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 |  4-मिनट में पढ़ें  |   15-04-2018
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विश्व हिंदू परिषद में पहली बार हुए चुनाव के बाद प्रवीण तोगड़िया की छुट्टी हो गयी है. तोगड़िया के करीबी राघव रेड्डी की हार के साथ ही तीन दशक तक कायम रहा उनका वर्चस्व पूरी तरह खत्म हो गया.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पसंदीदा विष्णु सदाशिव कोकजे वीएचपी के नये अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गये हैं. कोकजे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जज और वाजपेयी सरकार के दौरान हिमाचल प्रदेश के गवर्नर रह चुके हैं.

अब सवाल ये है कि तोगड़िया को सिर्फ इसलिए जाना पड़ा क्योंकि वो पॉवर सेंटर की आंख की किरकिरी हो चुके थे, या फिर संघ 2019 के हिसाब से वीएचपी को किसी नयी भूमिका में देखना चाहता है?

तोगड़िया की कभी तूती बोलती थी

वीएचपी में जिस बात पर सहमति बनाने की कोशिश हो रही थी, उस पर आखिर तक असहमति के सिवा कुछ और संभव भी न था. लिहाजा 54 साल के वीएचपी के इतिहास में पहली बार चुनाव हुआ - और 32 साल बाद प्रवीण तोगड़िया की छुट्टी हो गयी.

praveen togadia32 साल बाद तोगड़िया की वीएचपी से छुट्टी

तोगड़िया की विदाई तो उसी दिन तय हो गयी थी जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे सीधे टारगेट किया - बस, तारीख तय होनी थी. 14 अप्रैल को हो भी गयी.

एक दौर रहा जब तोगड़िया की हर तरफ तूती बोलती थी. 1995 में जब बीजेपी पहली बार गुजरात में सत्ता में आयी तो केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, लेकिन बताते हैं लालबत्ती वाली गाड़ियों का कभी भी तोगड़िया के बंगले पर हाजिरी लगाये बगैर आगे नहीं बढ़ पाता था. बगैर किसी सरकारी पद पर होते हुए भी तोगड़िया सत्ता के सबसे बड़े केंद्र माने जाते रहे.

तोगड़िया को जेड प्लस सिक्योरिटी मेल जाने के बाद काफिला जिधर से गुजरता गफलत ऐसी होती जैसे तोगड़िया ही सूबे के सीएम हों. 2002 के चुनाव में भी तोगड़िया ने खूब मेहनत की थी, लेकिन नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद तोगड़िया की सारी ताकत जाती रही.

वीएचपी में हुए चुनाव में हार के बाद तोगड़िया के शब्द लड़खड़ाते हुए से निकल रहे थे, 'मैं बड़ी लड़ाई जीतने के लिए आज छोटी हार से गुजर रहा हूं. मैं वीएचपी में 32 साल से था, आज नहीं हूं. मैं हिंदुओं की मांगों को बुलंद करता रहा. मैं आगे भी करोड़ों हिंदुओं, किसानों, युवाओं, मजदूरों की आवाज उठाता रहूंगा.'

दोस्ती की दुहाई काम न आई

80 के दशक में तोगड़िया और मोदी दोनों को संघ में साथ साथ देखा जाता था - और दोनों की दोस्ती मिसाल हुआ करती थी. फिर प्रवीण तोगड़िया वीएचपी और मोदी बीजेपी में आ गये. अलग अलग होने के बावजूद दोनों की सोच इतनी मिलती थी कि उनका हर कदम और काम एक ही दिशा में आगे बढ़ता.

वैसे तो काफी दिनों से तोगड़िया की हरकतें संघ को पसंद नहीं आ रही थीं, लेकिन हाल ही में जब उनकी कार का एक्सीडेंट हुआ तो उन्होंने हत्या की आशंका जतायी. फिर पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने का शक जताया. इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी हमेशा उनके निशाने पर होते.

जब दाल नहीं गल पायी तो तोगड़िया ने मोदी को खुली चिट्ठी लिखी और दोस्ती की दुहाई देते हुए मिलने का वक्त मांगा, लेकिन तब तक शायद काफी देर हो चुकी थी - और दूरी भी काफी बढ़ चुकी थी.

देखा जाये तो तोगड़िया का भी वही हाल हुआ है जैसा कभी केएन गोविंदाचार्य का हुआ था. वाजपेयी पर गोविंदाचार्य की एक ही टिप्पणी उनके सारे कंट्रीब्यूशन पर भारी पड़ी और एक बार नो एंट्री का बोर्ड उनके लिए लगा तो कभी हटा नहीं. बीजेपी में भी कभी कल्याण सिंह और उमा भारती को भी हाशिये पर जाना और बाहर तक होना पड़ा था, लेकिन बदले दौर में राजनीतिक मजबूरी और विचारधारा की करीबी के चलते घरवापसी में ज्यादा मुश्किल नहीं हुई.

मोदी और शाह के दौर में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता मार्गदर्शक मंडल तो पहुंच गये लेकिन तोगड़िया को तो उसमें भी जगह मिलने से रही. शायद तोगड़िया उस कोने में खड़े हो गये थे जहां मोदी को संजय जोशी की परछाई नजर आती होगी. लगता है तोगड़िया भी जोशी जैसी स्थिति को ही प्राप्त हो चुके हैं.

तोगड़िया के बारे में लेटेस्ट अपडेट यही है कि वो भी उसी मिशन पर निकल रहे हैं जिसे बीजेपी के सारे नेता 12 अप्रैल को अंजाम तक पहुंचा चुके हैं. दरअसल, तोगड़िया 17 अप्रैल से अहमदाबाद में अनिश्चित कालीन उपवास पर बैठने जा रहे हैं.

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