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Updated: 25 नवम्बर, 2021 04:44 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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मुकुल संगमा का भी कांग्रेस छोड़ कर जाना ठीक वैसे ही तय रहा, जैसे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस विधायक अदिति सिंह का. जिसे जहां अच्छा लगा, निकल लिया. अदिति सिंह तो अकेले बीजेपी में चली गयीं, मुकुल संगमा तो दर्जन भर की टीम लेकर ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के पास पहुंच गये.

जो तृणमूल कांग्रेस मेघालय में एंट्री प्वाइंट के लिए तरस रही थी, मुकुल संगमा ने तो एक झटके में ही रातों-रात उसे मुख्य विपक्षी पार्टी बना दिया. ममता बनर्जी ने कोई नया या अजूबा काम नहीं किया है. ऐसा तो बीजेपी कई बार कर चुकी है - गोवा और अरुणाचल प्रदेश तो प्रमुख उदाहरण हैं.

किसी भी राज्य की राजनीति में मजबूती से पांव जमाने का ये वैसे भी सहज, टिकाऊ और रिस्क-फ्री तरीका है. चुनाव तो जुआ जैसा होता है, इस खेल में तो पहले से ही सफलता की गारंटी है. बीजेपी के कुख्यात ऑपरेशन लोटस से ये थोड़ा अलग है, लेकिन ममता बनर्जी की रणनीति में पूरी तरह फिट है.

बीजेपी का ऑपरेशन लोटस राजनीतिक विरोधी सरकार गिराकर अपनी सरकार बनाने का मिशन है, लेकिन ममता बनर्जी को अभी सत्ता नहीं, बल्कि विपक्ष की जगह हासिल करने की ही जरूरत है - और बार बार कभी खुद ममता बनर्जी तो कभी अभिषेक बनर्जी अपनी तरफ से सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को मैसेज देने की कोशिश कर रहे हैं.

ममता बनर्जी तो कांग्रेस के पीछे ही पड़ गयी हैं: ममता बनर्जी के ऑपरेशन मेघालय को उनके महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय राजनीति के हिसाब से पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर देखा जा सकता है. ममता बनर्जी को अब अच्छी तरह समझ में आ चुका है कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में राष्ट्रीय स्तर पर भी वो पश्चिम बंगाल की तरह ही सफल हो पाएंगी. बंगाल में ममता बनर्जी की लड़ाई भले ही लेफ्ट के खिलाफ रही और जीत भी कांग्रेस की मदद से ही मिली, लेकिन जीत को बरकरार रखने के लिए कांग्रेस को बर्बाद करना जरूरी था. ममता बनर्जी ने वही किया और अब दिल्ली पर नजर टिकी हुई है, लेकिन वो ये भी जानती हैं कि दिल्ली बहुत दूर है.

दिल्ली की लड़ाई ममता बनर्जी के लिए तब तक असंभव है, जब तक कांग्रेस उनके रास्ते का रोड़ा बनी रहेगी, इसीलिए ममता बनर्जी अब बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) को आगे बढ़ कर चैलेंज करने से पहले कांग्रेस को ही किनारे लगाने में जुट गयी हैं.

मेघालय के लिए ममता से ज्यादा गांधी परिवार जिम्मेदार

मेघालय का मामला भी सोनिया गांधी के लिए पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसा ही एक नया सबक है. ये तो ऐसा ही लगता है जैसे कांग्रेस तो खुद ही डूबने पर आमादा है - और ममता बनर्जी तो बस मौके का फायदा उठाती जा रही हैं.

मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा तो सितंबर से ही सोनिया गांधी और राहुल गांधी को कैप्टन अमरिंदर सिंह और गुलाम नबी आजाद जैसे अलर्ट भेज रहे थे, जब पहली बार उनकी ममता बनर्जी के भतीजे और तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी से मुलाकात हुई थी.

1. और 'खेला' हो ही गया: सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने अक्टूबर में मुकुल संगमा और मेघालय कांग्रेस प्रमुख विन्सेंट एच पाला को दिल्ली बुलाकर मिले भी थे - और समझा-बुझा कर भेज दिया था. लेकिन मुकुल संगमा को भी विन्सेंट एच पाला ठीक वैसे ही नहीं बर्दाश्त हो रहे थे जैसे कैप्टन अमरिंदर सिंह को नवजोत सिंह सिद्धू और गुलाम नबी आजाद को गुलाम अहमद मीर - फिर क्या था, 'खेला' हो गया.

हो सकता है सोनिया गांधी को ममता बनर्जी की ये हरकत उतनी ही बुरी लगी हो जितनी बिहार चुनाव के बाद बीजेपी के अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी के छह विधायक झटक लेने के बाद नीतीश कुमार को लगा था - तृणमूल कांग्रेस का बीजेपी-जेडीयू की तरह कोई गठबंधन तो नहीं है, लेकिन बीजेपी को चैलेंज करने के नाम पर एक अंडरस्टैंडिंग जरूर बनी हुई है.

2. तृणमूल कांग्रेस बागियों का नया ठिकाना: लगातार हार और बगावत और राज्यों में जबरदस्त गुटबाजी के बावजूद कांग्रेस अब भी तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले काफी बड़ी है, लेकिन ममता बनर्जी टीएमसी को एक ऐसे ठिकाने के तौर पर विकसित कर रही हैं जो बीजेपी और कांग्रेस के बागियों को सुरक्षित जगह लगे - ममता बनर्जी के तेवर ही ऐसे नेताओं के लिए उम्मीद की किरण है. जहां जैसी जरूरत समझ रही हैं, ममता बनर्जी नये मेहमानों को सम्मान और जगह देने में भी कोई संकोच नहीं बरत रही हैं. लुईजिन्हो फलेरियो और सुष्मिता देव का राज्य सभा पहुंच जाना तो यही बता रहा है.

कांग्रेस के पास नेताओं को उपकृत करने के ज्यादा संसाधन हैं, तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले कांग्रेस का ज्यादा राज्यों में शासन भी है, लेकिन सही रणनीति का अभाव, फैसले लेने में दुविधा और उसमें दिमाग की जगह दिल पर ज्यादा भरोसा कांग्रेस के लिए एक मुश्किल खत्म करने की कोशिश में डबल मुसीबत खड़ी कर देता है.

mamata banerjee, sonia gandhiसोनिया गांधी के सामने भी मोदी और बीजेपी से पहले ममता बनर्जी बड़ी चुनौती बनती जा रही हैं.

ये सही है कि ममता बनर्जी शिकार पर निकली हैं और रास्ते में जो भी मिलेगा झोली भरती जाएंगी. ऐसे में कांग्रेस को चाहिये कि वो अपने नेताओं को शिकार होने से बचा सके तो बचा ले. कांग्रेस का काम अपने नेताओं को रोकना है क्योंकि जाने वाले तो निकल ही जाएंगे, सामने ममता बनर्जी मिल जायें या बीजेपी या कोई और - इसलिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को ममता बनर्जी से नाराज होने से ज्यादा अपनी प्रॉपर्टी की सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिये. मेघालय में जो कुछ हुआ है उसके लिए ममता बनर्जी से कहीं ज्यादा जिम्मेदारी सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ही बनती है.

मुलाकातें नहीं थमी हैं, सोनिया सूची से बाहर हो गयीं

ममता बनर्जी के दिल्ली पहुंचने से पहले ही खबर आ चुकी थी कि वो सोनिया गांधी से मुलाकात नहीं करने वाली हैं. जब दिल्ली पहुंचीं तो ममता बनर्जी से ही ये बात पूछ ली गयी तो बोलीं, 'किसी से मिलने के लिए समय नहीं मांगा था... मैंने केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के लिए समय मांगा था.'

अपनी तरफ से ममता बनर्जी ने ये भी जोड़ा ताकि जवाब दुरूस्त लगे, 'पंजाब का चुनाव आने वाला है... वो व्‍यस्‍त होंगी, उन्‍हें काम करने दीजिये.' चुनावी व्यस्तता के कारण ऐसा पहले भी हुआ है जब ममता बनर्जी 10, जनपथ जाकर सोनिया गांधी से नहीं मिल पायी हैं.

1. क्या प्रियंका को इग्नोर कर रही हैं ममता: लेकिन ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी की व्यस्तता बताने के लिए सिर्फ पंजाब चुनाव का ही नाम क्यों लिया? उत्तर प्रदेश में भी तो उसके साथ ही विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और प्रियंका गांधी वाड्रा फील्ड में उतर कर शिद्दत से लड़ भी रही हैं.

क्या ऐसा इसलिए बोल रही हैं - क्योंकि वो अखिलेश यादव के पक्ष में खड़ी हैं. ममता बनर्जी की बातों से तो ऐसा ही लगता है, 'अगर तृणमूल कांग्रेस यूपी में बीजेपी को हराने में मदद कर सकती है तो हम जाएंगे… अगर अखिलेश यादव हमारी मदद चाहते हैं तो हम मदद करेंगे.'

प्रियंका गांधी वाड्रा ने अखिलेश यादव के साथ चुनावी गठबंधन तो नहीं किया है, लेकिन एक संभावना ऐसी जरूर है कि रणनीतिक तौर पर कांग्रेस यूपी में समाजवादी पार्टी को परदे के पीछे वैसा ही सपोर्ट दे सकती है जैसा पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ किया था.

ममता बनर्जी का स्टैंड अलग है. ममता बनर्जी चाहती हैं कि जिस राज्य में जो राजनीतिक दल मजबूत है, बाकी सभी उसे फॉलो करें - और कांग्रेस भी ऐसा ही करे. ये फॉर्मूला ममता बनर्जी ने 2019 के आम चुनाव में भी सुझाया था, लेकिन कांग्रेस को मंजूर नहीं हुआ.

ममता बनर्जी का कहना है कि जैसे गोवा और हरियाणा में तृणमूल कांग्रेस ने शुरुआत की है, क्षेत्रीय दलों को राज्यों में ऐसा करना चाहिये. कहती भी हैं, 'हमने गोवा और हरियाणा में शुरुआत की है… लेकिन मेरा मानना है कि कुछ स्थानों पर क्षेत्रीय दलों को लड़ना चाहिए. अगर वे चाहते हैं तो हम उनके लिए प्रचार भी करेंगे.' गोवा और हरियाणा दोनों ही जगह ममता बनर्जी लड़ाई के लिए जिन दो नेताओं को चुना है वे पहले कांग्रेसी ही रहे हैं - लुईजिन्हो फलेरियो और अशोक तंवर.

2. ममता ने समझाया मुलाकातों का मतलब: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के बाद ममता बनर्जी मुलाकातों को लेकर कहा, राजनीतिक विरोध अपनी जगह पर है फिर भी मिलना-जुलना जारी रहेगा... पॉलिटिकल और डेवलपमेंट रिलेशन अलग-अलग होते हैं. मुख्यमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पश्चिम बंगाल में 20-21 अप्रैल, 2022 को होने वाली बिजनेस मीट के लिए भी आमंत्रित किया है.

लेकिन सोनिया गांधी से मुलाकात के मामले में ममता बनर्जी का नजरिया बदल जाता है. मीडिया को सोनिया गांधी से न मिलने की वजह चुनावी व्यस्तता से कुछ ज्यादा लग रही थी, पूछे जाने पर ममता बनर्जी ने सवालिया लहजे में ही पूरी तस्वीर साफ कर दी - क्यों मिलना चाहिए? हमें हर बार सोनिया गांधी से मिलना क्यों जरूरी है? संविधान में ये तो नहीं लिखा है!

दिल्ली में ममता बनर्जी ने बॉलीवुड हस्ती जावेद अख्तर के साथ साथ सुधींद्र कुलकर्णी से भी मुलाकात की. वाजपेयी-आडवाणी के सहयोगी रह चुके सुधींद्र कुलकर्णी के साथ मुलाकात करीब घंटे भर चली. कुलकर्णी के कट्टर मोदी-शाह विरोध को देखते हुए ये मुलाकात भी महत्वपूर्ण ही लगती है.

ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मिलने में भले ही परहेज किया हो, लेकिन शरद पवार से मिलने 30 नवंबर को मुंबई जा रही हैं. याद रहे ममता बनर्जी के पिछले दौरे में दिल्ली में होकर भी शरद पवार मिले नहीं थे. ममता बनर्जी को 1 नवंबर को मुंबई में एक बिजनेस कार्यक्रम में शामिल होना है - और बताया है कि पवार के साथ साथ वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से भी मिलेंगी.

सबको साथ लेकर चलना है, नेतृत्व कोई समस्या नहीं

ममता बनर्जी तो अखिल भारतीय मिशन पर निकली ही हैं. जो भी हाथ बढ़ा रहा है खुल कर गले लगा रही हैं. बगैर किसी भेदभाव के. ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के दरवाजे तो सभी के लिए खोल रखे हैं. नजर तो बीजेपी के असंतुष्टों और हाशिये पर भेज दिये गये नेताओं पर भी है, लेकिन प्राथमिकता सूची में कांग्रेस नेता ऊपर हैं.

अब मेघालय जैसी लॉटरी तो बार बार हाथ लगने से रही, लिहाजा तृणमूल कांग्रेस ऐसे छिटपुट नेताओं को भी साथ लेने की कोशिश कर रही हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व को ये समझने में मददगार हो कि ममता बनर्जी को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा. मतलब, विपक्ष के नेतृत्व का ठेका अनंत काल के लिए कांग्रेस के पास ही नहीं रहने वाला है.

पश्चिम बंगाल चुनाव के तत्काल बाद ममता बनर्जी ने विपक्ष को एकजुट करने की जो पहल शुरू की थी, उससे शुरुआती दौर में कांग्रेस को पूरी तरह अलग रखा था - और ये बात कांग्रेस के भीतर बेचैनी बढ़ाने लगी थी.

1. कांग्रेस की चाल समझ चुकी हैं ममता बनर्जी: जब कांग्रेस नेतृत्व को लगा कि विपक्षी जमावड़ों से कांग्रेस को दूर रखने की कोशिश की जा रही है और बुलाने के नाम पर भी सिर्फ G-23 नेताओं को ही बुलाया जा रहा है - शरद पवार का हालचाल लेने सोनिया गांधी के दूत बन कर कांग्रेस नेता कमलनाथ पहुंच गये. बातचीत हुई और फौरन ही एनसीपी नेता का बयान भी आ गया - कांग्रेस के बिना विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश संभव ही नहीं है.

तब विपक्ष की ऐसी बैठकें शुरू होने से पहले प्रशांत किशोर की भी प्रमुख भूमिका देखी जा रही थी, लिहाजा उनको भी गांधी परिवार की तरफ से मिलने का संदेश भेजा गया. कांग्रेस को दूर रखते हुए विपक्ष की बैठकें मुंबई जाकर शरद पवार के साथ तीन घंटे की मुलाकात के बाद ही शुरू हुई थीं.

2. प्रशांत किशोर का मामला भी होल्ड पर: बुलावे पर प्रशांत किशोर राहुल गांधी के पास पहुंचे. प्रियंका गांधी वाड्रा तो मौजूद रहीं ही, बताते हैं कि सोनिया गांधी भी वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये मुलाकात में शामिल हुईं. बात यहां तक पहुंच गयी कि प्रशांत किशोर के कांग्रेस ज्वाइन करने तक की खबर आ गयी. पद और जिम्मेदारी भी तय हो गयी - लेकिन फिर मामला होल्ड हो गया. वैसे होल्ड किये जाने की कई वजहें हैं और एक कारण 2022 के शुरुआती पांच राज्यों के चुनाव भी हैं.

बाकी बातें अपनी जगह हैं, लेकिन ममता बनर्जी को ये तो अच्छी तरह समझ में आ चुका है कि कांग्रेस की जिद के चलते विपक्ष एकजुट नहीं हो सकता. सोनिया गांधी की बुलाई विपक्ष की मीटिंग से अरविंद केजरीवाल को दूर रखने पर ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेतृत्व को मीटिंग में ही सुनाया भी खूब था.

ममता बनर्जी जब पिछली बार दिल्ली दौरे पर पहुंची तभी राहुल गांधी अचानक एक्टिव हो गये और विपक्ष के नेताओं को बुलाकर मीटिंग पर मीटिंग करने लगे. हो सकता है ममता बनर्जी को लगता हो कि शरद पवार से मुलाकात न हो पाने की वजह भी कांग्रेस की ही कोई चाल रही हो, तभी तो ममता बनर्जी दिल्ली जाकर भी सोनिया गांधी से नहीं मिलीं और शरद पवार से मिलने मुंबई जाने वाली हैं, ताकि विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम को आगे बढ़ाया जा सके - साफ है मोदी सरकार और बीजेपी से दो-दो हाथ करने से पहले ममता बनर्जी कांग्रेस को किनारे लगाने में जुट चुकी हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

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