New

होम -> सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 02 दिसम्बर, 2017 07:01 PM
आईचौक
आईचौक
  @iChowk
  • Total Shares

EVM के मुद्दे पर एक बार फिर मायावती और अखिलेश यादव साथ आये हैं. विधानसभा की ही तरह यूपी के निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद मायावती ने बीजेपी की जीत के लिए EVM को जिम्मेदार ठहराया है. इस मसले पर छह महीने बाद अखिलेश यादव फिर से मायावती के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं.

विधानसभा चुनाव में हार के बाद दोनों ही नेताओं ने EVM में गड़बड़ी की आशंका जताते हुए जांच की मांग की थी. मायावती की पार्टी बीएसपी ने तो कोर्ट जाने का ऐलान किया था. कोर्ट तो दूर चुनाव आयोग के EVM हैक करने के चैलेंज से भी दोनों दल भाग खड़े हुए.

शबाना का केस!

EVM की शिकायतों में सबसे दिलचस्प केस सहारनपुर में पता चला है. सहारनपुर के वार्ड नंबर 54 के वोटों की गिनती हुई तो पार्षद की निर्दलीय उम्मीदवार शबाना को एक भी वोट नहीं मिला. ऐसे में शबाना का EVM की विश्वसनीयता पर सवाल तो बनता ही है. शबाना का कहना है कि दूसरों को भूल भी जायें तो उन्हें उनके परिवार का वोट तो मिला ही है. शबाना का सवाल है - 'ऐसा कैसे संभव है कि मेरा वोट भी मुझे नहीं मिला?'

शबाना का दावा है कि उन्हें कम से कम 900 वोट मिलने चाहिये, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शबाना का आरोप है कि ईवीएम में गड़बड़ी हुई है इसीलिए एक भी वोट नहीं मिला.

evmफिर उठे सवाल

यूपी में निकाय चुनाव के दौरान EVM की गड़बड़ी को लेकर कई जगह हंगामा हुआ था. कानपुर से ऐसी दो शिकायतें आयीं जिनमें कहा गया कि कोई भी बटन दबाने पर वो बत्ती जली जहां कमल के फूल यानी बीजेपी का चुनावी निशान था. एक में बताया गया है कि कोई भी बटन दबाने पर बीजेपी और नोटा को वोट जा रहा था. लेकिन उसी मशीन में जब बीजेपी वाले निशान पर बटन दबाया गया तो किसी और की बत्ती नहीं जली. ऐसी ही शिकायत मेरठ से भी आयी थी.

इसी साल हुए पांच विधानसभा के चुनाव में हार के बाद आप नेता अरविंद केजरीवाल ने महाराष्ट्र से भी ऐसा ही उदाहरण दिया था जिसमें निर्दलीय प्रत्याशी को एक भी वोट नहीं मिला था. जांच के बाद चुनाव आयोग ने शिकायत को गलत बताया था.

आंकड़े क्या कहते हैं?

ईवीएम पर उठे सवालों के बीच समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने कहा कि चुनाव में कोई 'टेम्परिंग' नहीं, 'सेटिंग' हुई है. आजम खां का इल्जाम है कि जहां EVM थी वहां बीजेपी जीती - और जहां बैलट पेपर से वोट डाले गये वहां समाजवादी पार्टी की जीत हुई. नगर निगम में ईवीएम से वोटिंग हुई थी और नगर पंचायत और पालिका में वोटिंग के लिए बैलट पेपर का इस्तेमाल किया गया था. आजम खां इसी को लेकर सवाल उठा रहे हैं.

mayawatiईवीएम तो बहाना है...

बीजेपी ने नगर निगमों में 46 फीसदी सीटों पर जीत हासिल की है जबकि नगर पालिका और नगर पंचायत में उसे सिर्फ 15 फीसदी सीटों पर ही कामयाबी मिल पायी है.

निकाय चुनाव में 16 नगर निगमों में से 14 बीजेपी के खाते में गये हैं, जबकि 2 में बीएसपी ने जीत दर्ज की है. मेरठ और अलीगढ़ में बीजेपी को बीएसपी ने शिकस्त दी है. इसी तरह नगर पालिका परिषद अध्यक्ष की कुल सीट 198 सीटों में से 67 में जीत के साथ बीजेपी पहले नंबर पर और 27 सीटों पर जीत के साथ बीएसपी ने दूसरे नंबर पर रही.

गठबंधन के संकेत...

मायावती ने केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी को चैलेंज किया है कि वो बैलेट पेपर से चुनाव कराये और जीत कर दिखाये. मायावती ने कहा - अगर बीजेपी ये दावा कर रही है कि उसे बहुमत मिला और देश की जनता उनके साथ है तो ईवीएम को हटाये और बैलट पेपर से चुनाव कराये. मैं भरोसे के साथ कहती हूं कि अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में बैलट पेपर का इस्तेमाल किया जाये तो बीजेपी की हार होगी.'

मायावती की तरह अखिलेश यादव ने भी एक ट्वीट में ईवीएम का मामला उठाकर बीजेपी को घेरा. अखिलेश ने ट्वीट में कहा, 'बीजेपी ने बैलेट पेपर के इलाकों में महज 15 फीसदी सीटें जीती और ईवीएम के इलाकों में सिर्फ 46 फीसदी.'

यूपी चुनाव के बाद अखिलेश यादव और मायावती दोनों कई बार साथ आने का संकेत दे चुके हैं. इसकी ज्यादा संभावना तब दिखी जब सोनिया गांधी के लंच में दोनों नेता पहुंचे और आपस में उनकी बात भी हुई. तभी बताया गया कि लालू की पटना रैली में दोनों मंच शेयर करेंगे और बाद में वही प्रयोग यूपी में भी दोहराया जाएगा. जब लालू की रैली हुई तो अखिलेश तो पहुंचे लेकिन मायावती नदारद रहीं. राज्य सभा से मायावती के इस्तीफा देने पर लालू प्रसाद ने उन्हें बिहार से राज्य सभा भेजने का ऑफर भी दिया था.

जब मायावती के फूलपुर से विपक्ष की उम्मीदवार बनने की चर्चा चली तो भी अखिलेश यादव ने समर्थन देने की बात कही. मायावती ने भी बीजेपी को रोकने के लिए किसी से भी हाथ मिलाने की बात कई बार कही लेकिन मामला बयानबाजी से आगे नहीं बढ़ सका.

निकाय चुनाव में जहां योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के तमाम नेता जोर शोर से चुनाव प्रचार में डटे रहे, वहीं न तो मायावती न ही अखिलेश यादव ने ऐसी कोई जहमत उठायी. बावजूद इसके बीएसपी को मेयर की दो-दो सीटों पर जीत हासिल हो गयी. समाजवादी पार्टी को भी नगर पंचायतों में कई जगह सफलता मिली है.

akhilesh yadavगठबंधन का संकेत नहीं तो क्या है...

तो क्या अखिलेश और मायावती को लग रहा है कि अगर वो चुनाव प्रचार में भी उतरे होते तो नतीजे अलग होते. संभव है उन्हें ये भी लगा हो कि अगर दोनों मिल कर चुनाव लड़ते तो बीजेपी को कड़ी टक्कर भी दे सकते थे.

वैसे विपक्षी दलों के गठबंधन के सवाल पर मायावती कहती हैं - 'बीएसपी चाहती है कि सर्व समाज - दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और ऊंची जाति के बीच भाईचारा हो. क्या इससे बड़ा कोई गठजोड़ हो सकता है?'

अब मायावती जहां बीजेपी को 2019 के लिए चैलेंज कर रही हैं तो अखिलेश यादव भी उनके सपोर्ट में खड़े नजर आ रहे हैं. बीएसपी और समाजवादी पार्टी के बीच 1993 में गठबंधन हुआ था, लेकिन गेस्ट हाउस कांड के बाद दोनों में दुश्मनी हो गयी और कोई भी एक दूसरे को फूटी आंख देखने को तैयार न था. ईवीएम के बहाने ही सही लगता तो ऐसा ही है कि दोनों ही अगले चुनाव तक गठबंधन के संकेत दे रहे हैं.

इन्हें भी पढ़ें :

EVM परखने में दिलचस्‍पी कम, सवाल उठाने में फायदा ज्‍यादा है

2019 का चुनाव मोबाइल पर लड़ा जाएगा या बैलट पेपर पर?

EVM हैक करने खातिर चार घंटे मिले थे, दो घंटे में ही छोड़ दिये मैदान

लेखक

आईचौक आईचौक @ichowk

इंडिया टुडे ग्रुप का ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय