभद्र चले गये - और वहां से मिर्जापुर होते हुए गोरखपुर निकल गये तभी उनको अंदाजा हो जाना चाहिये था कि उनकी एक छोटी सी चूक भी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

योगी आदित्यनाथ लखनऊ नहीं लौटे और उनके दफ्तर से भी जब कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला तो एक दिन इंतजार के बाद दत्तात्रेय होसबले संघ के लोगों से बातचीत करके लौट गये. वैसे जिस मीटिंग को लेकर योगी आदित्यनाथ नाराज थे, उसमें तो यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह को भी नहीं बुलाया गया था.

बहरहाल, हुआ तो हुआ. मिजाज भी नहीं बदला. अभी कुछ और भी सोच पाते तभी दिल्ली में यूपी के ही कांग्रेस के ब्राह्मण फेस रहे जितिन प्रसाद को भगवा ओढ़ाने के बाद आगे के लिए भी संदेश साफ कर दिया गया - समझते देर नहीं लगी होगी कि नाम भले अलग हो जितिन प्रसाद भी दूसरे अरविंद शर्मा ही हैं. जिस तरीके से जितिन प्रसाद को हाथोंहाथ लिया गया - वे सब तो उनके उज्ज्वल भविष्य के संकेत ही हैं.

अभी योगी आदित्यनाथ ये समझने की कोशिश में होंगे कि कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के भरोसेमंद अफसर रहे अरविंद शर्मा को आगे बढ़ने से कैसे रोकें, तभी ताबड़तोड़ मुलाकातें करके अमित शाह (Amit Shah) ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि आगे से यूपी में कोई ऑडियो भी नहीं वायरल हो पाएगा जिसमें 'ठाकुरों की सरकार' जैसी बातें सुनायी देंगी. एक बार गोरखपुर शहरी के विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल का एक ऑडियो वायरल हुआ था जिसमें ऐसी ही बातें सुनी गयी थीं. अग्रवाल को पहली बार से लेकर अब तक विधानसभा भेजने वाले कोई और नहीं योगी आदित्यनाथ ही हैं.

क्या ऐसा नहीं लगता कि योगी आदित्यनाथ को मोदी-शाह ने संघ की उसी जादुई छड़ी के सहारे घेर लिया है जिसके बूते वो कुर्सी पर काबिज हुए थे - योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो बस शिष्टाचार के नाते मुलाकात की होगी क्योंकि अमित शाह ने तो पहले ही सब सेट कर दिया था.

योगी आदित्यनाथ अकेले जिम्मेदार कैसे

जनवरी में ही बीजेपी एमएलसी अरविंद शर्मा के लखनऊ में डेरा डालते ही यूपी की राजनीतिक तस्वीर बहुत हद तक साफ हो चुकी थी. योगी आदित्यनाथ को भी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर खतरे की भनक तो लग चुकी थी - और अपनी क्षमता भर काउंटर करने की कोशिश भी किये, लेकिन न्यूट्रलाइज नहीं कर पाये. ऐसा कर पाना योगी आदित्यनाथ के वश की बात भी नहीं थी, लेकिन इतना तो कर ही सकते थे कि उनकी तरफ से कोई गलती न हो. कोई कमजोर कड़ी न छोड़ें जिसका मौका मिलते ही उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके.

योगी आदित्यनाथ ने कोरोना संकट के बीच ही मोदी-शाह को मौका दे दिया. जब योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक तौर पर दुरूस्त रहने की कोशिश करनी चाहिये थी, तब भी अपनी एनकाउंटर स्टाइल वाली पॉलिटिक्स के चक्कर में पड़े रहे. आगे पीछे न देखने की जरूरत समझी, न खबर रखने की.

कोविड 19 को लेकर इंतजामों की जिम्मेदारी तो केंद्र की मोदी सरकार ने पहले से ही राज्यों पर डाल दी थी, लेकिन ऑक्सीजन सप्लायी से लेकर वैक्सीनेशन तक बहुत सारी चीजें राज्यों के हाथ में नहीं थीं - ऊपर से प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कह रखा था कि लॉकडाउन आखिरी उपाय होना चाहिये. बस योगी आदित्यनाथ ने इसी बात को गांठ बांध ली.

amit shah, yogi adityanathअमित शाह ने योगी आदित्यनाथ को वैसे ही घेर लिया है जैसे कोविड 19 की पहली लहर अरविंद केजरीवाल घिर गये थे

लोग अपनों की जान बचाने के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भागते रहे. कभी ऑक्सीजन के लिए तो कभी सिलिंडर भरवाने के लिए. कभी जरूरी दवाइयों के लिए तो कभी अस्पताल में एक बेड पा जाने के लिए - और भागदौड़ के दरम्यान मरीज दम भी तोड़ देता.

कहीं से कोई मदद नहीं मिल पा रही थी - और ये सिर्फ आम लोगों की बात नहीं थी, यूपी में भी सत्ताधारी बीजेपी के नेताओं, विधायकों और सांसदों की कौन कहे, मंत्रियों तक के सामने भी मदद कर पाने का कोई इंतजाम नहीं नजर आ रहा था. जब यूपी के लोग जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे तो उनका मुख्यमंत्री किसी और राज्य में जाकर पार्टी के लिए वोट मांग रहा था - और उसी दौरान खुद भी संक्रमण का शिकार होकर होम आइसोलेशन से कामकाज देखना पड़ा.

कोरोना वायरस की तबाही रोकने के तमाम उपाय किये जा सकते थे, लेकिन मालूम हुआ कि पूरे देश में न तो कोई तैयारी की गयी और न ही जरूरत के हिसाब से फौरी इंतजाम.

सवाल ये है कि क्या कोरोना वायरस से मची तबाही के लिए सिर्फ योगी आदित्यनाथ को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

जो हाल यूपी में था वही हाल तो बिहार में भी था. मध्य प्रदेश में भी था और हरियाणा में भी - और थोड़ा ज्यादा खराब कहें तो दिल्ली और महाराष्ट्र में. अगर बाकी राज्यों में भी वही आलम रहा तो फिर अकेले योगी आदित्यनाथ से ही सवाल क्यों किये गये - और क्या सवाल करने वालों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती?

बाकी राजनीति अपनी जगह हो सकती है, लेकिन कोरोना संकट के मामले में योगी आदित्यनाथ को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. ये वही योगी आदित्यनाथ हैं जो कोरोना की पिछली लहर में हीरो बने हुए थे. योगी आदित्यनाथ के काम से नीतीश कुमार जैसे मुख्यमंत्री भी परेशान नजर आ रहे थे. नीतीश कुमार को बर्दाश्त नहीं हो रहा था कि कैसे योगी आदित्यनाथ यूपी के लोगों को दूसरे राज्यों से उनके घर पहुंचा रहे हैं.

जब अचानक से नोटबंदी वाले अंदाज में संपूर्ण लॉकडाउन लागू कर दिया गया तो दिल्ली में रहने वाले प्रवासी मजदूर अचानक सड़कों पर उतर आये और घर जाने के लिए सीमाओं पर पहुंच गये. बाकी लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे थे, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने रातोंरात बसों का इंतजाम किया और लोगों को पहुंचाने लगे. जब हालात देश भर में बेकाबू होने लगे तो यूपी में भी हुए, लेकिन तब योगी आदित्यनाथ बाकियों के मुकाबले अपने लोगों का ज्यादा ख्याल रखते देखे गये.

बेशक योगी आदित्यनाथ कोरोना संकट के बीच अरविंद केजरीवाल की तरह ऑक्सीजन के लिए मोदी सरकार को निसाना बनाकर शोर नहीं मचा सकते थे, लेकिन वे काम तो कर ही सकते थे जो उनके वश में थे. जितनी कुव्वत रही उसके हिसाब से जरूरी इंतजाम तो कर ही सकते थे.

जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पांच शहरों में लॉकडाउन लगाने को कहा तो योगी सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाने की क्या जरूरत थी? हाई कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए चुपचाप लॉकडाउन लगा देते. अब उसके लिए तो दिल्ली से दबाव बनाया नहीं जा सकता था - वो तो कोर्ट का ऑर्डर था.

योगी आदित्यनाथ, दरअसल, उन गलतियों की भी सजा भुगतने को तैयार हो गये हैं जिनके लिए उनसे कहीं ज्यादा जिम्मेदार दिल्ली में बैठे उनकी पार्टी के ही लोग हैं - वे लोग जो योगी आदित्यनाथ को तलब कर जवाब मांग रहे हैं.

अगर योगी आदित्यनाथ से यूपी सरकार के कामकाज पर रिपोर्ट कार्ड लेकर सवाल पूछा जा सकता है तो केंद्री की मोदी सरकार से क्यों नहीं पूछा जा सकता?

मोदी-शाह के जाल में ऐसे फंसते गये योगी

योगी आदित्यनाथ से बड़ी गलती ये हुई कि वो दत्तात्रेय होसबले को लेकर भी तैश में आ गये. ये भूल गये को वो दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ साथ जेपी नड्डा से मिलने के बाद लखनऊ पहुंचे हैं. जाहिर है, दत्तात्रेय होसबले के पास तभी से योगी आदित्यनाथ के खिलाफ शिकायतों का पिटारा रहा होगा.

अव्वल तो योगी आदित्यनाथ को दत्तात्रेय होसबले से मिलकर अपना पक्ष रखना चाहिये था - और अपनी तरफ से राजनीतिक बचाव के उपाय भी करने चाहिये थे, लेकिन वो तो संघ के कर्ताधर्ता से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा.

दत्तात्रेय होसबले के योगी आदित्यनाथ से मिले बगैर ही चले आने के बाद, जाहिर है लखनऊ जाने से पहले बीजेपी के संगठन महासचिव बीएल संतोष भी उनसे संपर्क किये ही होंगे क्योंकि मुद्दा एक ही था.

बीएल संतोष ने लखनऊ पहुंच कर 15 मंत्रियों और विधायकों का फीडबैक लेकर लौटे. फीडबैक भी वही होगा कि जब सरकार को लेकर सवाल उठ रहे थे, पूरे यूपी में कोई अफसर मंत्रियों और विधायकों के फोन तक पर कोई ठीक से रिस्पॉन्ड नहीं कर रहा था.

मोदी से पहले अमित शाह के दरबार में जब योगी आदित्यनाथ की हाजिरी लगी होगी तो सबसे पहले तो रिपोर्ट कार्ड ही पेश किया गया होगा - फिर जवाब मांगे गये होंगे. जैसे स्कूलों में प्रिंसिपल ऑफिस में हुआ करता है, नजारा जरा भी अलग नहीं रहा होगा. वैसे भी सबको एक ही लाइन से और एक ही ठोका तो नहीं जा सकता. कभी कभी तो ऐसा होता ही है कि मुंह से भी ठांय-ठांय बोलते नहीं बनता.

अमित शाह ने दरबार में ही साफ कर दिया होगा कि यूपी में सत्ता में वापसी के लिए बीजेपी अकेले योगी आदित्यनाथ के भरोसे बैठे रहने का जोखिम तो उठाने से रही. आखिर गोरखपुर उपचुनाव के नतीजे अमित शाह के मन में आशंकाओं को जन्म तो दे ही रहे होंगे. तब चर्चा तो ये भी रही ही कि योगी आदित्यनाथ ने अपने मनमाफिक उम्मीदवार को टिकट न दिये जाने पर कैंपेन से ही मुंह मोड़ लिया था - और अगर मुख्यमंत्री पद को लेकर भी ऐसी ही आशंका योगी आदित्यनाथ के मन में हो चुकी हो, फिर तो कुछ भी संभव है.

अमित शाह के सवालों का लहजा भी तो कुछ ऐसा ही रहा होगा कि क्या उनको बीजेपी की सत्ता में वापसी में दिलचस्पी नहीं है या क्या वो आगे भी मुख्यमंत्री बने रहना नहीं चाहते?

योगी आदित्यनाथ भले ही बीजेपी के साथ एक गठबंधन पार्टनर की तरह पेश आते रहे हों, लेकिन अभी वो शिवसेना की तरह पाला बदल कर अपनी नयी दुकान खोल पाने की स्थिति में तो बिलकुल नहीं होंगे. वैसे महाराष्ट्र में भी ये काम चुनाव नतीजे आने के बाद ही संभव हो पाया था. यूपी को लेकर चांस कम ही हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ साथ बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा पहले से ही सुपर अलर्ट मोड में हैं - और ये सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गहन निगरानी में चल रहा है.

दिल्ली दौरे की पहली ही मुलाकात में अमित शाह ने खुद ही योगी आदित्यनाथ के सामने सारी बातें साफ कर दी होंगी. प्रधानमंत्री मोदी से योगी आदित्यनाथ की मुलाकात को तो शिष्टाचार का हिस्सा समझा जा सकता है - और जेपी नड्डा के साथ मीटिंग भी महज एक रस्मअदायगी भर है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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