होम -> सियासत

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 02 मई, 2021 11:32 AM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
  • Total Shares

टीवी पर तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) पूरे विधानसभा चुनाव के दौरान कहीं न कहीं देखने को मिलते ही रहे, लेकिन उस खास रूप में लंबे इंतजार के बाद सामने आये - कोरोना संकट को लेकर राष्ट्र के नाम संबोधन देने.

राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले प्रधानमंत्री मोदी देश के मुख्यमंत्रियों के साथ मीटिंग भी की थी. मुख्यमंत्रियों की शिकायतें, सलाह और डिमांड के बाद - प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कर दिया था कि लॉकडाउन का फैसला तो राज्य सरकारों को ही लेना है, लेकिन ये आखिरी विकल्प होना चाहिये.

बाद में मन की बात कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ डॉक्टरों और कोविड से जुड़े लोगों को जोड़ कर पेश किया और ऐसा लगा जैसे वो अपनी बातें न बोल कर प्रोग्राम को होस्ट कर रहे हों. देश में कोरोना वायरस (Coronavirus) संक्रमण के चलते मरीज और उनके घर-परिवार के लोग और दोस्त या रिश्तेदार सड़क पर दूसरी लहर (Covid Second Wave) में भी वैसे ही भागते फिर रहे हैं जैसे पिछली दफा प्रवासी मजदूर भूखे प्यासे बस चले जा रहे थे - जैसे उन दिनों मौत कभी हाइवे पर आ टपकती थी तो कभी रेल की पटरियों पर कुचलते हुए निकल जाती थी और देखने को बस कुछ रोटियां निशान बन कर रह जाती थीं. इस बार उससे भी बुरा हाल हो चुका है.

तबीयत खराब होने पर टेस्ट कराने के लिए लोग जूझ रहे हैं. कोविड पॉजिटिव होने के बाद हालत खराब होने पर अस्पताल में बेड के लिए संघर्ष कर रहे हैं और दाखिले के बाद भी जगह जगह ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए मारामारी चल रही है. बदकिस्मती से मौत आ गयी तो भी लाइन लगानी पड़ रही है - चाहे श्मशान हो या कब्रिस्तान.

राष्ट्र के नाम संबोधन में तो प्रधानमंत्री मोदी ने बडे आत्मविश्वास के साथ कहा था कि देश कोरोना वायरस के खिलाफ पहली लड़ाई उस हालत में भी जीत गया जब न तो वैक्सीन आयी थी और न ही तब ऐसी कोई उम्मीद ही रही कि कब तक कोई वैक्सीन आएगी, इसलिए ये दौर भी वैसे ही देश जीत लेगा.

ऐसी बातें सुन कर दिल को एक पल के लिए सुकून तो मिलता है, लेकिन फिर जैसे ही व्हाट्सऐप पर किसी करीबी के दुनिया छोड़ कर चले जाने या सोशल मीडिया के जरिये जान पहचान के लोगों के अचानक गुजर जाने की खबरें मिलती हैं तो बहुत कचोटती हैं.

हर स्रोत से आने वाली खबरें इन दिनों डराने लग रही हैं. कहीं ऑक्सीजन की ब्लैक मार्केटिंग हो रही है, तो कहीं कुछ ही दूरी के एंबुलेंस के लिए हजारों रुपये वसूले जा रहे हैं - हर तरफ मौत ही दिखायी पड़ रही है.

क्या प्रधानमंत्री मोदी के पास पहले से कोई ऐहतियाती उपाय नहीं थे कि देश के लोगों को ऐसी विपदा से पहले से ही तैयारी करके बचा लिये होते - ऐसा क्यों लगने लगा है जैसे किसी गुमनाम सिस्टम के भरोसे लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया हो - अब हौसलाअफजाई की कौन कहे, अब तो प्रधानमंत्री लगता है ढाढ़स बंधाने के लिए भी टीवी पर आने से परहेज करने लगे हैं!

1. पिछली बार की तरह टीवी पर आकर हौसलाअफजाई नहीं किये

अभी की बात और है - लेकिन बिहार चुनाव के बाद भी, बल्कि, कहें तो पश्चिम बंगाल चुनाव की शुरुआत तक प्रधानमंत्री मोदी को लेकर कहीं कोई गुस्सा नहीं था. न ही कोई विदेशी मीडिया देश में कोरोना के विकराल संकट के लिए मोदी सरकार की आलोचना कर रहा था.

कोरोना की ताजा लहर आने से पहले तक तो हर तरफ मोदी मोदी ही होता रहा. ये मोदी ही हैं जो अकेले अपने बूते ही बिहार में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में बने आरजेडी महागठबंधन से कड़ी टक्कर मिलने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरने नहीं दिया. बीजेपी ने उनके पर कतर के छोटे कर दिये ये बात और है. बीजेपी ने अरुणाचल प्रदेश में नीतीश कुमार के छह विधायक झटक लिये, ये भी अलग मामला है.

बिहार चुनाव के आस पास मूड ऑफ द नेशन सर्वे में मोदी को देश का सबसे लोकप्रिय नेता पाया गया था. यहां तक कि हाल के ऑडियो लीक से सामने आया कि ममता बनर्जी की चुनावी मुहिम चलाते हुए भी प्रशांत किशोर ने माना कि मोदी की लोकप्रियता पूरे देश मे सबसे ज्यादा. बाद में भी जब कई इंटरव्यू में लोगों ने प्रशांत किशोर से सवाल पूछे तो राहुल गांधी और मोदी की तुलना में जमीन आसमान का फर्क बताते रहे. -

कहने का मतलब ये है कि कोरोना की दूसरी लहर के आते ही अगर प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से जनता कर्फ्यू जैसी अपील की होती - तो क्या लोग उस पर अमल नहीं करते?

narendra modiमोदी की एक अपील पर देश में जनता कर्फ्यू लग जाता है - क्या कहने पर लोग खुशी खुशी मास्क भी नहीं लगाते?

जब लोग प्रधानमंत्री मोदी की बात इतनी मानते हैं तो क्या एक बार टीवी पर आकर वे बातें भी नहीं समझा सकते थे जो जो एम्स के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया कैमरे पर लगातार बताते आ रहे हैं - जैसे रेमडेसिविर के पीछे भागने की जरूरत नहीं है, ये फैसला डॉक्टरों को करने दें.

जैसे, अस्पताल में भर्ती होने के लिए नहीं दौड़ पड़ें जब डॉक्टर बोले तब जाकर ही ऐसा करें.

जैसे, ऑक्सीजन के लिए भी बिलकुल भी पैनिक न हों - अस्पताल को ही ऐसे इंतजाम करने दें.

लगे हाथ केंद्रीय एजेंसियों को सक्रिय होने का इशारा कर देते - जैसे वे बंगाल चुनाव के दौरान अभिषेक बनर्जी की पत्नी से पूछताछ करने पहुंचीं, क्या देश भर में ऑक्सीजन और दवाइयों की कालाबाजारी करने वालों को नहीं धर दबोच लेतीं?

ऐसा भी तो हो सकता था - बीच बीच में कभी ताली बजवा लेते, कभी थाली बजवा लेते. कभी कैंडल तो कभी मोबाइल वाली दिवाली भी मनाने को कहते. लोग लगे रहते. कुछ न कुछ करने में व्यस्त रहते. कम से कम बाजारों में बगैर मास्क लगाये टूट तो नहीं पड़ते - और अगर ऐसे उपाय पहले से ही किये गये होते तो क्या कोरोना काबू में नहीं रहता?

2. वैज्ञानिकों की सलाह नहीं मानना क्या गलती नहीं है

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने खबर दी है कि केंद्र सरकार की तरफ से बनाये गये वैज्ञानिकों के पैनल ने मार्च के शुरू में ही संबंधित अधिकारियों को कोविड के नये और पिछले के मुकाबले ज्यादा संक्रामक वैरिएंट को लेकर आगाह कर दिया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर, 2020 में ही साइंटिफिक सलाहकारों का एक फोरम भारतीय SARS-CoV-2 जेनेटिक कंसोर्शियम (INSACOG) गठित हुआ था जिसका मकसद उन वैरिएंट्स का पता लगाना रहा जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हों. फोरम ने देश की 10 लैब्स को भी साथ लिया जो वायरस के वैरिएंट्स की स्टडी में सक्षम हैं.

और तीन महीने बाद ही, रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार को ऐसी चेतावनी दे दी गयी थी. पहचान छुपा कर जानकारी देने वाले एक वैज्ञानिक के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि ये जानकारी एक बड़े अफसर को दी गयी थी जो सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रिपोर्ट करते हैं.

नये भारतीय वैरिएंट के दो महत्वपूर्ण म्यूटेशन हैं जो मनुष्य की कोशिकाओं से चिपक जाते हैं - और ऐसे वैरिएंट्स महाराष्ट्र में लिये गये 15-20 फीसदी सैंपल में मौजूद पाये गये हैं.

हालांकि, रिपोर्ट में न्यूज एजेंसी इस बात की पुष्टि करने में नाकाम रही है कि वास्तव में वैज्ञानिक सलाहकारों ने जो अलर्ट भेजा था वो प्रधानमंत्री तक पहुंच पाया या नहीं. रॉयटर्स के मुताबिक, प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क कर ये जानने जरूर की गयी, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला.

हाल ही में सूत्रों के हवाले से ही देश के आला अफसरों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मीटिंग और और उसमें उनकी नाराजगी की खबर भी आयी थी. तब ये बताया गया कि प्रधानमंत्री मोदी इस बात से खासे नाराज थे कि एक्सपर्ट पैनल बनाने का क्या फायदा जब कोरोना वायरस के इस रूप में पहुंच जाने से पहले कोई तैयारी ही नहीं हुई.

सवाल ये है कि क्या वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर अलर्ट के तौर पर जो रिपोर्ट दी थी - क्या प्रधानमंत्री मोदी किसी ऐसे ही पैनल की सिफारिशों को लेकर गुस्से में थे? क्या ये किसी बड़े अफसर की चूक का ही नतीजा हो सकता है कि पैनल ने अपना काम तो किया लेकिन उस पर ध्यान नहीं दिया गया और हालात इस कदर खराब हो गये.

3. हरिद्वार में कुंभ को लेकर एहतियाती उपायों पर ध्यान नहीं दिया जाना आखिर क्या है

बेशक प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि से कुंभ के दो शाही स्नान के बाद प्रतीकात्मक रखने की अपील की थी, लेकिन ये काम क्या पहले नहीं हो सकता था?

आज तक की एक रिपोर्ट के अनुसार, कुंभ में शामिल 10 संतों की अब तक कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते मौत हो चुकी है. बाहर जो लोग कोरोना वायरस के शिकार हुए हैं वे तो अलग ही हैं.

कुंभ के आयोजन को लेकर एक सबसे बड़ी चूक हुई है, वो है कोविड निगेटिव रिपोर्ट के साथ एंट्री की अनिवार्यता खत्म कर दिया जाना. पहले से तो ऐसा ही आदेश था, लेकिन तभी उत्तराखंड में सत्ता की कमान बदली और तीरथ सिंह रावत शपथ लेते ही भक्ति भाव में इस कदर डूब गये है कि कोरोना वायरस के खतरे को भी भूल बैठे. वैसे भी खुद कोरोना पॉजिटिव होने से पहले उनका विचार यही था कि गंगा के प्रभाव से कोरोना का बेअसर हो जाता है.

अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि कोरोना वायरस को लेकर निगरानी रख रही केंद्र सरकार की टीम ऐसी चीजों से बेखबर रही होगी. अगर वक्त रहते नये नवेले और जोश से भरपूर मुख्यमंत्री को इस फैसले पर विचार करने को कहा जाता तो बात कुछ और होती.

4. लॉकडाउन न सही कोई सख्त गाइडलाइन तो जारी हो ही सकती थी

मार्च, 2020 में हड़बड़ी में लॉकडाउन लागू करने को लेकर केंद्र सरकार को इतनी आलोचना झेलनी पड़ी कि कुछ महीनों बाद ही इसका फैसला राज्यों की सरकारों के हवाले कर दिया गया था. कब और कितना छूट देना है धीरे धीरे केंद्र सरकार ने ये सब पिछले साल ही राज्य सरकारों पर छोड़ दिया था.

मान लेते हैं कि देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे थे. कोरोना वायरस फैलने से बेकाबू होते हालात को शुरू में ही कंट्रोल करने की कोशिश नहीं की - जैसे, पिछली बार लॉकडाउन लागू कराने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय पश्चिम बंगाल सरकार को बार बार नोटिस भेजता रहा, फिर केंद्रीय टीम भेजी गयी. बाद में बिहार सहित कई राज्यों में भी मदद के लिए केंद्रीय टीमें पहुंची थीं - अगर इस बार भी ऐसी कोशिशें होतीं तो भी क्या ऐसा ही बुरा हाल होता?

लॉकडाउन का फैसला भले राज्यों पर छोड़ दिया जाता, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर गाइडलाइन तो जारी रखी ही जा सकती थी. जैसे एयरपोर्ट पर सख्ती लगातार बरती जाती रही रही. न सिर्फ इंटरनेशनल बल्कि डोमेस्टिक पर भी. बगैर थर्मल स्कैनिंग के और बिना मास्क लगाये एंट्री नहीं मिलती रही. ट्रेनों में भी ऐसी सख्तियां रहीं. फ्लाइट में भी मास्क और फेसशील्ड के साथ साथ गाउन तक पहनना अनिवार्य रखा गया.

अगर सार्वजनिक स्थानों पर मास्क लगाने को अनिवार्य और न पहनने पर फाइन का आदेश हुआ होता तो क्या स्थिति इतनी बिगड़ने से रोकी नहीं जा सकती थी?

अब भी जो लोग मास्क पहनते देखे जा रहे हैं वे हेलमेट या सीट बेल्ट की तरह फाइन से बचने का रास्ता निकाले हुए लगते हैं. मास्क पहनने का मतलब भी मुंह भर ढका होना नहीं बल्कि - पूरी तरह नाक के ऊपर रहना चाहये - अगर प्रधानमंत्री मोदी लोगों से ऐसी अपील करते तो क्या ज्यादातर आबादी पर कोई असर नहीं होता.

5. चुनावों में कोविड प्रोटोकॉल तो सख्ती से लागू हो ही सकता था

जब मद्रास हाई कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकार लगायी तो बचाव में कहा गया कि कोविड प्रोटोकॉल लागू कराना राज्य सरकारों के आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी होती है - ऐसा बोल कर चुनाव आयोग ने पल्ला झाड़ लिया.

जैसे चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक एक एक उम्मीदवारों के खर्चे घूम घूम कर जोड़ते रहते हैं, रैलियों में भीड़ कैसे आ रही है जा रही है, देखने वाला कोई क्यों नहीं था - अगर ऐसी ही बात थी तो एक चिट्ठी आपदा प्रबंधन विभाग को तो लिखी ही जा सकती थी.

खुद प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जिस तरीके से भीड़ को देख कर खुशियों का इजहार करते देखे गये - क्या भीड़ को 'कड़ाई भी और दवाई भी' जैसे संदेश नहीं दिये जा सकते थे.

जैसे प्रधानमंत्री मोदी ने संतों से कुंभ को प्रतिकात्मक रखने की अपील की, चुनावी रैलियों को लेकर भी तो ऐसी एक अपील की ही जा सकती थी. बीजेपी नेतृत्व हरकत में तब आया जब राहुल गांधी और ममता बनर्जी ने अपनी रैलियां रद्द करने की घोषणा की - ये काम उनसे पहले भी तो हो ही सकता था.

देश भर में कोरोना के विकराल रूप लेते देख प्रधानमंत्री ने हाई लेवल मीटिंग बुलायी और कोलकाता दौरा रद्द कर दिया - रैली को संबोधित तो किया लेकिन वो भी वर्चुअल तरीके से - क्या ये सब पहले नहीं हो सकता था?

इन्हें भी पढ़ें :

कोविड पर मची अफरातफरी अगर सिस्टम के फेल होने का नतीजा है - तो जिम्मेदार कौन है?

संतों की ही तरह PM मोदी क्या चुनावी रैली करने वालों से एक अपील नहीं कर सकते थे?

राहुल-ममता के दबाव में मोदी की रैलियां छोटी हुईं - बचे चुनाव भी साथ हो जाते, बशर्ते...

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय