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Updated: 07 दिसम्बर, 2017 05:15 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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एक कायस्थ लड़की और एक दलित लड़का एक दूसरे से अथाह प्रेम करते थे. उनकी रिलेशनशिप में वैसे तो सब ठीक था मगर दोनों को समाज और घर वालों की चिंता थी दोनों का ज्यादातर वक़्त इसी सोच में बीतता कि हमारे प्रेम पर घर वालों की प्रतिक्रिया क्या होगी ? लोग क्या कहेंगे? कोई इनके साथ हो न हो मगर इस कपल और इनके प्रेम को मोदी सरकार का पूरा संरक्षण प्राप्त है. मोदी सरकार इनके पीछे आशीर्वाद देने के लिए खड़ी है और खाली हाथ नहीं है. इस कपल के उज्जवल भविष्य के लिए मोदी सरकार के पास ढाई लाख रुपए हैं.

जी हां बिल्कुल सही सुन रहे हैं आप. खबर 'इंडियन एक्सप्रेस' के हवाले से है और खबर के अनुसार, अब मोदी सरकार ने इंटरकास्ट मैरिजेज को प्रमोट करने के लिए, पांच लाख रुपए की सालाना आय सीमा को खत्म करने का फैसला किया है. गौरतलब है कि 2013 में शुरू की गई 'डॉक्टर आंबेडकर स्कीम फॉर सोशल इंटीग्रेशन थ्रू इंटरकास्ट मैरिज' के तहत अगर कोई गैर दलित व्यक्ति किसी दलित के साथ शादी करता है, तो उस दंपत्ति को 2.5 रुपए की मदद दी जाती थी. मगर अब ये राशी 5 लाख है. ज्ञात हो कि मोदी सरकार के इस फैसले से पहले 2.5 लाख रुपए की ये आर्थिक मदद सिर्फ उस दंपति को दी जाती थी, जिसकी वार्षिक आय पांच लाख रुपए से कम हो. कहा जा सकता है कि अब व्यक्ति की आय कितनी भी हो, उसे सरकार से इस "इंटरकास्ट मैरिज" के लिए पूरी मदद मिलेगी.

नरेंद्र मोदी, दलित, विवाह, सामाजिक समन्वय   सामाजिक समन्वय के लिहाज से मोदी सरकार की ये एक अच्छी पहल है

आपको बताते चलें कि डॉक्टर आंबेडकर स्कीम फॉर सोशल इंटीग्रेशन थ्रू इंटरकास्ट मैरिज के तहत हर साल कम से कम 500 अंतरजातीय जोड़ों को आर्थिक मदद देने का लक्ष्य रखा गया था. साथ ही ये शर्त रखी गयी थी कि उनकी शादी, उनकी  पहली शादी हो और हिंदू मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर हो. इस स्कीम को प्राप्त करने के लिए विवाहित जोड़ों को अपना आधार नंबर सब्मिट कराना होगा साथ ही उनका आधार उनके बैंक खाते से लिंक हो. बताया जा रहा है कि यदि जोड़े सरकार की इस शर्त को नहीं मानते हैं तो उन्हें मदद नहीं दी जाएगी.

नरेंद्र मोदी, दलित, विवाह, सामाजिक समन्वय   बताया जा रहा है कि मोदी सरकार इस प्रयास से दलितों और गैर दलितों को एक करना चाहती है

मोदी सरकार ने अचानक क्यों किया ये फैसला?

आखिर मोदी सरकार को अचानक ऐसा क्यों लगा कि उसे ऐसे "कपल्स" की आर्थिक मदद करनी चाहिए? ये एक बड़ा प्रश्न है और शायद इसको सुन कर अपने आप ही आपके मुंह से निकल पड़े कि, "राजनीति दिल फरेब चीज है इसमें बेवजह कुछ नहीं होता. ज़रूर इसके पीछे कुछ बड़ी मंशा छुपी है". आधिकारिक रूप से इस ऐतिहासिक काम के पीछे का उद्देश्य बस इतना है कि मोदी सरकार गैर दलितों और दलितों के बीच सामाजिक समन्वय स्थापित करना चाहती है और मोदी सरकार का मानना है कि "विवाह" ही वो एक मात्र माध्यम है जिसकी बदौलत दोनों के बीच पनप चुकी खाई को पाटा जा सकता है.

ये तो हो गयी आधिकारिक बात. अब अगर इस खबर के राजनीतिक मायने देखे जाएं तो प्राप्त तथ्य आश्चर्य में डालने हैं. राजनीतिक विशेषज्ञों कि माने तो मोदी सरकार ऐसा गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और त्रिपुरा के चुनावों के मद्देनजर कर रही है. ज्ञात हो कि इन सभी राज्यों में दलितों की एक बहुत बड़ी संख्या वास करती है और स्कीम में किये गए इस बड़े फेर बदल से मोदी सरकार उन दलितों के अलावा देश के तमाम दलितों को इस बात से अवगत कराना चाहती है कि वो "सबका साथ, सबका विकास" की अपनी विचारधारा पर अडिग है. और इंडिया को न्यू इंडिया की ओर ले जाते हुए दलितों को भी अपने साथ रखना चाहती है.

हो सकता है ये बात आपको थोड़ा विचलित कर दे मगर राजनीति के अलावा समाज का भी एक बहुत बड़ा वर्ग यही मानता है कि बीजेपी और दलित दो अलग-अलग छोरों पर खड़े हैं अब चूंकि राजनीति में दलितों का वोट बैंक एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है साथ ही दलितों को "लॉयल वोटर्स" की संज्ञा दी जाती है अतः मोदी सरकार के इस प्रयास को देखकर यही लग रहा है कि वो ये बात भली प्रकार जानती है कि आज के वक़्त में यदि दलित और दलित हितों की बात नहीं की गयी तो राजनीति में लम्बे समय तक टिके रहना लगभग असंभव है.

नरेंद्र मोदी, दलित, विवाह, सामाजिक समन्वय   मोदी सरकार अपने इस प्रयास से दलितों के करीब जाना चाहती है

निस्संदेह दलितों को प्रोत्साहन देने के लिहाज से ये एक अच्छी खबर है. इस खबर को सुनकर, कुछ सवाल अपने आप जहन में उठने स्वाभाविक हैं और हमें आशा है कि आज नहीं तो कल मोदी सरकार इन सवालों का जवाब ज़रूर देगी. इस खबर को जानकार जो सवाल जहन में आए वो ये कि

1 - तो क्या इससे आने वाले वक़्त में दलित लड़कों को शादी के लिए लड़कियां कम नहीं पड़ जाएंगी?

2 -  तब क्या होगा जब कुछ लोग पैसों की लालच में शादी कर लें, फिर किसी बात को मुद्दा बनाकर भविष्य में लड़की / लड़के को तलाक दे दें?

3 - क्या दलित समाज से सामाजिक समन्वय के लिए सरकार की नजर में शादी ही एकमात्र विकल्प है?

4 - क्या ऐसा नहीं माना जाए कि इस पूरी प्रक्रिया में नुक्सान में लड़की ही है. ऐसा इसलिए क्योंकि चाहे वो सवर्ण हो या फिर दलित उसे समाज से बहुत कुछ सुनने को मिलेगा जो उसके अवसाद का कारण बनेगा?

5 - दलितों के लिए ये एक अच्छा प्रयास है मगर उस परिस्थिति में क्या जब कोई गैर अनुसूचित जनजाति का लड़का या लकड़ी किसी अनुसूचित जनजाति के लड़के या लड़की से विवाह करता है?

6 - यदि कोई मुसलमान चाहे वो लड़का हो या लड़की अगर दलित लड़के या लड़की से विवाह करता है तो क्या सरकार उसे ये आर्थिक लाभ देगी?

7 - क्या इस मामले के राजनीतिक पहलू हैं? या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो क्या ये सब भाजपा द्वारा केवल राजनीति चमकाने के लिए किया जा रहा है? ऐसा इसलिए क्योंकि अब तक भाजपा को सवर्णों की पार्टी माना गया है तो क्या भविष्य में इससे भाजपा को अपनी कट्टर हिन्दू वादी छवि सुधारने में कोई मदद मिलेगी?

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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