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Updated: 18 मार्च, 2021 04:44 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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रोजाना की राजनीति में ज्यादा न सही, चुनावी राजनीति में तो जुमलेबाजी चलती ही है. जुमलों के लिए टिकाऊ होना भी जरूरी होता है - क्योंकि बिकाऊ तो वे अपनेआप होते हैं. अब तक सबसे टिकाऊ और घोषित जुमला 'काले धन के 15 लाख वाला' रहा है - बाकी सारे जुमले अघोषित ही होते हैं. ये राजनीतिक विरोधी होते हैं जो एक-दूसरे की बातों और दावों को जुमला बताते रहते हैं. किसी भी जुमले की बातें अगर डिमांड और सप्लाई के हिसाब से फिट बैठें तो वो ज्यादा टिकाऊ होता है.

पश्चिम बगांल चुनाव (West Bengal Election 2021) में भी पहले से ही जुमलेबाजी चल रही है, वोटिंग की तारीख आते आते ऐसी चीजें रफ्तार भी पकड़ने लगी हैं. एक और एक मिल कर दो होने की जगह कई बार ये ग्यारह भी हो जाते हैं.

ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के नये साथी और बीजेपी के बुजुर्ग नेता रहे यशवंत सिन्हा (Yashwant Sinha) भी दो की जगह एक और एक ग्यारह वाला रोल निभाने की कोशिश में लगते हैं. यशवंत सिन्हा ने वाजपेयी शासन के कंधार विमान अपहरण की घटना से ममता बनर्जी को जोड़ कर ऐसा दावा कर रहे हैं जो उनके तब के कैबिनेट साथियों को भी याद नहीं आ रहा है.

जैसे नंदीग्राम में ममता बनर्जी को लगी चोट के पीछे साजिश के सबूत नहीं मिल पा रहे हैं, करीब करीब वैसे ही यशवंत सिन्हा के किस्से फैक्ट के मुकाबले फिक्शन ज्यादा लगने लगे हैं.

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सत्ता में वापसी की कोशिश में यशवंत सिन्हा, ममता बनर्जी के मददगार बन कर प्रकट हुए हैं. हालात ऐसे हैं कि केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी ने चुनाव को चक्रव्यूह बना दिया है - और हर तरफ से घिरी TMC को उबारने की जगह ममता बनर्जी और यशवंत सिन्हा दोनों ही ऐसे दावे कर रहे हैं जो जल्दी ही अभिमन्यु साबित हो जाते हैं.

बेहतर तो यही होता कि ममता बनर्जी खुद भी ऐसी चीजों से बचतीं और नये कलेवर में साथ आये पुराने साथी यशवंत सिन्हा को भी धैर्य से काम लेने की सलाह देतीं. स्वयं समझने के साथ साथ ये समझाने की कोशिश भी करतीं कि खुद निशाने पर होने की सूरत या इम्तिहान की घड़ी आने पर जनता की अदालत में ऐसी बातें तो नहीं ही होनी चाहिये जो फौरन ही सवालों के कठघरे में खड़ी नजर आने लगें - अगर तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने समय रहते संभलने की कोशिश नहीं की और जुमलेबाजी के चक्कर में बंगाल की गद्दी दांव पर लगा दी तो बहुत कुछ हासिल नहीं होने वाला है.

ममता को पूरी सहानुभूति क्यों नहीं मिल रही?

नंदीग्राम में ममता बनर्जी को लगी चोट का चुनावी फायदा तो साफ नजर आने लगा है, लेकिन ये और भी फायदेमंद हो सकता था अगर इसमें साजिश के इल्जाम का तड़का नहीं लगाया गया होता. ममता बनर्जी को उन लोगों की सहानुभूति का फायदा भी मिल सकता था जो तृणमूल कांग्रेस के समर्पित समर्थक या कार्यकर्ता नहीं रहे हैं.

ममता बनर्जी की चोट सबको दिखी. पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी उनको देखने गये और शीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामना भी दी. सेहत की शुभकामनाएं तो सभी ने दी लेकिन बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय की ही तरह पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने भी नाटक और नौटंकी करार दिया.

पहले तो सामने आये चश्मदीद और फिर बंगाल पुलिस की शुरुआती जांच रिपोर्ट ने भी ममता बनर्जी के दावे पर सवाल खड़े कर दिये - ऊपर से चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल की शिकायतों पर ही सवाल उठा दिया. चुनाव आयोग लोकतंत्र की दुहाई देते हुए सवाल उठाये हैं. हैरानी की बात तो ये रही कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का इलाज करने वाले डॉक्टर भी सवालों से परे नहीं रह पाये.

टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन की शिकायत रही, रिपोर्ट के मुताबिक, 9 मार्च को चुनाव आयोग ने DGP को बदला और अगले ही दिन 10 मार्च को नंदीग्राम में ममता बनर्जी को चोट लग गयी. डेरेक ओ ब्रायन ने एक बीजेपी सांसद की सोशल मीडिया पोस्ट का भी हवाला दिया, जिसमें लिखा था - 'आप समझ जाएंगे शाम 5 बजे के बाद क्या होने वाला है.' डेरेक ओ ब्रायन ने ध्यान दिलाने की कोशिश की कि उसके बाद 6 बजे शाम को ही ममता बनर्जी के साथ हादसा हो जाता है.

डेरेक ओ ब्रायन की बातें तब भारी पड़तीं जब ममता बनर्जी अपनी चोट को लेकर राय बनाने का फैसला भी उन पर ही छोड़ दी होतीं. लोग देखते, सुनते, समझते और अपने तरीके से जानने समझने की कोशिश करते - पब्लिक तो छिपाये जाने वाली चीजों को भी समझ ही लेती है.

टीएमसी नेता पार्थ चटर्जी कहने लगे, 'आयोग को ममता पर हमले की जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी - वो बीजेपी के आदेश पर काम कर रही है.'

ये दावे ही चुनाव आयोग को सख्त लहजे में आगाह करने का मौका दे दिये. ममता बनर्जी को चोट कैसे लगी इसकी जांच तो हुई ही और पूरी रिपोर्ट भी तैयार हो ही जाएगी, लेकिन ममता बनर्जी के साजिश के शक पर सवाल उठना उनके ही खिलाफ गया है. ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा 8 चरणों में चुनाव कराये जाने को लेकर भी आयोग को बीजेपी के इशारे पर काम करने का आरोप लगा चुकी हैं.

ममता बनर्जी अब व्हील चेयर पर रोड शो कर रही हैं - क्या ऐसा नहीं लगता कि ममता बनर्जी अपनी चोट को लेकर चुप रह गयी होतीं तो उनके प्रति उमड़ने वाली लोगों की सहानुभूति का ज्यादा असर होता?

चूंकि डॉक्टरों की हिदायत के चलते ममता बनर्जी को व्हील चेयर पर रहना पड़ रहा है, इसलिए लोगों की राय अलग बनती. व्हील चेयर पर ही ममता बनर्जी घूम घूम कर प्रचार करने की एक मजबूरी ये भी है कि तृणमूल कांग्रेस की वो अकेली स्टार प्रचारक ही बची हैं. जिस नंदीग्राम का मोर्चा अब तक शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी के लिए संभाल लिया करते थे - अब वो खुद दो-दो हाथ करते चैलेंज कर रहे हैं. वैसे तो ममता बनर्जी के पास भी उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी, डेरेक ओ ब्रायन, सौगत रॉय और पार्थ चटर्जी जैसे नेता और साथी बचे हुए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा, शुभेंदु अधिकारी, दिलीप घोष जैसे नेताओं को चैलेंज करना उनके वश की बात भी नहीं है.

ममता बनर्जी की ही तरह उनके नये नये साथी बने यशवंत सिन्हा ने भी तृणमूल कांग्रेस नेता को लेकर एक ऐसा दावा किया है जो नंदीग्राम की घटना जैसा ही लगने लगा है. यशवंत सिन्हा का ये दावा कंधार विमान अपहरण की घटना से जुड़ा है जब सिन्हा और ममता बनर्जी दोनों ही एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री हुआ करते रहे.

mamata banerjee, yashwant sinha2019 के आम चुनाव से पहले ममता बनर्जी का दिल्ली में ऐसा ही जलवा हुआ करता रहा - और यशवंत सिन्हा भी बीजेपी के बागी और असंतुष्ट नेताओं के साथ दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस नेता के साथ नजर आते रहे. बाद में यशवंत सिन्हा ने बीजेपी छोड़ दी थी और शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस में चले गये.

ताज्जुब की बात ये है कि यशवंत सिन्हा ने जो दावा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान किया है वो बता 2019 के आम चुनाव के वक्त क्यों नहीं बतायी? तब ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार और उम्मीदवार समझने वालों में से एक यशवंत सिन्हा भी रहे - विपक्ष के कुछ नेताओं के साथ यशवंत सिन्हा और वाजपेयी सरकार में ही मंत्री रहे अरुण शौरी मिल कर ममता बनर्जी के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी का रास्ता साफ कर रहे थे. ममता बनर्जी खुद भी काफी आश्वस्त लग रही थीं, तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बार बार 'एक्सपाइरी डेट पीएम' कह कर संबोधित करती रहीं.

यशवंत सिन्हा ने ये दावा 2019 में क्यों नहीं किया

यशवंत सिन्हा बीजेपी पहले ही छोड़ चुके थे और बिहार चुनाव में भी कुछ लोगों को साथ लेकर यथाशक्ति एक्टिव रहे. हासिल तो बहुतों की तरह सिफर ही रहा. हां, उनके बेटे जयंत सिन्हा बीजेपी में जरूर बने हुए हैं. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में वित्त राज्य मंत्री भी रहे. आम चुनाव से पहले गोरक्षकों के जेल से छूटने के बाद घर बुलाकर फूल-माला के साथ सम्मानित करने को लेकर विवादों में भी रहे, लेकिन लगता है यशवंत सिन्हा के प्रति बीजेपी नेतृत्व की नाराजगी का खामियाजा जयंत सिन्हा को भुगतना भी पड़ा है. हालांकि, जयंत सिन्हा पिता को दावों को खारिज करते हुए अखबारों में लेख भी लिख चुके हैं.

वाजपेयी और आडवाणी के जमाने की बीजेपी में वरिष्ठों में शुमार यशवंत सिन्हा की मोदी-शाह के उभार के बाद दाल कभी नहीं गली, लिहाजा हमेशा ही हमलावार रहे. यशवंत सिन्हा की तीखी आलोचनाओं के जवाब में एक बार बीजेपी नेता अरुण जेटली ने यशवंत सिन्हा को लेकर कहा था - 80 साल की उम्र में नौकरी के आवेदक. जवाब में यशवंत सिन्हा IAS की नौकरी छोड़ कर राजनीति में आने की मिसाल देते रहे हैं.

वाजपेयी कैबिनेट के साथी यशवंत सिन्हा अब तृणमूल कांग्रेस में अध्यक्ष बना दिये गये हैं - और ममता बनर्जी की तरफ से बीजेपी के मोदी-शाह-नड्डा से मोर्चा लेने की कोशिश कर रहे हैं. यशवंत सिन्हा के पास बहुत कुछ नया कहने को तो है नहीं, लिहाजा वो पुरानी बातें याद दिला कर अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाने का प्रयास कर रहे हैं.

तृणमूल कांग्रेस नेता से नये सिरे से हाथ मिलाते वक्त यशवंत सिन्हा ने दावा किया कि ममता बनर्जी ने 1999 में कंधार विमान अपहरणकर्ताओं को भारतीय नागरिकों के बदले खुद को तालिबान के हवाले कर देने की पेशकश की थी.

ममता बनर्जी की पहले से ही फाइटर राजनेता की इमेज रही है - और मान कर चलना चाहिये यशवंत सिन्हा उसी चीज को नयी मजबूती के साथ पेश करने की कोशिश किये. बोले भी, 'वो अपनी जान को लेकर बिल्कुल नहीं डरतीं.'

यशवंत सिन्हा ने कहा, 'मैं आपको ये बताना चाहता हूं कि जब भारतीय विमान को हाईजैक कर लिया गया था और अपहरणकर्ता उसे अफगानिस्तान के कंधार ले गये थे. तब कैबिनेट की एक मीटिंग हुई थी. ममता जी ने ये पेशकश की थी कि वो बंधक के रूप में जाएंगी, लेकिन शर्त ये होगी कि आतंकवादियों को बाकी यात्रियों को रिहा करना होगा.'

वाजपेयी सरकार में ममता और यशवंत सिन्हा के साथी रहे शांता कुमार ने न्यूज वेबसाइट द प्रिंट से बातचीत में सिन्हा के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है. तब शांता कुमार खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्री हुआ करते थे, लेकिन 2014 में जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के साथ शांता कुमार को भी भेज दिया गया. हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शांता कुमार की जोरदार आवाज आखिरी बार 2015 के बिहार चुनाव में बीजेपी की बुरी हार के बाद सुनने को मिली थी. तब जसवंत सिंह विदेश मंत्री हुआ करते थे और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति को ऐसे मामलों में फैसले लेने होते थे.

यशवंत सिन्हा के दावे को लेकर शांता कुमार कहते हैं, 'जहां तक मुझे याद है, कैबिनेट की मीटिंग में ऐसी कोई पेशकश नहीं की गयी थी. जब विमान का अपहरण हुआ था तब कैबिनेट में ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई थी. यहां तक कि जब संकट खत्म हो गया, तब भी मेरे सामने ऐसी कोई बात नहीं आयी.'

तब पर्यावरण मंत्री रहे सुरेश प्रभु का कहना है कि कैबिनेट में ऐसी कोई चर्चा नहीं हुई क्योंकि ये मामला CCS के पास था. वैसे यशवंत सिन्हा ने सिर्फ कैबिनेट नाम लिया है. ध्यान देने वाली एक बात और है कि तब की सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी, रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस और विदेश मंत्री जसवंत सिंह के साथ साथ वित्त मंत्री होने के नाते यशवंत सिन्हा भी हुआ करते थे, लेकिन ममता बनर्जी नहीं क्योंकि वो रेल मंत्री रहीं.

शांता कुमार की ही तरह तब मंत्री रहे राम नाइक, जुएल ओराम और सत्यनारायण जटिया ने भी यशवंत सिन्हा के दावे को खारिज कर दिया है. हालांकि, सत्यनारायण जटिया ये भी कहते हैं, हो सकता है ये बात ममता बनर्जी ने यशवंत सिन्हा के साथ निजी बातचीत में कही हो.

समझने वाली एक बात और है कि यशवंत सिन्हा के दावे को खारिज करने वाले ये सभी नेता फिलहाल बीजेपी में हैं जो पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी को शिकस्त देकर सरकार बनाने की कोशिश में जुटी है. ऐसा भी नहीं कि यशवंत सिन्हा की बात को किसी का समर्थन ही नहीं मिला है - अरुण शौरी ने ये कहते हुए यशवंत सिन्हा के दावों में संभावना देखने की कोशिश की है कि उनको मीटिंग की छोटी-छोटी चीजें भी याद रहती हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काले धन के 15 लाख वाली बातों पर सवाल भी उठे तो चुनाव के बाद ही - और उस पर तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने नैतिक साहस दिखाते हुए मोदी के बयान को चुनावी जुमला बता दिया था.

अपनी चोट को लेकर ममता बनर्जी के साजिश के दावों को उनके राजनीतिक विरोधी ड्रामा और नौटंकी करार दे चुके हैं. जाहिर है यशवंत सिन्हा का दावा भी चुनावी जुमला साबित हो रहा है. चुनावी जुमले से परहेज की जरूरत तो नहीं है, लेकिन उसके टिकाऊ होने के बारे में तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व को जरूर सोचना चाहिये. ममता बनर्जी और यशवंत सिन्हा के दावों को लेकर वोटिंग से पहले ही सवाल उठने लगे हैं - और ये सत्ता में तीसरी बार वापसी के लिए प्रयासरत ममता बनर्जी के लिए ठीक नहीं है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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